संघनिष्ठ युवा ब्रिगेड के सहारे “अजय भाजपा” बनाने में जुटे भाजपा अध्यक्ष डॉ. पूनियां

रामगोपाल जाट। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया अध्यक्ष के रूप में जब से पार्टी की कमान संभाले हैं, तब से लेकर अब तक उन लोगों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से निकलकर आरएसएस से जुड़ते हुए किसी व्यक्ति के बजाए केवल भाजपा संगठन के लिए काम कर रहे हैं।

दल के ऐसे कार्यकर्ता, जिनको वसुंधरा राजे के द्वारा राजस्थान में हावी होने के बाद एक तरह से सिरे से खारिज कर हाशिए पर डाल दिया गए थे, उनको डॉ. सतीश पूनिया आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

जिस तरह से डॉ. सतीश पूनिया अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, आरएसएस और बरसों से भाजपा के साथ जुड़े हुए कर्मठ कार्यकर्ताओं को लेकर चुनाव प्रचार के लिए उतरते हैं, उससे संघ भी खासा प्रभावित बताया जा रहा है।

वैसे तो खुद डॉ. सतीश पूनिया भी संघनिष्ठ हैं, और वसुंधरा राजे के द्वारा उनको लगातार 15 साल तक दबाकर रखने का काम किया गया है, उसके कारण वह खुद दल के निष्ठावान कार्यकर्ताओं के दिल का दर्द अच्छे से जानते हैं।

ऐसे में जिस तरह से उन्होंने जयपुर, जोधपुर और कोटा के 6 नगर निगमों के चुनाव और उसके बाद पंचायत समिति, जिला परिषद व 50 निकाय चुनाव के समय प्रभारियों को नियुक्त किया था और टिकटों का बंटवारा किया था, उससे साफ है कि भाजपा अध्यक्ष का पूरा लक्ष्य ऐसे लोगों को आगे बढ़ाना है जो बरसों से संगठन के साथ जुड़े हुए थे और निस्वार्थ भाव से काम कर रहे थे, किंतु वसुंधरा राजे के द्वारा राजस्थान की राजनीति में बीते डेढ़ दशक के दौरान जिनको लगभग दरकिनार कर दिया गया था।

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बता दें कि इसी माह के अंत में 28 तारीख को 20 जिलों में 90 नगर निकाय के चुनाव होने हैं, उसके लिए भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया द्वारा एक दिन पहले ही प्रभारियों की सूची जारी की गई है।

इस सूची में डॉ. सतीश पूनियां ने उन्हीं लोगों को तवज्जो दी है, जो किसी न किसी रूप में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, आरएसएस और भाजपा की युवा विंग के हिस्से रहे हैं या फिर वर्तमान में पूरी तन्मयता से जुड़े हुए हैं।

इससे पहले जब पिछले महीने 50 नगर निकाय के चुनाव हुए थे, उसमें भी लगभग इसी तरह के युवाओं को प्रभारी बनाकर मैदान में उतारा था, जिसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया है।

हालांकि, इस चुनाव में हमेशा की तरह जोड़-तोड़ की राजनीति और खरीद-फरोख्त के चलते 50 में से 36 जगह कांग्रेस के द्वारा अपने बोर्ड बनाए गए, लेकिन पूरे चुनाव के दौरान भाजपा-कांग्रेस में कुल मिलाकर केवल 3000 वोटों का अंतर रहा जो डॉ. सतीश पूनिया के लिए बड़ी सुकून की बात हो सकती है।

इसके साथ ही सम्पन्न हुए 20 जिलों के पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव में भी पार्टी के लिए बरसों से काम कर रहे युवाओं या अनुभवी लोगों को प्रभारी बनाया गया था, जिनके कारण राजस्थान में पहली बार विपक्ष के द्वारा बहुमत हासिल किया गया है, यह अध्यक्ष डॉ. पूनियां के लिए बड़ी राहत और सफलता की बात है।

वैसे भी सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के रूप में 2 खेमों में बंटी हुई है, तो दूसरी ओर डॉ. सतीश पूनिया संघ के दिशा-निर्देश पर संगठन को मजबूत करने में जुटे हुए हैं।

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भाजपा कार्यकर्ताओं में चर्चा है कि डॉ. सतीश पूनिया का लक्ष्य “व्यक्ति पूजा” के बजाए केवल और केवल भाजपा के संगठन को अजय बनाना है।

भाजपा के कार्यकर्ता तो यहां तक कहते हैं कि पिछले डेढ़ दशक से जिस संगठन पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हावी रहीं और संगठन के कर्मठ कार्यकर्ताओं के बजाय अपने लाभकारी लोगों को तवज्जो देते हुए “व्यक्ति पूजा” का ट्रेंड बना गईं हैं, उस ट्रेंड को बदलकर डॉ. सतीश पूनिया पार्टी के लिए काम करने वाले लोगों को चुनाव में अधिक जिम्मेदारी देकर उनको आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

इसका परिणाम चाहे जो भी रहे, लेकिन इतना तय है कि जिस तरह से छोटे-छोटे कदमों के सहारे भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया संगठन पर संघनिष्ठ लोगों की पकड़ बना रहे हैं, उससे साफ है कि 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले और चुनाव के बाद सत्ता व संगठन में निश्चित रूप से वसुंधरा राजे को स्थान मिलना बेहद कठिन हो जाएगा।

हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में क्या होगा, यह भविष्य के गर्भ में है, किंतु बीते एक बरस के दौरान जिस प्रकार संगठन के लोगों की फिर से सिर ऊंचा कर भाजपा कार्यालय में आवाजाही बढ़ी है, और वसुंधरा राजे के गुट से माने जाने वाले लोग कार्यालय से दूर होते जा रहे हैं, उससे साफ है कि भाजपा के संगठन पर संघ अपनी पकड़ भी मजबूत कर रहा है और इसके लिए संघ के पास डॉ. सतीश पूनिया से बेहतर व संघनिष्ठ चेहरा कोई नहीं हो सकता।

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