आयुर्वेद की संहिताओं, समकालीन शोध व अनुभव पर आधारित 25 जीवनोपयोगी सुझाव

ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिजीज स्टडी 2019 के अनुसार रिस्क फैक्टर्स और उनके अलग-अलग स्तर हैं जिनके आधार पर 87 मुख्य जोखिम-कारकों की पहचान की गयी है। इसके साथ ही 369 प्रकार की बीमारियों और चोटों की पहचान और दुनिया भर में होने वाले मृत्यु में उनका योगदान भी आँका गया है।

व्यक्तिगत स्तर पर आदत बदलने के लिये 369 प्रकार की बीमारियों और 87 मुख्य जोखिमों पर हम अलग अलग ध्यान नहीं दे सकते और ना ही सभी जोखिम बदल सकते।

आयुर्वेद तीन सार्वभौमिक सिद्धांत (प्रज्ञापराध, असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, परिणामकाल) और उनके आधार पर जीवन और मृत्यु के मध्य सात रक्षा-दीवारें—आहार, विहार, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, पंचकर्म, रसायन और औषधियां—सुझाता है जिससे सभी परिवर्तन-योग्य जोखिमों को दूर रखा जा सकता है।

अनेक जोखिम कारकों की एक साथ उपस्थिति हो तो बचाव के उपाय भी बहु-आयामी होना आवश्यक है। आयुर्वेद की संहिताओं, समकालीन शोध और अनुभवजन्य ज्ञान को एकीकृत करते हुये प्रमाण-आधारित 25 ऐसे सुझाव दिये जा रहे हैं जिन्हें हम अपनी और बच्चों की आदतों में समाहित कर सकते हैं। इनमें से प्रत्येक सुझाव चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, अष्टांगहृदय सहित आयुर्वेद के महत्वपूर्ण शास्त्रों के चयनित अंशों आधारित या प्रेरित है, हालांकि संहिता सन्दर्भ पृथक से यहाँ नहीं दिये गये हैं।

अद्यतन प्रकाशित शोधपत्रों, क्लिनिकल ट्रायल्स, सिस्टेमेटिक रिव्यू व मेटा-एनालिसिस के निष्कर्षों को भी प्रमाण-आधार के रूप में लिया गया है। यहाँ पर विश्लेषण, तर्क और व्याख्या ना देते हुये संक्षेप में सीधे सुझाव ही दिये गये हैं।

  1. आहार – आरोग्य भोजन के अधीन होता है। भोजन को 3 बार से ज्यादा अग्नि में नहीं जाना चाहिये: खेत पर सूर्य की अग्नि में, फिर पाकशाला की अग्नि में और तीसरी बार जठराग्नि। भोजन के सम्बन्ध में उपयोगी आदतें निम्नानुसार हो सकती हैं।

1.1. सर्व-रस भोजन: भोजन में मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, व कषाय सभी रस वाले खाद्य पदार्थ होना चाहिये। प्रतिदिन कम से कम 25 से 30 तरह के पौधों के अंश भोजन में शामिल करना चाहिये। भोजन पकाने में हल्दी, जीरा, धनिया, लहसुन, दालचीनी, तेजपात, मेथी, लौंग, कालीमिर्च, सोंठ, इलाइची, सौंफ आदि उपयोग किया जाना चाहिये।

1.2. फल-सब्जियां: भोजन में प्रतिदिन अनार, द्राक्षा, आँवला अवश्य लेना चाहिये। आँवला को प्रतिदिन भोजन का अंग बनाना उपयोगी है सभी रंगों के कम से कम 450 ग्राम फल और सभी रंगों की 500 से 800 ग्राम सब्जियों भोजन में होना उपयोगी है।

1.3. सूखे-मेवे: भोजन में विविध रंगों के 30 ग्राम या लगभग एक मुट्ठी सूखे मेवे (नट्स) लेने की आदत स्वास्थ्य के लिये हितकर है।

1.4. घी-दूध: घी और दूध रसायन हैं, इन्हें नियमित भोजन में अवश्य लेना चाहिये। लेकिन घी खाने का अधिकार उन्हें ही है जो अपने बल के आधे तक नियमित प्रतिदिन व्यायाम करते हैं, सदासन जीवन-शैली (सीडेन्टरी लाइफस्टाइल) से बचते हैं, ठूँस-ठूँस कर नहीं बल्कि मात्रापूर्वक ही खाते हैं, और कालभोजन करते हैं।

1.5. नमक, चीनी व परिष्कृत अनाज से बचाव: नमक और चीनी कम मात्रा में ही खाने की आदत डाल लेना चाहिये। बहुत ज्यादा नमक व्याधिक्षमत्व कम करता है और न्यूरोडिजनरेशन व डिमेंशिया बढ़ाता है। परिष्कृत अनाज, स्टार्च, शक्कर, नमक, कृत्रिम पेय, और ट्रांस-वसा युक्त खाद्य में कमी करना चाहिये। कृत्रिम पेय नहीं बल्कि पुदीना, जीरा, कालीमिर्च और सैन्धव लवण मिला हुआ छाछ पीने की आदत डाल लेना उपयोगी है।

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1.6. कालभोजन:जब भूख लगी हो अर्थात जब पहले खाया हुआ खाना पूरी तरह से पच गया हो तभी उचित मात्रा में, हितकारी भोजन, दिन में अधिक से अधिक दो बार (सुबह और शाम) अपनी पाचनशक्ति के अनुरूप भोजन लेने की आदत डाल लेना चाहिये। नियत काल या समय पर भोजन करना—न कि जब इच्छा हो तब दिन भर खाते रहना—आरोग्य देने में श्रेष्ठ है।

1.7. उपवास: स्वस्थ लोग सप्ताह में एक दिन वास्तविक उपवास (दिन भर खाते न रहने वाला उपवास) रख सकते हैं, लेकिन शाम को ठूंस-ठूंस खाकर उपवास की भरपायी करने से उपवास का लाभ नहीं मिलता। कालभोजन निर्विवाद रूप से परम आरोग्यकारी है और उपवास की विविध रणनीतियों में ही गिना जाता है।

  1. विहार – स्वस्थ जीवनशैली समस्त-कारणों से मृत्यु दर में कमी लाती है। अतः निम्नानुसार आदतों को जीवन में शामिल कर लेना उपयोगी रहता है:

2.1. बलार्ध-व्यायाम: बच्चों और किशोरों को प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट व्यायाम अवश्य करना चाहिये, जिसमें चलना-फिरना, उछल-कूद और धमा-चौकड़ी आदि इस प्रकार शामिल हों कि शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम हो जाये। वयस्कों को सप्ताह में 150 से 300 मिनट तक सर्वांग व्यायाम आवश्यक है। व्यायाम बूढ़ों के लिये भी आरोग्यदायी है। व्यायाम पर वर्ष 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई गाइडलाइन्स सहित एक मिलियन रिसर्च पेपर्स के बाद भी महर्षि-वैज्ञानिक आचार्य चरक और महर्षि-वैज्ञानिक आचार्य सुश्रुत का यह सिद्धांत नहीं बदला कि नियमित व्यायाम स्वास्थ्य के लिये परम उपयोगी और आवश्यक है, परन्तु व्यायाम प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने बल के आधे तक ही किया जाना चाहिये, ज़्यादा नहीं।

2.2. सत्त्वावजय व योग: प्रतिदिन 60 मिनट योगासन, प्राणायाम और ध्यान शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिये उपयोगी हैं। योग की शक्ति का प्रयोग करते हुये अहितकारी विषयों से मन को हटाने और हटाये रहने की क्रिया सत्त्वावजय है।

2.3. सूर्य-स्नान: सूर्य की रोशनी से रोगों को दूर रखने की विद्या भारत की सर्वाधिक प्राचीन नॉन-फार्मास्यूटिकल दखल में से एक है। दिन में किरणों की तीव्रता का ध्यान रखते हुये 30 से 40 मिनट सूर्य की किरणों का स्नान करना चाहिये।

2.4. प्रकृति-अनुभव: व्यायाम या योग करते समय और कार्य के बीच में जैसा भी संभव हो ग्रीन-स्पेस, पार्क्स या गार्डन्स और हरियाली में प्रतिदिन कुछ समय बिताना लाभदायक है। यदि प्रतिदिन संभव ना हो तो सप्ताह में दो घंटे वनों, उपवनों,नदी, झील आदि के सानिध्य में तो बिताना ही चाहिये।

2.5. आस्यासुख, सदासन और स्वप्नसुख से बचाव: बैठे रहने का सुख, सदैव आसन पर जमे रहना, खूब सोने का सुख लेना ऐसी आदतें हैं जिन्हें कभी आने नहीं देना चाहिये। दिन में कार्य करते समय लम्बे समय तक बैठे नहीं रहना चाहिये, 30 से 40 मिनट में उठकर हल्का-फुल्का व्यायाम करने की आदत डाल लेना चाहिये।

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2.6. दीर्घ-सूत्रता व टाल-मटोल से बचाव: कार्यों को टालते रहना और बाद में भगदड़ करने वाले लोगों की जीवनशैली रोगजननकारी होती है, अतः व्यक्तिगत जीवन और कार्यस्थल से जुड़े सभी कार्य नियत समय पर करते रहना चाहिये।

2.7. सम्यक निद्रा: वयस्कों को रात में सात घंटे की निर्बाध नींद अनिवार्य है, लेकिन आठ घंटे से अधिक समय तक नहीं सोना चाहिये। इन्टरनेट और टेलीविज़न की लत ले कारण निद्रानाश हो जाता है। सोने और जागने का समय तय कर लेना उपयोगी है। रात में जल्दी सोना और प्रातः जल्दी उठने की आदत आरोग्यकारी है।

  1. सद्वृत्त — समाज और स्वयं के साथ हमारे अच्छे व्यवहार या सदाचरण स्वस्थ रहने के लिये आवश्यक हैं। सद्वृत्तों का मूल उद्देश्य ईमानदारी, भावनात्मक स्थिरता, मजबूत सामाजिक संबंध, अकेलापन में कमी, लचीलापन, दृढ़ता, आशावाद, आत्म-सम्मान, परोपकार, करुणा और आत्म-नियंत्रण पैदा करना है। सद्वृत्तों का पालन न करने से ऐसी आदतों का खतरा बढ़ जाता है जो व्याधिक्षमत्व का क्षय तथा अस्वस्थ कर देती हैं और आयु को कम करती हैं। सद्वृत्त पालन से आरोग्य-प्राप्ति व इन्द्रिय-नियंत्रण एक साथ होते हैं। अतः इनका निम्नानुसार पालन आवश्यक है:

3.1. शिक्षा: तत्त्वावबोध, उच्च शिक्षा, कौशल और नवाचार का प्रसन्नता और स्वास्थ्य में ठोस योगदान होता है। शिक्षा प्राप्त करने में पूरी दम लगाइये। स्वयं की सामर्थ्य में बढ़ोत्तरी स्वस्थ और सुखी जीवन प्रदान करती है।

3.2. आत्म-नियंत्रण: इन्द्रियजय का स्वास्थ्य और प्रसन्नता में बड़ा योगदान है। कठिन परिस्थितियों में भी आत्म-नियंत्रित रहने की आदत डालना उपयोगी है।

3.3. कर्तव्य-पालन: धर्म्याःक्रिया का स्वास्थ्य और प्रसन्नता में योगदान है। व्यक्ति के पति, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, माता, बहन, पुत्री, मित्र आदि होने के नाते जो भी कर्तव्य बनते हैं उनका निर्वाह करना प्रसन्नता और स्वास्थ्य के लिये आवश्यक शर्त है।

3.4. सुखी और हितकारी जीवन: सुखी रहिये और लोगों को सुखी रहने में भरपूर मदद करिये। शांति सबसे बड़ा पथ्य है। जीवन की पूर्णता अंततः व्यक्तिगत सुख-प्राप्ति, सद्भावनापूर्ण सामाजिक और पर्यावरणीय जुड़ाव और जीवन की व्यापक सार्थकता में निहित है। प्रसन्न रहना उपयोगी है क्योंकि विषाद से व्याधिक्षमत्व घटता है व रोग बढ़ता है।

3.5. सदाचार: सत्य, प्राणियों के प्रति दया, दान, त्याग, आध्यामिकता, सद्वृत्त का पालन, शांति और भली प्रकार से आत्मरक्षा, हितकारी स्थलों में जाकर रहना, लोगों की सेवा, जितेन्द्रिय महर्षियों का सानिध्य, श्रेष्ठ साहित्य का पठन-पाठन, नियत-कर्तव्यों का पालन, सात्विक और सम्मानित दोस्तों के साथ उठना-बैठना सदैव उपयोगी हैं।

  1. स्वस्थवृत्त — दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या से जुड़े अनेक विषय स्वस्थवृत्त में समाहित हैं। उनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर कुछ सलाह यहाँ दी गयी हैं।
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4.1. दिनचर्या: सोने, सुबह जागने, मल-विसर्जन, स्वच्छता, अभ्यंग, खान-पान, रहन-सहन, आवाजाही, उठना-बैठना, मुंह, दांतों, आँखों, नाक, कान और त्वचा की देखभाल, सफाई प्रक्रिया में एक लयबद्धता लाकर प्रतिदिन नियत समय पर करना उपयोगी है। ये सब क्रियाकलाप सर्कैडियन रिद्म के साथ तारतम्य बनाते हुये स्वस्थ रखते हैं और उम्र-आधारित रोगजनन भी रोकते रहते हैं।

4.2. अभ्यंग: हल्के गुनगुने महानारायण तेल या तिल तेल या अन्य उपलब्ध बॉडी-आयल से नियमित अभ्यंग उम्र के साथ होने वाले रोग परिवर्तनों को विलंबित करने में उपयोगी है तथा दोषों के संतुलन को पुनर्स्थापित करते हुये दीर्घायु व स्वास्थ्य प्रदान करता है।

4.3. नस्य: प्रत्येक सुबह और घर से बाहर निकलते समय अणु तेल, तिल तेल या घी की कुछ बूंदों को नासाछिद्रों में लगाना (प्रतिमर्श नस्य लेना) उपयोगी है। यह संक्रमण में कमी लाता है और स्वास्थ्य के अनेक लाभ देता है।

4.4. कवल-गन्डूष: प्रतिदिन सुबह मुंह में आधा चम्मच तिल का तेल लेकर 5 से 10 मिनट तक घुमाते रहना और फिर बाहर फेंककर साफ़ जल से कुल्ला करना उपयोगी है। इस क्रिया को कवल-गन्डूष कहा जाता है। इसके अनेक स्वास्थ्य लाभ हैं। ध्यान दीजिये, इस क्रिया में मुंह में रखा और घुमाया गया तेल पीना नहीं, बाहर फ़ेंक देना है।

4.5. वेगों को रोकने से बचाव: अनारोग्य अर्थात शारीरिक और मानसिक रोगों को उत्पन्न करने वाले कारणों में मल-मूत्र आदि के वेगों को धारण करना सर्वाधिक खतरनाक है। मूत्र, मल, वीर्य, अपान वायु, उल्टी, छींक, डकार, जम्हाई, भूख, अश्रु, निद्रा और श्रम के बाद निःश्वास ऐसे वेग हैं जिन्हें दबा कर रखना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

  1. पंचकर्म, रसायन और औषधियां – पंचकर्म स्वास्थ्य रक्षण और चिकित्सा दोनों में ही परम उपयोगी है किन्तु चिकित्सकीय देखरेख बिना संभव नहीं है| इसी प्रकार रसायन और औषधियों को भी चिकित्सकीय देखरेख में ही लेना चाहिये, तथापि भारतीय घरों की रसोई में अनेक रसायन युगों से प्रयुक्त हो रहे हैं। भोजन के साथ समुचित मात्रा में हल्दी, आँवला, शुंठी, त्रिफला, तुलसी, दालचीनी, पुदीना, शहद, द्राक्षा, अनार आदि लेना स्वस्थ व्यक्ति को स्वस्थ रखने, व्याधिक्षमत्व बढ़ाने एवं उम्र-आधारित रोगजनन रोकने में सहायक हो सकता है।

शारीरिक और मानसिक रोगों के तमाम परिवर्तनीय जोखिम कारक आयुर्वेद की जीवनशैली से संभल सकते हैं। स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देना, व्यस्तता के कारण चिंतित, भयाक्रांत और तनाव में रहना, बैठे रहने की आदत, शारीरिक व्यायाम नहीं करना, अधारणीय वेगों को रोकना, कालभोजन के बजाय जब मन आये तब खाते रहना, और असमय व अनियमित आहार-विहार हमेशा के लिये बीमार कर देते हैं। अमर होने की कोई गारंटी नहीं है किन्तु यहाँ दिये गये सूत्र जीवन में स्वास्थ्य और प्रसन्नता देने में सहायक हो सकते हैं।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं।)