एक अध्ययन: उत्तर प्रदेश विधि विरूद्व धर्म संपरिवर्तन, प्रतिषेध अध्यादेश 2020

उत्तर प्रदेश राज्य में उत्तर प्रदेश विधि विरूद्व धर्म संपरिवर्तन, प्रतिषेध अध्यादेश का प्रख्यापित होना तथाकथित धर्मनिरपेक्ष समूह को रास नही आ रहा है। उक्त समूहों द्वारा अध्यादेश के प्रावधानों का बिना अध्ययन करे, समाज में गलतफहमी फैलाने का काम किया जा रहा है। 

हो सकता है, कुछ लोगो द्वारा अध्यादेश का अध्ययन भी किया गया हो, परन्तु अपनी तुष्टिकरण की नीति के कारण तथा अपने निजी हितो को साधने के लिये आम समाज को उक्त लोगो द्वारा गलतफहमी का शिकार बनाया जा रहा है।

आमजन किसी भी परिस्थिति में गलतफहमी का शिकार न हो, इसीलिये माननीय प्रधानमंत्री जी ने हाल ही में, पीठासीन अधिकारीयों को सम्बोधित करते हुये जनमानस के लिये संविधान के प्रावधानो की जानकारी पर जोर दिया। 

धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध, अध्यादेश का विरोध मुख्यतयः अध्यादेश का मुस्लिम व अल्पसंख्यक विरोधी होना कहकर किया जा रहा है। परन्तु यहाॅं यह जान लेना भी आवश्यक है कि समूचे अध्यादेश में कही भी मुस्लिम या अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग तक नहीं किया गया है।

अध्यादेश का अध्ययन बताता है कि अध्यादेश मुस्लिम या अल्पसंख्यक विरोधी ना होकर दुव्र्यपदेशन, बल, प्रपीडन, कपटपूर्ण साधन द्वारा तथा विवाह द्वारा एक धर्म से दूसरे धर्म में संपरिवर्तन का विरोधी है व उक्त प्रकार से कराया गया संपरिवर्तन कम से कम एक वर्ष व अधिकतम पाॅंच वर्ष के कारावास से तथा जुर्माना जो कि 15000/- रूपये (अक्षरे पन्द्रह हजार रूपये) कम नही होगा से दण्डनीय है।

इसके अतिरिक्त यदि उक्त वर्णित संपरिवर्तन किसी अव्यस्क, महिला या अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के सम्बन्ध में कराया जाता है, तो उक्त संपरिवर्तन कम से कम दो वर्ष तथा अधिकतम 10 (दस) वर्ष के कारावास व ऐसा जुर्माना जो कि 25000/- रूपये (अक्षरे पच्चीस हजार रूपये) से कम नही होगा से दण्डनीय है। 

यह भी पढ़ें :  मासूम के साथ हैवानियत पर हजारों लोग दो दिन थोई थाने पर जमा, सीकर का है मामला

अध्यादेश के अन्तर्गत माननीय न्यायालय को यह शक्ति भी प्रदान की गई है कि न्यायालय उक्त धर्म संपरिवर्तन के पीडित को अभियुक्त द्वारा समूचित प्रतिकर भी स्वीकृत करेगा जो अधिकतम 5(पाॅंच) लाख रूपये तक का हो सकता है तथा उक्त प्रतिकर जुर्माने के अतिरिक्त होगा। 

अध्यादेश की धारा 6 के अन्तर्गत माननीय न्यायालय को ऐसे विवाह को शून्य घोषित करने की शक्ति प्रदान की गई है जिस विवाह का एक मात्र प्रयोजन विधि विरूद्व धर्म संपरिवर्तन हो। 

अध्यादेश का विरोध इस आधार पर भी किया गया है कि यह अध्यादेश व्यस्को के निजी अधिकारों पर अतिक्रमण करता है। राजस्थान के मुख्यमंत्री आदरणीय अशोक गहलोत जी द्वारा एक वक्तव्य में विवाह को निजी निर्णय बताकर कहा गया कि निजी स्वतंत्रता बाधित करने वाला कानून असंवैधानिक होगा।

हालांकि उक्त वक्तव्य मुख्यमंत्री जी द्वारा अध्यादेश के प्रख्यापित होने से पूर्व दिया गया था। परन्तु अगर यह कहा जायें कि मुख्यमंत्री जी का वक्तव्य इसी प्रकार के अध्यादेश के सम्बन्ध में था तो शायद ही किसी को कोई अतिश्योक्ति होगी। 

मेरी राय में जीवनसाथी चुनना एक पारिवारिक विषय तथा विवाह एक सामाजिक विषय है। भारतीय जनता पार्टी राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष आदरणीय सतीश पूनिया जी ने भी विवाह को सामाजिक  विषय ही बताया।

परन्तु आश्चर्यजनक है कि अनुभवी अशोक गहलोत साहब ने विवाह जैसी सामाजिक संस्था को संर्कीण दायरे में बाधने की कोशिश, मात्र अपने वोट बैंक को खुश करने के लिये की।

यह मात्र आश्चर्यजनक बात नही वरन् आमजन के लिये अफसोस का विषय भी है कि हमारे मुख्यमंत्री अपनी राजनीति के लिये परिवार, समाज व संस्कृति विरोधी वक्तव्य भी दे सकते हैं। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि भारतीय समाज में विवाह मात्र निजी इच्छा नही हो सकता।

यह भी पढ़ें :  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विधायकों की खरीद-फरोख्त की इतनी नौटंकी क्यों की?

यह सही बात है कि व्यस्कों की इच्छा विवाह में एक मुख्य कारक होगी, परन्तु व्यस्को की इच्छा का मुख्य कारक होना विवाह को सामाजिक संस्था से कम नही कर सकता।

तर्कमात्र के लिये अगर मुख्यमंत्री जी के वक्तव्य को स्वीकार भी किया जायें, तो यह कहना उचित होगा कि विवाह के लिये आवश्यक इच्छा किसी भी प्रकार के दुव्र्यपदेशन, बल, असम्यक असर, प्रपीडन, प्रलोभन तथा किसी कपटपूर्ण साधन द्वारा प्रभावित न हो इसकी व्यवस्था के लिये एक कानून प्रत्येक राज्य में आवश्यक है और उसी प्रकार के कानून को उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश विधि विरूद्व धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020 के रूप में प्रख्यापित किया गया है। 

विवाह मात्र धर्म संपरिवर्तन का माध्यम बनकर न रह जायें, ऐसा विचार भी उक्त अध्यादेश के माध्यम से रखा गया है। आज समाज का कोई भी शिक्षित वर्ग विवाह को मात्र धर्म संपरिवर्तन का माध्यम नही मान सकता।

जहाॅं विवाह धर्म संपरिवर्तन का माध्यम होगा, उस विवाह में स्त्री को ना तो पत्नि के रूप में सम्मान मिल पायेगा और ना ही महिला के रूप में अधिकार मिल पायेगें।

इसी ध्येय के साथ जहाॅं विधि विरूद्व संपरिवर्तन का सम्बन्ध अव्यस्क, महिला, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति से है, उन परिस्थितियों में कारावास व जुर्माना बढाकर महिला, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को सशक्त करने का कार्य भी इस अध्यादेश के माध्यम से किया गया है।

अध्यादेश इस बात को भी आश्वस्त कराता है कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग बिना किसी ध्येय के अपनी इच्छा के अनुसार अपने धर्म का पालन कर सकेगें तथा किसी भी प्रकार का दवाब या प्रलोभन उक्त जाति के लोगो को नहीं दिया जा सकेगा। 

यह भी पढ़ें :  खनन माफियाओं का सिंडीकेट अब इतना प्रभावी व बेखौफ हो गया है: राठौड़

यहाॅं यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि अध्यादेश धर्म संपरिवर्तन को प्रतिषेध न करके विधि विरूद्व धर्म संपरिवर्तन को प्रतिषेध करता है। अध्यादेश जहाॅं विधि विरूद्व संपरिवर्तन को प्रतिषेध करता है वहीं धर्म संपरिवर्तन के तरीको को निर्देशित व विनियमित भी करता है।

अध्यादेश की धारा 8 धर्म संपरिवर्तन की पूर्व घोषणा व धर्म संपरिवर्तन के सम्बन्ध में पूर्व रिपोर्ट को आवश्यक बनाती है। अतः यह कहना उचित होगा कि अध्यादेश ना केवल महिला, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को सशख्त करने वाला है।

वरन् विधि विरूद्व धर्म संपरिवर्तन को प्रतिषेध करने के साथ-साथ धर्म संपरिवर्तन को विनियमित भी करता है।  जिस प्रकार से अध्यादेश को प्रत्येक धर्म पर समान रूप से लागू किया गया है, अध्यादेश समान नागरिक संहिता की दिशा में एक और कदम है।

परन्तु आश्चर्यजनक रूप से समान नागरिक संहिता के रूप में अध्यादेश का विरोध देखने को नही मिला। क्योंकि आज तक ‘‘समान नागरिक संहिता‘‘ शब्द का विरोध ‘‘समान नागरिक संहिता‘‘ को बिना समझे ही किया जा रहा है या यूं कहा जायें तो कोई अतिशोक्ति नही होगी कि समान नागरिक संहिता का विरोध मात्र इस कारण से किया जाता है कि समान नागरिक संहिता भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र का एक अभिन्न अंग रहा है।

हास्यास्पद यह है कि उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा उक्त अध्यादेश प्रख्यापित करके समान नागरिक संहिता की दिशा में एक कदम बढाया गया, परन्तु समान नागरिक संहिता के विरोधीयों को भनक तक नहीं लगी। यह उनकी विषय के प्रति गम्भीरता को दर्शाता है। 

हिमांशु शर्मा प्रदेशाध्यक्ष भारतीय जनता युवा मोर्चा, राजस्थान