ईशान कोण का शमशान लील रहा है विधायकों की जान, विधानसभा में भूत है?

जयपुर।

बीते 20 बरस से राजस्थान विधानसभा में ऐसा अवसर केवल दिसंबर 2018 से लेकर अक्टूबर 2020 तक ही आया है, जब सभी 200 सदस्य एक साथ सदन की कार्रवाई में हिस्सा लिए हैं।

क्या राजस्थान विधानसभा में भूत है? राजस्थान विधानसभा के 200 में से 4 सदस्य आज दिन तक स्वर्ग सिधार चुके हैं, जिन्होंने दिसंबर 2018 में चुनाव लड़ कर विधानसभा पहुंचने में कामयाबी पाई थी। उदयपुर जिले की वल्लभनगर सीट से कांग्रेस के विधायक गजेंद्र सिंह शक्तावत का आज निधन होने के साथ ही राज्य विधानसभा में सदस्यों की संख्या घटकर 196 रह गई है।

वर्तमान विधानसभा के सदस्यों में से सबसे पहले सहाड़ा विधानसभा सीट से तीसरी बार विधायक बने कांग्रेस के कैलाश त्रिवेदी का कोविड-19 के चलते मेदांता अस्पताल में उपचार के दौरान 5 अक्टूबर 2020 को निधन हो गया था।

इसके बाद नवम्बर के महीने में 16 तारीख को तत्कालीन मंत्री और चुरू जिले के सुजानगढ़ सीट से कांग्रेस के विधायक मास्टर भंवरलाल मेघवाल का लंबे समय तक कोमा में रहने के बाद निधन हो गया था।

भाजपा के दिग्गज नेता, जो 2013 से 2018 की वसुंधरा राजे सरकार में जलदाय एवं उच्च शिक्षा मंत्री रहे चुकी थीं, उनका 30 नवंबर 2020 को Covid-19 के चलते गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में निधन हुआ।

किरण माहेश्वरी के निधन के साथ ही राजस्थान विधानसभा में सदस्यों की संख्या घटकर 197 रह गई थी। तब ऐसा माना जा रहा था कि 3 सीटों के लिए विधानसभा का उपचुनाव फरवरी के महीने में हो सकता है, लेकिन आज कांग्रेस के एक और विधायक का देहांत होने के कारण विधानसभा सदस्यों की संख्या घटकर 196 गई है।

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कांग्रेस पार्टी के विधायक गजेंद्र सिंह शक्तावत, जो पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बेहद करीबी माने जाते हैं, उनका लंबे समय की बीमारी के बाद आज अलसुबह असामयिक निधन हो गया। इस तरह से कांग्रेस के तीन विधायक एवं भाजपा का एक विधायक 2018 के बाद गठित हुई विधानसभा से अलविदा हो चुका है।

आपको बता दें कि राजस्थान विधानसभा का निर्माण होने के बाद इसमें सदन की कार्यवाही का संचालन वर्ष 2001 के दौरान हुआ था, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार के वक्त तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष परसराम मदेरणा की अगुवाई में सदन की कार्रवाई संचालित हुई थी।

सबसे रोचक बात यह है कि तब से लेकर दिसंबर 2018 तक राजस्थान विधानसभा में कभी भी सभी 200 विधानसभा सदस्य एक साथ सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले सके। इसके चलते 2013 से लेकर 2018 तक विधानसभा के अध्यक्ष रहे कैलाश चंद मेघवाल के द्वारा पंडितों और तांत्रिकों का सहारा लिया गया।

तत्कालीन अध्यक्ष कैलाश चंद मेघवाल ने पंडितों में तांत्रिकों के द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ सदन के अंदर एक मंत्रित रंगीन कलश रखवाया गया था। कैलाश चंद मेघवाल के द्वारा अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में यह कार्य किया गया था, जिसके बाद किसी भी विधायक का निधन नहीं हुआ था।

बताया जाता है कि इस कलश को पिछले साथ 8 महीने से किसी ने नहीं देखा कलश गायब होने के बाद राज्य विधानसभा में फिर से वही सब कुछ शुरू हो गया जो पहले चल रहा था। सदन के सदस्य मास्टर भंवरलाल मेघवाल पहली बार बीमार होकर कोमा में चले गए।

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तब से लेकर अब तक राजस्थान विधानसभा के 4 सदस्य स्वर्ग सिधार चुके हैं और राज्य की सदन के ऊपर छाई हुई काली छाया फिर से मंडराने लगी है। पंडितों और तांत्रिकों का कहना है कि विधानसभा भवन के ईशान कोण में श्मशान घाट होने के कारण यह सब घटित हो रहा है।

तांत्रिकों का यह भी कहना है कि अगर यह शमशान घाट यहां से हटाया नहीं गया अथवा इसका पूरे मंत्र उच्चारण के साथ उपाय नहीं किया गया तो सदन के भीतर कभी भी सभी 200 सदस्य एक साथ सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले सकते हैं।

भले ही तांत्रिकों और पंडितों की बात पर विश्वास नहीं किया जाए, किंतु पिछले 20 बरस के इस विधानसभा भवन के इतिहास में वो सभी बातें सच साबित हो रही हैं, जो तांत्रिकों के द्वारा बताई जा रही है। जब तक सदन के भीतर मंत्रोच्चारण के साथ रखा गया रंगीन कलश मौजूद था, तब तक एक भी सदस्य का निधन नहीं हुआ था।

बताया जा रहा है कि फरवरी के महीने में राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र शुरू होगा और फरवरी के माह में ही राज्य की खाली हुई चारों विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी होना है। ऐसे में यदि फिर से तांत्रिकों के द्वारा उपाय नहीं किया गया, तो सदस्यों की संख्या कम होने का खतरा बरकरार रहेगा।

बताया जाता है कि इस विधानसभा भवन की जगह शमशान घाट की जमीन थी, जहां तत्कालीन सरकार द्वारा इस नए भव्य और बड़ा भवन का निर्माण करवाया था। इससे पहले राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही 1952 से सवाई मानसिंह टाउन हॉल में संचालित होती थी। यहां सदस्य संख्या 176 थी, जहां 66 साल सदन की कार्यवाही संचालित हुई।

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साल 1993 से 1998 तक की तत्कालीन भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने जगह कम होने व राज्य में परिसीमन होने पर सदस्यों की संख्या बढ़ने के चलते नया विधानसभा भवन लालकोठी में बनाने का निर्णय लिया गया था। इस भवन के निर्माण के बाद 2001 में यहां पहली सदन की कार्यवाही शुरू हुई।