विश्व के शुष्क वनों में रोपित कितने प्रतिशत पौधे जीवित बचते हैं?

उष्णकटिबंधीय शुष्क वन विश्व के सबसे संकटापन्न वन माने जाते हैं। चराई, आग कटान आदि से सुरक्षा कर देने पर बिगड़े वनों में सुसुप्त जड़ों, मृदा में सीड-बैंक तथा अन्यत्र से बीज विकीर्णन द्वारा पुनरुत्पादन संभव है। वैश्विक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि सीधी बुवाई और प्राकृतिक पुनरुत्पादन को बढ़ावा देना उष्णकटिबंधीय वनों के रेस्टोरेशन की सर्वश्रेष्ठ पद्धति है।

किंतु यह पद्धति थोड़ा समय लेती है और कई विशिष्ट कारणों से वृक्षारोपण करना आवश्यक हो जाता है। उदाहरण के लिये यदि वांछित प्रजातियों के बीज-स्रोत के रूप में कुछ वनस्पति नहीं है या मिट्टी में सीड-बैंक नहीं है तो केवल कटान रोकने, मवेशियों की चराई रोकने या आग से सुरक्षा कर देने मात्र से वनों का रेस्टोरेशन नहीं हो सकता।

स्थानीय वृक्ष प्रजातियों की पूर्ण विविधता का पुनर्स्थापन, इकोसिस्टम-फंक्शन में महत्वपूर्ण क्रियात्मक भूमिका वाली प्रजातियों का पुनर्स्थापन, या स्थानीय लोगों की जरूरत के अनुसार प्रजातियों का पुनर्स्थापन आदि ऐसे कारक हैं जिन्हें वृक्षारोपण, सीधी बुवाई और असिस्टेड नेचुरल रिजेनेरेशन के समन्वित प्रयास से ही सम्हाला जा सकता है।

उदाहरण के लिये राजस्थान का सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य उड़न-गिलहरियों के लिये विख्यात है। वहां गिलहरी का अस्तित्व महुआ, आम और बहेड़ा के पुराने, बड़े और ऊंचे वृक्षों पर आश्रित है। इनमें भी महुआ उड़न-गिलहरी का मुख्य भोजन और आवास होना सिद्ध हुआ है।

भारी भरकम और पुराने वृक्षों के धीरे धीरे समाप्त हो जाने पर स्वाभाविक रूप से गिलहरी का अस्तित्व नहीं रह सकता। चूंकि घने वनों में भी महुआ, आम और बहेड़ा का प्राकृतिक पुनरुत्पादन संतोषजनक नहीं है, इसलिये रोपण और सीधी बुवाई कर इन प्रजातियों का रेस्टोरेशन किया जाना आवश्यक है।

वृक्षारोपण की उपयोगिता को देखते हुये यह जानना आवश्यक है कि उष्णकटिबंधीय शुष्क वनों में रोपित किये जाने वाले पौधों में से कितने पौधे जीवित बचते हैं जो अंततः वृक्ष बनते हैं। आज की चर्चा इसी विषय पर केन्द्रित है। यह स्पष्ट करना उचित होगा कि यहाँ पर अन्य वृक्षारोपणों जैसे नहर-तट वृक्षारोपण, शहरी वृक्षारोपण, टिब्बा-स्थिरीकरण हेतु रोपण आदि से सम्बंधित आंकड़े आज के विश्लेषण में शामिल नहीं हैं।

इसके साथ ही चूंकि यहाँ केवल पौधारोपण के लिये प्रयुक्त सीडलिंग्स के सर्वाइवल परसेंटेज को ही अध्ययन में शामिल किया गया था अतः सीधी बुवाई एवं प्राकृतिक पुनरुत्पादन से प्राप्त परिणाम यहाँ चर्चा में शामिल नहीं हैं। इस पर पृथक से विचार किया जायेगा।

इस आलेख पर भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ विद्वान् अधिकारियों श्री राहुल कुमार, श्री उमेश मोहन सहाय, श्री एम.एल. मीना, श्री राजीव त्यागी, श्री अरिजीत बनर्जी, श्री पी.डी. गुप्ता, श्री सुगनाराम जाट, श्री संग्राम सिंह कटियार तथा श्री एच.के. सारस्वत द्वारा समालोचनात्मक टिप्पणियों के लिये आभारी हूँ।

इन वनों के रेस्टोरेशन पर दुनिया की श्रेष्ठ शोध जर्नल्स में प्रकाशित शोध के आधार पर वर्ष 2020 में प्रकाशित एक विश्लेषण विश्व के विविध क्षेत्रों में रोपित पौधों के उत्तरजीविता प्रतिशत (सर्वाइवल परसेंटेज) का विश्लेषण देता है| इसमें कुल 30 शोधपत्रों के आंकड़े सम्मिलित हैं (एम. डिमसन, टी.डब्लयू. गिलेस्पी, फ़ॉरेस्ट इकोलॉजी एंड मैनेजमेंट, 467: 118150; 2020)|

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यह एक उत्तम अध्ययन है जिसमें रोपित पौधों की उत्तरजीविता जानने के लिये सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया गया| उष्णकटिबंधीय शुष्क वनों पर जनवरी 2021 की शुरुआत तक कुल 4,182 शोधपत्र प्रकाशित हुये हैं। इनमें से 716 शोधपत्र रेस्टोरेशन, रिहैबिलिटेशन व रेजेनेरेशन पर प्रकाशित हुये हैं| इनमें से उन 44 शोधपत्रों से जानकारी एकत्र की गयी जिनमें रोपण के पश्चात उत्तरजीविता प्रतिशत के आंकड़े उपलब्ध थे।

परिणामों से ज्ञात होता है कि दुनिया भर में उष्णकटिबंधीय शुष्क वनों के रेस्टोरेशन हेतु रोपित पौधों की उत्तरजीविता 13 प्रतिशत से 80 प्रतिशत (मीडियन 44.5 प्रतिशत, कमी-बेशी ±18.8 प्रतिशत) के बीच थी। हमने 2020 के बाद प्रकाशित आंकड़ों को लेकर भी विश्लेषण किया परन्तु अध्ययन में अंतर नहीं है (मीडियन 44.37 प्रतिशत), अतः डिमसन और गिलेस्पी (2020) के प्रकाशित अध्ययन को ही आधार मानना उचित है।

इस अध्ययन के अनुसार सुरक्षा के इंतजामों वाले क्षेत्रों में मीडियन उत्तरजीविता 54 प्रतिशत थी तथा बिना सुरक्षा वाले क्षेत्रों में 30 प्रतिशत थी। मिश्रित प्रजातियों के रोपण क्षेत्रों में उत्तरजीविता 63 प्रतिशत थी जबकि एकल प्रजातियों वाले रोपण में मात्र 29 प्रतिशत ही थी।

रोपण से पहले खर-पतवार या झाड़-झंखाड़ हटाकर रोपण करने या बिना ऐसा किये ही रोपण करने पर उत्तरजीविता में कोई अंतर नहीं था–यह क्रमशः 31 और 30 प्रतिशत थी। सिंचित रोपणों में मीडियन उत्तरजीविता 63 प्रतिशत तथा गैर-सिंचित में 30 प्रतिशत थी।

पौधारोपण, बीजारोपण और प्राकृतिक वनस्पति को बढ़ावा देने की विधियों को एक साथ प्रयोग करने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं। बुवाई और रोपण में से शुरू के 24 महीनों तक रोपण वाले पौधों की वृद्धि तथा उत्तरजीविता बेहतर पायी गयी परन्तु इसके बाद यह अंतर समाप्त हो जाता है।

यहाँ महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि उष्णकटिबंधीय शुष्क वनों के रेस्टोरेशन में सीधी बुवाई एक उपयोगी रणनीति हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में पौधों की एक निश्चित ऊंचाई होने तक क्षेत्र की सुरक्षा और प्रबंधन की आवश्यकता रहती है। अनुभव से यह ज्ञात होता है कि भारत में उष्णकटिबंधीय वनों के रेस्टोरेशन में रोपित या सीधी बुवाई से उगाये गये पौधों की वृद्धि मुख्य रूप से मिट्टी की नमी से निर्धारित होती है।

अतः अच्छी सफलता के लिये या तो पूरक सिंचाई की व्यवस्था करना या वर्षा-जल संचय के लिये रोपित पौधे के चारों ओर एक थाँवला बनाना आवश्यक होता है। इसी प्रकार बुवाई के लिये भी वर्षा-जल संचय की संरचनायें उपयोगी होती हैं।

यहाँ दो तथ्य ध्यान देने योग्य हैं। पहला,इस अध्ययन में शामिल एक भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ की छुट्टा-मवेशी संख्या राजस्थान के टक्कर की हो। और दूसरा, औसत वर्षा के मामले में राजस्थान के उष्णकटिबंधीय शुष्क वन वस्तुतः 250-1800 मिलीमीटर की सीमा के निचले पायदान में हैं।

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मवेशी, कम वर्षा और वनों पर स्थानीय लोगों की आजीविका-निर्भरता तीनों कारक मिलकर यहाँ शुष्क वनों के रेस्टोरेशन को अत्यंत कठिन बना देते हैं। तमाम प्रयत्नों के साथ रोपित पौधों की उत्तरजीविता अधिक से अधिक 40 प्रतिशत तक ही रहती है, और वह भी तब जब रोपण के साथ-साथ सहयोगी रणनीतियों भी क्रियान्वित की गयी हैं।

इनमें रोपित या बीज-बुवाई से उगे हुये पौधों के आसपास वर्षा-जल संचय की बढ़िया व्यवस्था, बहु-प्रजातीय रोपण के साथ-साथ बहु-प्रजातीय सीधी बुवाई, उगे हुये पौधों के आसपास से खर-पतवार को हटाने की नियमित व्यवस्था, क्षेत्र में जो भी स्थानीय वनस्पति है उसके प्राकृतिक पुनरुत्पादन को बढ़ावा देना, चराई, आग आदि से निरंतर सुरक्षा करना शामिल है।

इन सबसे भी आगे प्रारंभ से ही स्थानीय लोगों का साथ लेकर क्षेत्र की मोनिटरिंग तथा क्रियान्वयन हेतु स्थानीय नियम तय किया जाना और इन नियमों के अनुसार स्थानीय लोगों द्वारा कार्यवाही करना आवश्यक रहता है। इन सभी रणनीतियों का एक समयान्तराल में यथा-आवश्यकता आवृत्तिक क्रियान्वयन जरूरी रहता है।

इन तमाम शोध अध्ययनों से रोपित पौधों की उत्तरजीविता को बढ़ाने के सम्बन्ध में उपयोगी जानकारी निकल कर सामने आती है।

पहली बात यह है कि ऐसे वृक्षारोपण जिनमें केवल एक या दो प्रजातियों के बजाय बड़ी संख्या में स्थानीय प्रजातियों का मिश्रण लगाया जाता है, उनमें रोपित पौधों की उत्तरजीविता बेहतर होती है। यह प्रभाव अनेक कारणों से हो सकता है।

स्थानीय प्रजातियों में जलवायुवीय कारकों के प्रति उच्च-सहिष्णुता हो सकती है। खराब मिट्टी होने की दशा में अनेक प्रजातियों के मिश्रण का रोपण और बुवाई वर्षा के पानी के उपयोग की दक्षता, पोषक तत्वों का उपयोग और प्रकाश-संश्लेषक क्षमता के उपयोग में मददगार रहता है।

फंक्शनल विविधता के कारण उत्तरजीविता बढ़ जाती है। विविध प्रजातियों को रोपण और बुवाई में उपयोग करने से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि खर-पतवार और इनवेसिव प्रजातियाँ कम उगती हैं क्योंकि रोपण में उपयोग की गयी प्रजाति-विविधता उपलब्ध पोषक तत्वों और जल का स्वयं उपयोग करते हुये अवांछित प्रजातियों का प्रतिरोध करने में सक्षम होती हैं।

दूसरी बात यह है कि प्रति हेक्टेयर अधिक संख्या में रोपे गये पौधों वाले क्षेत्र में उत्तरजीविता बेहतर होती है, परन्तु यहाँ रोपित या बुवाई से विकसित पौधों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि प्रजातियों की संख्या या विविधता अधिक रहने से ही उत्तरजीविता की दर बढ़ती है।

अगर किसी क्षेत्र में अधिक घनत्व में केवल कुछ प्रजातियों के पौधे रोपित किये जायें तो उनकी उत्तरजीविता उस क्षेत्र की तुलना में कम रहती है जहाँ विविध प्रजातियों के पौधे कम घनत्व में रोपित किये गये हों।

अतः रोपण-घनत्व बढ़ाने की बजाय रोपण में स्थानीय प्रजातियों की संख्या का घनत्व बढ़ाना और अनेक प्रजातियों की सीधी बुवाई बेहतर उत्तरजीविता प्राप्त करने का बढ़िया उपाय है।

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तीसरी बात यह है कि जिन वृक्षारोपणों में पानी दिया जाता है और अवांछित प्रजातियों को नियंत्रित किया जाता है वहां भी उत्तरजीविता बेहतर पायी जाती है।

दरअसल उष्णकटिबंधीय वनों के रेस्टोरेशन में पानी की उपलब्धता उत्तरजीविता बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण कारक है बशर्ते चराई, कटान और आग से क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की जाये।

चौथी बात यह है कि जिन क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों और वन विभाग के मध्य सामंजस्य होता है और मिल-जुलकर निष्ठापूर्वक प्रबंध किया जाता है वहां स्वाभाविक रूप से उत्तरजीविता बेहतर रहती है। स्थानीय समुदायों के सहयोग से दीर्घकालिक मॉनिटरिंग भी उत्तरजीविता को बेहतर करती है।

लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि जब तक वास्तव में मॉनिटरिंग प्राथमिकता में नहीं आती तब तक यह केवल खानापूर्ति की तरह होती है। नियमित अंतराल पर मॉनिटरिंग करना, प्राप्त परिणामों का विश्लेषण करके स्पष्ट निष्कर्ष प्राप्त करना, और उन निष्कर्षों के अनुरूप क्षेत्र में निरंतर और यथा-समय सुधार या क्रियान्वयन करने से उत्तरजीविता अच्छी रहती है।

पांचवीं बात यह है कि स्वाभाविक रूप से समग्र विविधता के बड़े और दो साल से अधिक पुराने पौधों का रोपण करने पर उत्तरजीविता बेहतर रहती है। अतः या तो बड़े पौधे रोपित किये जायें या फिर वर्षा-जल संचय की व्यवस्था के साथ केवल सीधी बुवाई का प्रयोग किया जाये।

ड्राई फ़ॉरेस्ट रेस्टोरेशन हेतु यदि रोपण करना है तो क्षेत्र में कम से कम 30 से 40 स्थानीय प्रजातियों के दो साल से अधिक उम्र के पौधे रोपित हों। स्थानीय कांटेदार वृक्ष एवं झाड़ियों की प्रजातियाँ सीधी बुवाई से बेहतर परिणाम देती हैं।

छठी बात यह है कि किसी भी क्षेत्र में केवल एक बार रोपण या बुवाई करके भूल जाने के बजाय लंबे समय तक निरंतर रखरखाव व सुरक्षा के विविध प्रबंध तथा सीक्वेंसिअल रेस्टोरेशन (क्रमिक पुनरुद्धार) अधिक उपयोगी है। मवेशियों द्वारा चराई से सुरक्षा जितने अधिक वर्षों तक होगी वृक्षारोपण का उतना ही बेहतर परिणाम मिलता है।

राजस्थान जैसे राज्यों में ट्रॉपिकल ड्राइ फॉरेस्ट रेस्टोरेशन में लगाये गये पौधों या बीज-बुवाई से उगाये गये पौधों की उत्तरजीविता कम रहने के वही सब कारण हैं जिनकी चर्चा यहाँ की गयी है। कम वर्षा के कारण पौधों का सूख जाना, मवेशियों द्वारा चराई हो जाना, या घास और खरपतवार के साथ प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाना ट्रॉपिकल ड्राइ फॉरेस्ट रेस्टोरेशन की मुख्य समस्या है।

इन समस्याओं को हल कर लेने और ऊपर दिये गये सुझावों का क्रियान्वयन करने पर वैश्विक औसत के समान ही लगभग 40 से 45 प्रतिशत उत्तरजीविता प्राप्त की जा सकती है।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)