कांग्रेस सुन ले, शरणार्थियों को नागरिकता देकर ही दम लेंगे : शाह (लीड-1)

रामगोपाल जाट

सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक याचिका पर सुनवाई करने के बाद जनसंख्या नियंत्रण को लेकर केंद्र सरकार को दिए गए निर्देश के बाद अब धीरे-धीरे साफ होता जा रहा है कि अगले संसद सत्र में केंद्र के नरेंद्र मोदी सरकार जनसंख्या नियंत्रण पर कोई बड़ा दांव खेल सकती है।

इसके साथ ही हाल ही में सेना के जनरल मनोज नरवणे के द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत में शामिल किए जाने के बयान को भी लोग केंद्र के नरेंद्र मोदी सरकार के द्वारा छेड़ा गया एक नया शिगूफा मानकर पाकिस्तान के ऊपर किसी अटैक की संभावना के तौर पर देख रहे हैं।

भारतीय सेना के जनरल के द्वारा जिस तरह से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को संसद के एक इशारे पर भारत में मिलाने का बयान दिया गया है। उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि केंद्र सरकार निकट भविष्य में पाकिस्तान के ऊपर कोई बड़ा हमला करके या संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से पीओके को वापस ले सकती है।

उल्लेखनीय यह भी है कि बीते संसद सत्र के दौरान जब धारा 370 और 35a पर बहस चल रही थी, तब जम्मू-कश्मीर का नाम लेने के दौरान संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने कई बार कहा था कि जब वह कश्मीर का नाम लेते हैं तो पीओके, यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर उसी में आ जाता है। गृह मंत्री का यह बयान यूं ही दिया हुआ नहीं प्रतीत हो रहा है।

इस बीच सियासी जानकारों का कहना है कि हमेशा की भांति भारत की सरकार यानी नरेंद्र मोदी सरकार पहले जनता में संवाद के लिए, वाद विवाद के लिए और बहस के लिए एक मुद्दे को किसी दूसरे माध्यम से विवादों किया जाता है। उसके बाद उस मामले को संसद में कानून की शक्ल दी जाती है।

बताया जाता है कि नरेंद्र मोदी सरकार खासतौर से जब से गृह मंत्री की कुर्सी पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की ताजपोशी हुई है, तब से लेकर अब तक केंद्र सरकार जैसे ताबड़तोड़ तौर पर अपने सभी वादे पूरे करने की तरफ भाग रही है।

गौरतलब है कि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में आते ही सबसे पहले जम्मू कश्मीर में 70 बरस से जो समस्या नासूर का रूप ले चुकी थी, उसको निपटा ते हुए धारा 370 और 35a को हटाने का फैसला किया।

किंतु आपको बता दें कि यह कार्य भी अचानक नहीं किया गया, 1982 में जब बीजेपी की स्थापना हुई थी और उससे पहले जनसंघ के समय से ही भाजपा और उसके बड़े नेता जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35a को हटाने का सपना देखते रहे हैं, जनता से वादे करते रहे हैं।

जबकि, साल 2014 से लेकर 2019 तक की नरेंद्र मोदी की पहली सरकार के दरमियान भी भारतीय जनता पार्टी के कई बड़े नेताओं के द्वारा समय-समय पर जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने और 351 को निपटाने के लिए बयान दिए गए, ताकि जनता के बीच इस मुद्दे पर वाद विवाद चलता रहे, जनता की राय सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से सरकार तक पहुंचती रहे।

इसी दौरान सरकार ने मुस्लिम समाज में अभिशाप बन चुके तीन तलाक को भी कानून के तौर पर हमेशा के लिए मिटाने के लिए शिगूफा छोड़े गए, ताकि मुस्लिम समाज और हिंदू समाज समेत भारत के नागरिकों की जुबान से यह पता लगाया जा सके कि तीन तलाक को लेकर जनमानस क्या कहता है।

संसद सत्र में सबसे अंतिम दिनों जो फैसला किया गया, वह जरूर भारत के नागरिकों के लिए चौंकाने वाला हो सकता है, किंतु इसको लेकर कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट के द्वारा नागरिक पंजीकरण रजिस्टर का जो निर्देश दिया गया था, उसके तहत नागरिकता संशोधन कानून को लागू किया गया है।

हालांकि, केंद्र की मोदी सरकार और गृह मंत्री खुद अमित शाह ने कई बार कहा है कि 1947, 1955 और 1995 में कई बार नागरिकता संशोधन कानून संसद में पेश किया गया और समय-समय पर इसमें बदलाव किए गए हैं। इसलिए यह चीज नहीं है, लेकिन विपक्ष के द्वारा जिस तरह से मुस्लिम समुदाय को अफवाह के जरिए बढ़ाया गया, वह बेहद चौंकाने वाला था, इसकी उम्मीद खुद मोदी सरकार ने भी नहीं की थी।

जिस तरह से बीते सत्र में गृह मंत्री अमित शाह ने एक के बाद एक लगातार चार बड़े कानून बनाकर देश की जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया, जो लोग बीजेपी पर से विश्वास उठाने लगे थे, उनका विश्वास वापस कायम कर दिया, उससे स्पष्ट है कि अगले संसद सत्र में भी केंद्र सरकार कई बड़े और अहम कानून बना सकती है।

हालांकि, जिस तरह से नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विपक्ष के द्वारा मुस्लिम समुदाय में अविश्वास की भावना पैदा की गई है, उससे ऐसा लग रहा है कि निकट भविष्य में केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता या जनसंख्या नियंत्रण कानून में से किसी एक को पास कर कानून की शक्ल दे सकती है।

एक और बात गौर करने योग्य है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और सबसे अंत में झारखंड से बीजेपी की सरकार चले जाने के बाद अब राज्यसभा में एनडीए को बहुमत नहीं होगा। निकट भविष्य में एक के बाद एक राज्यसभा की 73 सीटों पर चुनाव होने हैं, इन 73 सीटों में से जितनी सीटों पर बीजेपी हारेगी उतना ही राज्यसभा में बहुमत कम होता चला जाएगा।

ऐसी स्थिति में न तो आरएसएस और ना ही भारतीय जनता पार्टी चाहती है कि बड़े कानून, जो बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र में हमेशा से रहे हैं, उनको लागू करने में देरी की जाए। क्योंकि भाजपा को ऐसा मौका शायद दोबारा नहीं मिले, कई राज्यों में भाजपा की सरकार चली गई है। ऐसी स्थिति में राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के कारण सरकार को कानून बनाने में दिक्कतें आती हैं।

चर्चाओं का दौर गर्म है और कहा जा रहा है कि समान नागरिक संहिता जनसंख्या नियंत्रण कानून समेत कई अहम फैसलों को लेकर केंद्र सरकार काम कर रही है, और अगले संसद सत्र में बकौल नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल पांच बड़े कानून बनाए जाएंगे।

अगर केंद्र सरकार जनवरी के अंत से शुरू हो रहे संसद सत्र में बड़े कानून जैसे कि समान नागरिक संहिता या जनसंख्या नियंत्रण कानून को हाथ में लेती है, तो उससे पहले जम्मू-कश्मीर की तरह पूरे देश में सुरक्षा चाक-चौबंद करेगी।

फिलहाल 8 फरवरी को दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। उसके लिए खासतौर से भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच टक्कर है, कांग्रेस अपने हथियार लगभग डाल चुकी है। ऐसी स्थिति में भाजपा के सामने इसे केंद्र शासित प्रदेश को जीतना बेहद जरूरी है।

इसी साल के नवंबर माह में बिहार में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। बिहार में बीजेपी नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के साथ गठबंधन में है। अगर दिल्ली का चुनाव भाजपा हारती है तो बिहार में भी नीतीश कुमार भाजपा को आंखें दिखाएंगे।

इसके साथ ही अगले साल के शुरुआत में पश्चिम बंगाल में शायद देश का सबसे बड़े चुनाव में से दो नंबर का चुनाव होगा। हालांकि यह राज्य विधानसभा का चुनाव है।

लेकिन जिस तरह से ममता बनर्जी के इस पूरे कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी, केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार के बीच तलवारें खिंची रही हैं, उससे स्पष्ट है कि यह चुनाव बड़े पैमाने पर बलिदान मांगने वाला साबित हो सकता है।

अगर भारतीय जनता पार्टी दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश का चुनाव हारती है और उसके बाद बिहार में भी बीजेपी की गठबंधन वाली सरकार सत्ता से बाहर हो जाती है, तो अगले साल होने वाले पश्चिम बंगाल के चुनाव से पहले भाजपा के लिए यह सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है।