विधानसभा की 3 सीटों पर उपचुनाव में होगी सतीश पूनिया की अग्निपरीक्षा

जयपुर। नवंबर 2019 में आमेर से विधायक सतीश पूनिया को राजस्थान भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। उसके बाद से अबतक सतीश पूनिया के नेतृत्व में पार्टी ने 20 जिलों में पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हराकर अशोक गहलोत सरकार की विफलताओं को जनता के सामने लाने का ही काम किया है।

पिछले वर्ष जयपुर, जोधपुर और कोटा में जो पहली बार 3 से बढ़ाकर छह नगर निगम किए गए थे, उनमें भी पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए आशानुकूल सफलता पाई। साथ ही पिछले दिनों संपन्न हुए 50 नगर निकाय के चुनाव में भी पार्टी ने लगभग कांग्रेस पार्टी के बराबर वोट हासिल किए।

अब इसी महीने की 28 तारीख को 90 जगह पर नगर निकाय के चुनाव होंगे, उसमें भी पार्टी को जनता का समर्थन मिलने की उम्मीद है। पार्टी अध्यक्ष के तौर पर सतीश पूनिया की अग्निपरीक्षा संभवत फरवरी महीने में स्टार्ट होगी, जब राजसमंद, सहाड़ा और सुजानगढ़ की विधानसभा सीटों पर उप चुनाव होने जा रहे हैं।

इन 3 विधानसभा सीटों में 2 सीटों पर वर्तमान में कांग्रेस का कब्जा है, जबकि राजसमंद की सीट राजस्थान की पूर्व मंत्री और बीजेपी की वरिष्ठ विधायक किरण माहेश्वरी के निधन के बाद खाली हो गई है। पिछले 2 साल से लगातार पार्टी अध्यक्ष के तौर पर भी और विपक्ष में रहते हुए सतीश पूनिया के द्वारा राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार को पूरी तरह से विफल करार दिया गया है।

चाहे सम्पूर्ण किसान कर्जमाफी का मामला हो, बिजली बिलों में सब्सिडी, स्टेट टोल फ्री होना हो या फिर अपराध के मामले में राजस्थान का शिखर को छू जाना हो, प्रत्येक मामले में सतीश पूनिया के नेतृत्व में भाजपा ने अशोक गहलोत की सरकार को पूरी तरह से नाकाम बताया गया है।

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जिन 3 सीटों पर विधानसभा का चुनाव होना है, उनमें सुजानगढ़ पर अभी तक दिवंगत मंत्री मास्टर भंवरलाल का कब्जा था, जबकि कांग्रेस के ही विधायक कैलाश द्विवेदी सहाड़ा से 2018 में जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।

दोनों नेताओं के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी की विधानसभा में सदस्य संख्या घटकर 98 रह गई है, जबकि छह विधायक बसपा से टूटकर कांग्रेस में शामिल हुए थे। ऐसे में कांग्रेस की सदस्य संख्या 106 हो गई थी, जो भी कम होकर 104 पर आ गई है।

इसी तरह से दिसंबर 2018 के चुनाव परिणाम के बाद भाजपा को 72 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, लेकिन राजसमंद विधायक किरण माहेश्वरी के निधन के बाद बीजेपी के विधायकों की संख्या भी 71 रहे गई है।

आपको बता दें कि इन दिनों कांग्रेस पार्टी ही नहीं, बल्कि खुद भाजपा भी अंतरकलह से जूझ रही है। राज्य की दो बार मुख्यमंत्री रहीं और वर्तमान में भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे ने एक तरह अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी गई है।

वसुंधरा राजे ने ही “टीम वसुंधरा राजे” के नाम से अलग संगठन बनाकर प्रदेश के तमाम पदाधिकारियों की नियुक्ति और उनके माध्यम से वसुंधरा राजे की सरकार के द्वारा किए गए कार्यों को जनता तक पहुंचाने का दावा किया जा रहा है।

जानकारों का कहना है कि वसुंधरा राजे वर्ष 2008 की तरह एक बार फिर से भाजपा के साथ प्रेशर पॉलिटिक्स खेल रही हैं। आपको याद होगा, साल 2008 में जब वसुंधरा राजे पहली बार सत्ता से बाहर हो गई थीं और फिर लंदन में रहने के आरोप में नेतृत्व द्वारा उनको नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिया गया था, तब उन्होंने इसी तरह से विधायकों की खेमेबाजी करके तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व को झुकाने का काम किया था।

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अब एक बार फिर से वसुंधरा राजे लगभग उसी तरह की पॉलिटिक्स खेल रही हैं। माना जा रहा है कि वसुंधरा राजे को इस बात का भरोसा है कि राजस्थान में भाजपा के 71 विधायकों में से आधे से ज्यादा विधायक उनके कट्टर समर्थक निकलेंगे।

इसी के दम पर वसुंधरा राजे इस तरह की दबाव वाली राजनीति कर रही हैं। इधर, भाजपा के द्वारा 90 नगर निकाय के चुनाव इसके साथ ही अगले महीने होने वाले विधानसभा की 3 सीटों के उपचुनाव पर ध्यान केंद्रित करने के लिए पार्टी मुख्यालय में ताबड़तोड़ बैठकों का दौर जारी है।

प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के नेतृत्व में संगठन महामंत्री चंद्रशेखर, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ पूरी तत्परता से संगठन की सेवा में जुटे हुए हैं, जबकि वसुंधरा राजे को यह लग रहा था कि उनकी सरकार में गृह मंत्री रहे गुलाबचंद कटारिया और पंचायती राज मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ भी उनके साथ खड़े होंगे।

सियासत के जानकारों का कहना है कि इससे पहले वसुंधरा राजे ने 2008 में भी इसी तरह से पार्टी के भीतर तोड़फोड़ करते हुए कई नेताओं का कैरियर खत्म कर दिया था। साल 2013 से लेकर 2018 तक की सरकार में वसुंधरा राजे ने भाजपा के वरिष्ठ विधायक रहे घनश्याम तिवारी को अपनी कैबिनेट में जगह नहीं दी थी।

बाद में उनको दिसंबर 2018 के चुनाव के वक्त पार्टी छोड़कर खुद की पार्टी का गठन करना पड़ा। हालांकि, सतीश पूनिया के नेतृत्व में अब घनश्याम तिवाड़ी फिर से भाजपा में लौट आये हैं, किंतु वसुंधरा राजे सोचती हैं कि वह एक बार फिर से भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व पर उसी तरह से दबाव बनाकर प्रदेश अध्यक्ष बदलने या फिर 2023 के चुनाव के वक्त उनको फिर से मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने के लिए नेतृत्व को मजबूर कर देंगी, जैसे 12 साल पहले कर चुकी हैं, किंतु इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के रूप में मजबूत तिकड़ी है।

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ऐसा माना जा रहा है कि सतीश पूनिया को राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पूर्व फ्री हैंड देकर पूर्व की भांति सभी 90 नगर निकाय के चुनाव में और तीनों सीटों पर होने वाले उपचुनाव में भी अपने हिसाब से टिकट वितरण करने और प्रदेश के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ तालमेल बिठाते हुए संगठन को मजबूत करने के लिए दिशा-निर्देश दे दिए गए हैं।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि करीब सवा साल के अध्यक्ष के तौर पर सतीश पूनिया के कार्यकाल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा भी 100 में से 100 नंबर दिए गए हैं, इससे उनका हौसला सातवें आसमान पर है और उनमें वसुंधरा जैसी मजबूत लीडर से भी लोहा लेने की हिम्मत प्रबल हो गई है।

चर्चा है कि वसुंधरा राजे को यही खौफ है कि अगर सतीश पूनिया इसी तरह से मजबूत होते रहे तो 2023 के चुनाव से पहले राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे की रि-एंट्री होना लगभग असंभव हो जाएगा।

इन तीनों सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव परिणाम में भाजपा को आशानुकूल सफलता नहीं मिलती है, तो अध्यक्ष सतीश पूनिया के लिए जहां मुश्किलें होनी शुरू हो सकती है, तो दूसरी तरफ वसुंधरा राजे का गुट भी प्रदेश इकाई पर हावी होने की कोशिश करने लगेगा। ऐसे में यह चुनाव दोनों ही नेताओं के लिए अग्निपरीक्षा होंगे।