hanuman beniwal rlp
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Jaipur

राजस्थान की पहली क्षेत्रिए दल (first regional party) का दर्जा हासिल करने वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (rashtriya loktantrik party) आज से ठीक साल पहले, यानी 29 अक्टूबर 2018 को स्थापित (foundation day) हुई थी। तब से लेकर अब तक रालोपा ने क्या खोया और क्या पाया, इसको लेकर चर्चा करेंगे।

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एक लड़का, जो कभी राजस्थान विवि (rajasthan university) के कुलपति की टेबल पर चढ़कर छात्रों के लिये संघर्ष करता था। एक लड़ाका, जो कभी जेल जाता था, लेकिन राज्य की सरकार को झुकाने की हिम्मत होने के कारण इतिहास रचकर रात को 2 बजे जेल की सलाखों से छूटकर आता था।

एक लड़ाका, जिसने लगातार छात्रसंघ चुनाव जीतकर कई मिथक तोड़े, लेकिन अपनी छात्र राजनीति को कभी सार्वजनिक राजनीति पर हावी नहीं होने दिया। एक लड़ाका, जिसके पिता का साया ऐसे वक्त में उठ गया, जब वो चुनाव लड़ने के लिये दिनरात मैदान में डटे हुये थे।

एक ऐसा लड़ाका, जो सत्ता के खिलाफ लड़ते हुये आज देश की सबसे बड़ी पंचायत में जा पहुंचा है। एक ऐसा लड़ाका, जो दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का साझीदार है, और वो भी केवल दो एमएलए और एक सांसद के दम पर।

एक ऐसा लड़ाका, जो देश के सबसे बड़े राज्य के दो—दो मुख्यमंत्रियों को उनके सामने सच बोलने और सच का आयना दिखाने की हिम्मत रखता है। एक ऐसा लड़ाका, जो राजस्थान से किसान राजनीति का अंत होने के बाद भी खुद अपने दम पर किसान नेता बनकर सामने आया है।

एक ऐसा लड़ाका, जो जातिवाद से उपर उठकर 36 कौम की बात करता है, लेकिन किसान और जवान के लिये दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता, यानी नरेंद्र मोदी को भी भला बुरा कहने से नहीं चूकता है।

ऐसा ही लड़ाका है हनुमान बेनीवाल! जी हां! हनुमान बेनीवाल की राजनीति का सफर 1994 के दौरान शुरू हुआ, जब वो छात्र राजनीति में चुनाव लड़ने के लिये राजस्थान महाविद्यालय से अध्यक्ष पद का चुनाव लड़े और जीते।

इसके बाद बेनीवाल लगातार 4 बार चुनाव जीतते चले गये। राजस्थान के सबसे बड़े विवि, यानी राजस्थान विवि से छात्रसंघ अध्यक्ष बनने और सत्ताधारी दल के खिलाफ खड़ा होने के कारण जेल गये और रात 2 बजे जेल से छूटकर इतिहास रच दिया।

जब 1998 के दौरान राज्य के विधानसभा चुनाव का वक्त आया, तब हनुमान बेनीवाल के पिता, यानी रामदेव बेनीवाल का नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया। ऐसे समय में निर्वाचन आयोग ने निमयों के चलते नामांकन पत्र दाखिल नहीं करने दिया।

इसके बाद उन्होंने 2003 में निर्दलीय ​उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और जीवन का पहला चुनाव हार गये। इसके बाद उनको भाजपा में शामिल कर लिया गया। साल 2008 में दुबारा चुनाव लड़ा और पहली बार राज्य विधानसभा पहुंचे।

किंतु शायद उनके भाग्य में कुछ और ही लिखा था। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्मयमंत्री वसुंधरा राजे के साथ तीखे मनमुटाव के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उन्होंने हार नहीं मानी और 2013 में फिर से निर्दलीय चुनाव लड़कर खींवसर से लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे।

साल 2013 से लेकर 2018 तक राज्य में सबसे बड़ी पांच रैलियां कर हनुमान बेनीवाल ने खुद को बड़े राजनेता के तौर पर साबित कर दिया। सत्ता की चूलें हिल गई और विपक्ष के होश उड़ गये। नागौर से उठा यह किसानी तूफान बीकानेर, जोधपुर, सीकर होता हुआ राजधानी जयपुर पहुंच गया।

यहां जयपुर में स्थित मानसरोवर के शिप्रापथ मैदान पर करीब 3 लाख लोगों की भीड़ के समक्ष हनुमान बेनीवाल ने अपने खुद के दल के नाम का ऐलान किया। यहीं से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का जन्म हुआ।

विधानसभा चुनाव से ठीक 20 दिन पहले, यानी 29 अक्टूबर 2018 को रालोपा का गठन कर हनुमान बेनीवाल ने 57 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और खुद को तीसरी बार जिताते हुये 2 अन्य विधायक बनाने में कामयाब हुये।

इसके बाद उनकी ताकत को अन्य दलों ने पहचाना। पहले कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत ने उनको अपने पाले में लेने का प्रयास किया, किंतु अपने ही दल में विरोध होने के कारण गहलोत का प्रयास नाकाम हो गया।

इसके बाद भाजपा ने बेनीवाल को नागौर की सीट से संयुक्त उम्मीदवार बनाकर पश्चिमी राजस्थान में खुद के पक्ष में रालोपा के समर्थकों को मोड़ने में कामयाबी हासिल की।

नागौर से हनुमान बेनीवाल खुद भी सांसद बने तो कई अन्य सीटों पर भाजपा को भी फायदा पहुंचाया। सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को जोधपुर से किया, जहां पर पूरी सरकार लगी हुई थी, किंतु वहां पर गहलोत के पुत्र को बुरी तरह से हार का मुहं देखना पड़ा।

यहीं से जीतकर गजेंद्र सिंह शेखावत दूसरी बार संसद पहुंचे और राज्य के एकमात्र कैबिनेट मंत्री बने। किंतु खुद के खींवसर की सीट छोड़ने के कारण यहां पर उपचुनाव तय हो गये। जहां पर इसी माह उन्होंने अपने छोटे भाई नारायण बेनीवाल को मैदान में उतारा और भाजपा के साथ फिर से गठबंधन कर जीत दर्ज की।

यानी देखा जाये तो खींवसर की जनता ने बेनीवाल को लगातार चौथी बार आर्शीवाद दिया है। जब मदेरणा, ओला, मिर्धा परिवार का अवसान हो गया है, तब बेनीवाल ही एकमात्र ऐसे नेता के तौर पर सामने आये हैं, जो किसानों और जवानों के मुद्दों को आगे रखकर राजनीति कर रहे हैं।

हालांकि, 2023 को विधानसभा चुनाव होने में अभी चार साल का वक्त बाकि है, किंतु लगातार जीतने की प्रवृति के कारण एक ओर जहां कांग्रेस चिंता में है, वहीं गठबंधन के तौर पर साझेदार भाजपा भी इस बात से चिंतित है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में बेनीवाल की रालोपा के लिये कम से 20 सीट छोड़नी होगी, जो एक अकेले नेता के लिये बड़ी जीत मानी जा सकती है।

फिलहाल आज पूरे राजस्थान में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के समर्थक अपने दल का स्थापना दिवस मना रहे हैं। और शायद यही वह दिन है, जब राजस्थान की राजनीति में उभरने का प्रयास करने वाले दूसरे लोगों के लिये सबक लेने का वक्त है।

इस सबसे इतर ध्यान देने वाली बात यह है कि रालोपा का गठन किस कारण से हुआ है। दरअसल, राजस्थान में 1998 तक किसान राजनीति चरम पर थी। कभी परसराम मदेरणा, नाथुराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, शीशराम ओला सरीखे नेता किसानों की राजनीति किया करते थे।

लेकिन उसके बाद इन तीनों ही राजनीतिक घरानों का पतन हो गया। ऐसे वक्त में हनुमान बेनीवाल के पास खुद को किसान राजनीति का सबसे बड़ा नेता साबित करने का वक्त था, जिसको उन्होंने बखूबी भुनाया है। आज बेनीवाल सबसे बड़े किसान नेता के तौर पर सामने हैं।