राजस्थान में लोगों व वन विभाग की साझेदारी से वनों के बाहर 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हरियाली है

भारत में सामाजिक-सांस्कृतिक भू-परिदृश्य में वृक्ष उगाने की परंपरा बहुत पुरानी है। तथापि, वृक्ष-उत्पादों की बढ़ती खपत के कारण इन वृक्षों का विदोहन भी बढ़ा है।

इसे एक अवसर के रूप में लेते हुये वन विभाग द्वारा पिछले तीन-चार दशकों में पौधशालाओं में पौधे तैयार कर नागरिकों के मध्य वितरण आज भारत को ऐसे मोड़ पर ले आया जहां एक ओर प्राकृतिक वनों में बेहतरी होना प्रारम्भ हो गयी है, वहीं दूसरी और वनों के बाहर के क्षेत्रों से लकड़ी का बढ़िया उत्पादन हो रहा है।

भारत में कृषिवानिकी, एग्रोफॉरेस्ट्री और वन-भूमि के बाहर के भू-भाग में कितने वृक्ष उग रहे हैं? इन्हें कैसे और बेहतर किया जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर तीन प्रकार के आंकड़ों से दिया जा सकता है: पहला, स्वतंत्र रूप से वैज्ञानिकों द्वारा किये गये अध्ययन, दूसरा, भारत सरकार के फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा किये गये अध्ययन और अंततः अनुभवजन्य ज्ञान के आधार पर इन अध्ययनों का विश्लेषण।

इन सबके एकीकृत विश्लेषण से एक ऐसी दृष्टि मिलती है जो वास्तविकता के समीप मानी जा सकती है और जिसकी वैश्विक स्वीकार्यता होती है।

इस विश्लेषण में प्रदत्त विचारों, तथ्यों या त्रुटियों का उत्तरदायित्व तो मेरा ही रहेगा पर भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ विद्वान अधिकारियों-श्री वी.सी, सचेती, श्री राहुल कुमार, श्री उमेश मोहन सहाय, डॉ. अनिल कुमार गोयल, डॉ. जी.वी. रेड्डी, श्री मोती लाल मीना, श्री राजीव त्यागी, श्री सिद्ध नाथ सिंह, श्री राजेश गुप्ता, श्री के.सी मीना व श्री एच.के.सारस्वत-द्वारा इस विश्लेषण पर उदारतापूर्वक दिये गये विचारों से विश्लेषण को बेहतर बनाने में मदद मिली है।

भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार ट्रीज आउटसाइड फॉरेस्ट्स का क्षेत्रफल 2,93,840 वर्ग किलोमीटर (29.38 मिलियन हेक्टेयर; देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 8.94 प्रतिशत) है। महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक आदि में ट्रीज-आउटसाइड-फॉरेस्ट्स का क्षेत्रफल सर्वाधिक है।

राजस्थान में ट्रीज-आउटसाइड-फॉरेस्ट्स का क्षेत्रफल 12,460 वर्ग किलोमीटर है (इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ॉरेस्ट रिपोर्ट, फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया, 2019)।

भारत में वन भूमि के बाहर कुल 1642.29 मिलियन क्यूबिक मीटर ग्रोइंग स्टॉक पूर्व में आँका गया है। राजस्थान के सन्दर्भ में विभिन्न शोध अनुमानों के अनुसार कृषिवानिकी का क्षेत्र लगभग 8.4 लाख से 15.5 लाख हेक्टेयर के बीच आँका गया है।

वर्ष 2020 में प्रकाशित शोध में यह 14.9 लाख हेक्टेयर आँका गया है (देखें, एस.बी. चव्हाण इत्यादि, एन्व. डेव. सस्ट., 2020, 10.1007/एस10668-020-00788-डब्लयू)।

अन्य अध्ययन बताते हैं कि गैर-वन क्षेत्रों द्वारा देश के कुल संभाव्य काष्ठ उत्पादन का 74.51 प्रतिशत योगदान दिया जाता है। देश के सन्दर्भ में भी अध्ययनों में बड़ी भिन्नता है और ये आंकड़े 137 लाख हेक्टेयर से 253 लाख हेक्टेयर के बीच दिये गये हैं।

राजस्थान में वन-भूमि में और वन भूमि के बाहर (ट्रीज-आउटसाइड फॉरेस्ट्स) वृक्षों के ग्रोइंग-स्टॉक की स्थिति बेहद रोचक है। भारतीय वन सर्वेक्षण 2019 के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में कुल रिकार्डेड वन क्षेत्र 32,737 वर्ग किलोमीटर है। रिकार्डेड वन क्षेत्रों में उग रहा कुल ग्रोइंग-स्टॉक 26.39 मिलियन क्यूबिक मीटर है।

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वहीं वन-भूमि के बाहर या ट्रीज-आउटसाइड-फॉरेस्ट्स में ग्रोइंग-स्टॉक 89.07 मिलियन क्यूबिक मीटर है। कुल मिलाकर यह 113.46 मिलियन क्यूबिक मीटर है। पूर्व के आंकड़े बताते हैं कि वनों के बाहर उगने वाले वृक्षों से राजस्थान में 5.77 मिलियन क्यूबिक मीटर औद्योगिक काष्ठ का संभाव्य उत्पादन होता है जो देश के कुल उत्पादन का 7.74 प्रतिशत है।

पूर्व में वर्ष 2011 के आंकड़ों के अनुसार यह 4.42 मिलियन क्यूबिक मीटर था, जो बढ़कर वर्ष 2017 में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 5.77 मिलियन क्यूबिक मीटर हो गया है (इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ॉरेस्ट रिपोर्ट, फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया, 2017)।

कुल मिलाकर राजस्थान में वनों से अधिक ग्रोइंग-स्टॉक वन क्षेत्रों के बाहर उग रहा है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिये, क्योंकि राजस्थान में वन विभाग के केवल वर्ष 1997 से 2020 के बीच के आंकड़ें देखें तो इस दौरान शहरी और ग्रामीण नागरिकों, कृषकों, कॉर्पोरेट घरानों तथा संस्थाओं को लगभग 50 करोड़ पौधे राज्य की पौधशालाओं में उगाकर रोपण हेतु वितरित किये गये हैं।

वन विभाग और लोगों की इस दीर्घकालीन साझेदारी का ही यह परिणाम है कि आज राजस्थान में वन क्षेत्रों के बाहर भी निरंतर हरियाली बढ़ती जा रही है।

एक तर्क दिया जाता है कि इन वृक्षों के उगाने में वन विभाग का कोई योगदान नहीं है या लोग तो हमेशा से ही उगाते आये हैं, तब वन विभाग ने क्या ख़ास कर दिया? दरअसल इस तर्क में ख़ास दम नहीं है।

पहली बात तो यह है कि जो व्यक्ति वन विभाग से पौधे खरीदकर ले जाता है वह फेंकने के लिये नहीं बल्कि पालने-पोसने के लिये ही लेकर जाता है। दूसरी बात यह है कि जो वृक्ष प्रजातियाँ वन विभाग की पौधशालाओं में विगत चार दशकों से उगाई जा रही हैं, व जो वन-भूमि के बाहर उगती हुई पायी जा रही हैं, उनमें पर्याप्त समानता है।

और अंततः, राजस्थान सहित भारत के अनेक राज्यों में किसानों सहित जन-सामान्य के मध्य किये गये सर्वेक्षण-अध्ययन प्रमाणित करते हैं कि वन विभाग द्वारा वितरित किये जाने पौधों से वन भूमि के बाहर लोगों द्वारा हरियाली को बढ़ावा दिया गया है।        

वैश्विक स्तर पर देखें तो वर्ल्ड एग्रोफोरेस्ट्री सेंटर द्वारा वर्ष 2010 के लिये रिमोट-सेंसिंग से प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि विश्व की 43 प्रतिशत खेती की जमीन का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा वृक्षों से आच्छादित था।

वर्ल्ड एग्रोफोरेस्ट्री सेंटर द्वारा ही वर्ष 2016 में प्रकाशित अध्ययन (साइंटिफिक रिपोर्ट्स, 6:29987, 2016) बताता है कि पिछले दस वर्षों में इसमें 2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।

विश्व भर में खेती की जमीनों में 45.3 पेटाग्राम कार्बन भंडारित है, जिसमें 75 प्रतिशत योगदान वृक्षों का है। वर्ष 2000 से 2010 के बीच खेतों में वृक्षाच्छादन में 3.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप 2 पेटाग्राम (4.6%) बायोमास कार्बन बढ़ा है।

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भारत में कुल कृषि क्षेत्र 1,640,067 वर्ग किलोमीटर है, और यहाँ कुल बायोमास कार्बन भण्डारण 1834 मिलियन टन से बढ़कर 1970 (7.4 प्रतिशत की वृद्धि) हो गया है।

भारत में प्रकाष्ठ उत्पादन की दशा और दिशा पर गत वर्ष एक रोचक विश्लेषण भारतीय वन प्रबंध संस्थान, भोपाल के प्रोफेसर भास्कर सिन्हा तथा शोधकर्ता मिली घोष द्वारा किया गया है।

देश में कागज निर्माण में उपयोग होने वाली लकड़ी की 80 प्रतिशत आपूर्ति अब कृषिवानिकी के अंतर्गत उगाये गये वृक्षों से होती है। भारत के सरकारी वनों से प्रकाष्ठ का उत्पादन, देश की कुल मांग का मात्र 3.05 प्रतिशत रह गया है।

यह वनों के बाहर निजी जमीनों और कृषि-वानिकी से होने वाले प्रकाष्ठ उत्पादन से काफी कम है। फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व के अनुमानों से ज्ञात होता है कि सरकारी वनों से केवल 3.17 मिलियन क्यूबिक मीटर प्रकाष्ठ का सालाना उत्पादन होता है, जबकि वनों से बाहर उगाये जा रहे वृक्षों से 42.77 क्यूबिक मीटर प्रकाष्ठ का उत्पादन होता है।

प्राकृतिक वनों की तुलना में लगभग 13.5 गुना लकड़ी वनों के बाहर से आ रही है। हालांकि, भारत में प्रकाष्ठ का कुल उत्पादन देश की कुल मांग से कम होने के कारण लगभग 1300 करोड़ रूपये का लट्ठा-लकड़ी और काष्ठ उत्पाद आयातित भी होता है।

भारत में केवल वाणिज्यिक-कृषिवानिकी के बात करें तो विमको के डॉ. आर.सी. धीमान द्वारा संकलित अनुमान के अनुसार वर्तमान में 5 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में नीलगिरि, पॉपलर्स, कैजुरीना, सुबबूल, महारुख, नीम, मीलिया-नीम, कदंब, सेमल, आदि प्रजातियाँ उगाई जा रही हैं।

औद्योगिक और घरेलू उपयोग के लिये 100 मिलियन घनमीटर लकड़ी व पल्पवुड व 150 मिलियन टन जलाऊ-लकड़ी का उत्पादन होता है।

इसके साथ ही पेड़ों की पत्तियाँ और टहनियाँ गिरने से लगभग 15 मिलियन टन ऑर्गानिक कार्बन, और सालाना 60 मिलियन टन कार्बन-सीक्वेस्ट्रेशन होता है, और इस अनुमान में खेतों की मिट्टी और लकड़ी के उत्पादों में हुआ कार्बन-सीक्वेस्ट्रेशन शामिल नहीं है।

नर्सरी और वृक्षारोपण गतिविधियों से 4000 मिलियन व्यक्ति-दिन प्रतिवर्ष का रोजगार भी मिलता है। काष्ठ व लुगदी के उत्पादन का मूल्य करीब रुपये 10,000 बिलियन और जलाऊ लकड़ी का 30,000 मिलियन है।

दरअसल अब भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में वनों के बजाय वन क्षेत्रों के बाहर से प्रकाष्ठ उत्पादन का ज़ोरदार मेगा-ट्रेंड देखने को मिल रहा है। भारत में वनों के बाहर उगने वाले वृक्षों से 80 प्रतिशत टिम्बर प्राप्त हो रहा है।

श्रीलंका के 19 प्रतिशत भू-भाग में कृषि-वानिकी की जा रही है जिससे वहां की 90 प्रतिशत जलाऊ व 64 प्रतिशत इमारती लकड़ी प्राप्त होती है।

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बांग्लादेश के 2.03 प्रतिशत भू-भाग या लगभग 4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में घरेलू बाग़-बगीचे हैं। आज बांग्लादेश की 90 प्रतिशत जलाऊ लकड़ी की आवश्यकता इन्ही होम-गार्डन्स से पूरी होती है।

पाकिस्तान की कुल मांग की 72 प्रतिशत इमारती व 90 प्रतिशत जलाऊ लकड़ी वनों के बाहर से प्राप्त होती है।

स्पष्ट है कि इमारती प्रकाष्ठ व जलाऊ लकड़ी अब प्रायः प्राकृतिक वनों से नही बल्कि वन भूमि के बाहर से प्राप्त होती है।

यदि 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने प्राकृतिक वनों के अनियंत्रित विदोहन पर रोक नहीं लगायी होती तो भारत में वन-भूमि के बाहर के क्षेत्रों से जो इमारती, औद्योगिक या जलाऊ लकड़ी उगाने का मेगा-ट्रेंड आज शायद संभव नहीं हो पाता।

स्वाभाविक है कि वन क्षेत्रों के बाहर निवेश कर एग्रोफोरेस्ट्री को निरंतर सुदृढ़ करने हेतु विविध प्रयत्न आवश्यक हैं। पहला, उन प्रजातियों जिनकी भारी औद्योगिक एवं घरेलू मांग है, की जैव-विविधता को वनों के बाहर बढ़ावा देने में वन विभाग को निरंतर गंभीर और नवाचारी प्रयत्न में लगे रहना चाहिये।

दूसरा, ऐसी बहुउपयोगी प्रजातियां जो अभी केवल वनों में ही पायी जाती हैं, के उच्चकोटि के पौधे वन विभाग की पौधशालाओं में तैयार कर लोगों के मध्य डोमेस्टिकेशन हेतु भी वितरण सार्थक होगा।

इस प्रकार के प्रयास अब पूरी दुनिया में हो रहे हैं। तीसरा, पिछले कुछ वर्षों से येन-केन-प्रकारेण पौधे बांटने की संख्या-पूर्ति के दबाव में वन विभाग शोभाकारी फुलवारी झाड़ियों जैसी प्रजातियाँ उगाकर बांटने की प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो रहा है।

यह प्रवृत्ति पारिस्थितिकीय, सामाजिक या आर्थिक दृष्टि से उचित नहीं है। पौधे बांटने की सुगमता का तात्पर्य यह नहीं है वन विभाग अपनी पौधशालाओं में गुलाब, बेला, चंपा, चमेली उगा कर बांटे। इस कार्य के लिये अन्य विभाग हैं|

वन विभाग को केवल उन्ही बहु-उपयोगी वृक्ष और झाड़ियों को उगाना और बांटना चाहिये जो राजस्थान के उष्णकटिबंधीय शुष्क वनों में प्राकृतिक रूप से पायी जाती हैं या प्राचीन पारम्परिक कृषि-वानिकी का अंग हैं।

शोध से ज्ञात होता है कि यदि एक बड़ा और पुराना वृक्ष काटा जाता है तो समान प्रजाति के 41 पौधे रोपित करने पर ही क्षतिपूर्ति हो पाती है (देखें, डी.जे. नोवक, टिम अवरमान, अर्बन फॉरेस्ट्री एंड अर्बन ग्रीनिंग, 41: 93-103, 2019)।

अंततः, वृक्षों एवं वनस्पति के सम्बन्ध में नीतियों, नियमों, अधिनियमों और न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों को समाहित करते हुये कृषिवानिकी के विविध आयामों को सुदृढ़ करने में भारी निवेश की आवश्यकता है।

यह निवेश वनों के बाहर के क्षेत्रों में होते हुये भी यथार्थत: वनों, वन्यजीव अभयारण्यों व राष्ट्रीय उद्यानों के संरक्षण में भी नवाचारी कदम होगा।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं।)