डॉ. पूनियां के कुशल नेतृत्व में बनी गांवों की सरकारें, सियासी जमीन भी मजबूत

जयपुर। भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व की राजस्थान में भाजपा को मजबूत, कुशल संगठनकर्ता एवं सबको साथ लेकर चलने वाला नेतृत्व की भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां के रूप में तलाश पूरी हो चुकी है, अब पंचायतीराज एवं जिला परिषद चुनाव के नतीजे एवं पहले निगम चुनाव के नतीजों ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है।

सियासी गलियारों में यह चर्चा भी पुख्ता होने लगी है कि अब संघनिष्ठ डॉ. पूनियां के कुशल संगठन में पार्टी का संगठन पूरी तरह सक्रिय है, जो हर चुनावी रण के लिये तैयार हो चुका है।

पंचायती राज एवं जिला परिषद चुनाव में भाजपा को मिली शानदार जीत से प्रदेश भाजपा नेतृत्व की रणनीति एवं कार्यशैली से पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व गदगद है। वहीं, कोरोनाकाल में प्रदेश में भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं ने करोड़ों जरूरतमंद लोगों की भोजन, राशन, मास्क, सैनेटाइजर, चरणपादुका इत्यादि मदद की थी, जिसको लेकर स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्चुअल संबोधन में सेवा कार्यों की प्रशंसा करते हुये कहा था कि प्रदेश भाजपा इकाई के सेवा कार्य अनुकरणीय हैं, साथ ही नड्‌डा ने भी प्रशंसा की थी।

डॉ. पूनियां के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में एक वर्ष के कार्यकाल में कई अवसरों पर केन्द्रीय नेतृत्व इनकी पीठ थपाथपा चुका है।

विपक्ष में सत्ता के खिलाफ जीत यह पहली बार राजस्थान के इतिहास में हुई है, जो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां के नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, जिनको एक सामान्य कार्यकर्ता से लेकर संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते हुये लगभग 40 साल का संगठन का अनुभव है।

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भाजपा संगठन ने प्रदेश में यह साबित कर दिया कि बिना बड़े चेहरे के भी चुनाव जीता जा सकता है, खासतौर पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बिना यह चुनाव जीतकर साबित कर दिया और कई राजनीतिक धारणाएं भी निर्मूल साबित कर दी हैं।

यद्यपि महीनेभर पहले हुये नगर निगम चुनावों में भी 560 सीटों में से कांग्रेस को 261 और भाजपा को 241 सीटें मिलीं और मोटे तौर पर जयपुर, जोधपुर और कोटा में तीन-तीन निगम के समीकरण दिखते थे, लेकिन कोटा दक्षिण में निर्दलीयों के कारण कांग्रेस जोड़-तोड़ में कामयाब होकर अपना बहुमत कायम करने में सफल हो गई।

तब दबी हुई जुबान से सतीश पूनियां के राजनीतिक विरोधियों ने कोशिश की लेकिन पंचायतीराज एवं जिला परिषद चुनाव के 08 दिसंबर को आए नतीजों में भाजपा की शानदार जीत के बाद विरोधियों के मुंह पर ताले लग गए।

उल्लेखनीय है कि 21 जिलों के जिला परिषद चुनाव में 636 सीटों पर भाजपा ने 353, कांग्रेस 252 और अन्य ने 31 सीटों पर विजय प्राप्त की। वहीं 21 जिलों में हुए पंचायत समिति के चुनावों में 4371 वार्डों में से भाजपा ने 1990, कांग्रेस 1856 एवं अन्य ने 525 सीटों पर जीत हासिल की है।

विगत एक वर्ष डॉ. पूनियां के नेतृत्व में प्रदेशभर में जिला एवं मंडल स्तर तक वैचारिक संगठन खड़ा हुआ, प्रदेश में नेतृत्व बदलाव होने से नई पीढ़ी आई और स्थानीय स्तर पर भी कार्यकर्ताओं को अवसर मिला और नया नेतृत्व विकसित हुआ।

संघ पृष्ठभूमि के डॉ. पूनियां एवं संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच अच्छा तालमेल है, पूनियां संघ से बराबर राय भी लेते हैं और राय का सम्मान भी करते हैं, जयपुर ग्रेटर निगम चुनाव इसका उदाहरण है, जहां विधायकों के मुकाबले संगठन को तवज्जो मिली, जयपुर में यह पहली बार हुआ।

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संगठनात्मक निर्णय हों, या टिकट चयन को लेकर मसले हों, सतीश पूनियां प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर से समन्वय एवं आपसी समझ एवं चर्चा से फैसले लेते हैं, अभी तक ऐसा कोई अवसर नहीं आया जब दोनों के बीच कोई टकराव की खबर आई हो।

वहीं पूनियां राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री वी सतीश से भी संगठनात्मक मसलों पर बराबर मार्गदर्शन लेते हैं और दिल्ली में पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व के सभी प्रमुख वरिष्ठ नेताओं से संवाद कर मार्गदर्शन लेते हैं।

प्रदेश में पूनियां एवं चंद्रशेखर दोनों मिलकर ही रणनीति एवं कार्यक्रम तय करते हैं, पंचायतीराज चुनाव की रणनीति एवं पहले से प्रभारी लगाना आदि, समय रहते दोनों ने ही नीचे तक के संगठन, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया था, जिसका लाभ संगठन को चुनाव परिणामों में लगातार मिल रहा है।

जिलों में संगठन प्रभारी, फिर पंचायतीराज प्रभारी एवं पंचायत समिति स्तर तक भी प्रभारी रचना से इन चुनावों में अच्छी मदद मिली, हालांकि सत्ता नहीं होने के कारण संसाधनों के अभाव में कुछ मार्जिन की सीटें हारने भी पड़ीं।

पूनियां बेशक हाई-प्रोफाइल नहीं माने जाते होंगे, लेकिन उन्होंने बड़ी चतुराई से वसुंधरा राजे के खिलाफ संगठन की एक अंदरूनी टीम विकसित कर ली, जिसमें तीनों केंद्रीय मंत्रियों गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुनराम मेघवाल, कैलाश चौधरी, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिय एवं उप नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़ को साथ लेकर निर्णय एवं रणनीति तय करते हैं।

पंचायतीराज एवं जिला परिषद चुनाव के परिणाम शायद और भी बेहतर होते, लेकिन स्वयं सतीश पूनियां एवं चंद्रशेखर कोरोना पॉजिटिव होने के कारण काफी समय तक उपचाररत रहे, लेकिन फिर भी दोनों ही वर्चुअल माध्यमों से मंडल एवं जिलों की टीमों से जुड़े रहे, सतत संवाद करते रहे।

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पूनियां गंभीर संक्रमण की अवस्था में भी मेदांता अस्पताल से फोन एवं वर्चुअल तरीके से सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं से बराबर जुड़े हुए थे और अभी भी आइसोलेशन के दौरान भी पार्टी के कार्यक्रमों गतिविधियों सहित चुनावी अभियान की सतत चिंता करते रहे, बराबर संवाद कर फीडबैक लेते रहे।

इससे पहले पूर्व संक्रमण से ठीक होकर पूनियां गहलोत सरकार के खिलाफ हल्लाबोल सहित कई आंदोलनों में मैदान में उतरकर प्रत्यक्ष तौर पर भी रणनीति तैयार कर चुके थे और अपेक्षाकृत नई टीम को जिम्मेदारी देकर कार्य करवा रहे थे।