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आयुर्वेद पर अतिथि संपादकीय पढ़कर बहुत सारे लोग एक प्रश्न पूछते हैं कि “आप हमें एक ऐसा द्रव्य बताइए जो अमृत के सबसे नजदीक हो और जिसको लेने पर तमाम रोगों से दूरी बनी रहे।“

इसके उत्तर में प्रायः मैं यह कहता हूं कि आपके लिये इससे सरल कोई प्रश्न हो नहीं सकता था और मेरे लिये इसका उत्तर देने से कठिन और कुछ नहीं हो सकता था।

इस प्रश्न का निर्विवाद, सटीक और वस्तुनिष्ठ उत्तर देने के लिये आयुर्वेद वांग्मय की समस्त संहिताओं की गहरी समझ और गहन अध्ययन तो जरूरी है ही, उसके साथ ही आयुर्वेद के समस्त द्रव्यों में आज तक हुई आधुनिक वैज्ञानिक शोध को भी समझना जरूरी है।

अंततोगत्वा, आयुर्वेदाचार्यों का अनुभव भी उन समस्त द्रव्यों में देखना जरूरी है जो आयुर्वेद की संहिताओं में ज्ञात हैं|

अब आप समझ गए होंगे कि यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर खोजने में पूरा जीवन खर्च किया जा सकता है|

फिर भी, पिछले पांच दशकों में आयुर्वेद की संहिताओं, आधुनिक वैज्ञानिक शोध और अनुभव की त्रिवेणी में बार-बार डुबकी लगाते हुये प्राप्त व्यक्तिगत समझ के आधार पर आज मैं इस प्रश्न का उत्तर दूँगा| आज की चर्चा इसी प्रश्न के उत्तर पर केन्द्रित है|

मेरे ज्ञान और विश्वास के आधार पर आँवला अकेला ऐसा द्रव्य है जो सर्वश्रेष्ठ आहार, रसायन व औषधि है|

आंवला से बेहतर ऐसा कोई बहुआयामी द्रव्य नहीं है जिसे आप भोजन, रसायन और दवाई में एक साथ प्रयोग कर सकते हैं। आमलकी, जिसे आँवला या धात्रीफल भी कहा जाता है, यदि इतना उपयोगी पदार्थ माना गया है।

तो शास्त्र, विज्ञान और अनुभव, तीनों ही स्रोतों में एतदर्थ उपलब्ध प्रमाण परखना आवश्यक है। आइये सबसे पहले आधुनिक वैज्ञानिक शोध से प्राप्त जानकारी के एक अंश को पहले देखते हैं|

उम्र-आधारित रोगजनन का एक प्रमुख कारण डी.एन.ए. रिपेयर मैकेनिज्म में गड़बड़ी होना माना जाता है। जीवित कोशिकाओं के गुणसूत्रों में पाये जाने वाले तंतुनुमा अणु को डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड या डी.एन.ए. कहा जाता है।

इसी में अनुवांशिक कोड निहित रहता है। जैसे जैसे डी.एन.ए. डैमेज का बोझ बढ़ता जाता है, शरीर बुढ़ापे की ओर बढ़ता जाता है। इस कारण अनेक समस्यायें जैसे कैंसर, न्येरोडीजेनरेशन और बढ़ती उम्र के कारण होने वाली अनेक व्याधियां विकसित हो जाती हैं।

शरीर की कोशिकाओं द्वारा डी.एन.ए. डैमेज के संकेत प्राप्त करना और टूट-फूट की मरम्मत करने की क्षमता उम्र के साथ घटती जाती है। इसीलिये बढ़ती उम्र में अनेक रोग लग जाते हैं।

तो क्या रसायन के रूप में आमला बढ़ती उम्र के लोगों में डी.एन.ए. रिपेयर मैकेनिज्म की गति को बढ़ा सकता है? इस विषय में कई अध्ययनों से यह सिद्ध होता है कि रसायन औषधियाँ डी.एन.ए. रिपेयर की गति को बढ़ाकर बुढ़ापा आने की गति को धीमा कर देती हैं।

हाल में हुये एक क्लीनिकल ट्रायल (जर्नल ऑफ़ एथनोफार्माकोलॉजी, 2016, 191: 387-397) में पाया गया कि आमलकी रसायन के प्रयोग से डी.एन.ए. स्ट्रैंड में तोड़फोड़ की गति कम होती है तथा रिपेयर मैकेनिज्म तेज हो जाती है। यह रसायन सुरक्षित भी पाया गया है।

एक अन्य अध्ययन में (जर्नल ऑफ़ आयुर्वेदा एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन, 2017, 8:105-112), जो 45-60 वर्ष के लागों के मध्य किया गया, पाया गया है कि आमलकी रसायन का प्रयोग रक्त की पेरिफेरल ब्लड मोनोन्यूलियर सेल्स में टीलोमीयर की लम्बाई में बदलाव किये बिना टीलोमेरेज क्रियात्मकता को बढ़ा देता है।

चूंकि इससे टीलोमियर के क्षरण में कमी आती है, अतः हितायु-सुखायु या हैल्थस्पान में बेहतरी होती है।

असल में आमलकी वह अमृत रुपी आयुर्वेदिक रसायन है जो आयुर्वेदाचार्यों के युक्ति-व्यपाश्रयी कौशल से मिलकर कैंसर, डायबिटीज, हृदयरोग समेत तमाम रोगों को ठीक कर सकता है या इनसे हमारा बचाव कर सकता है|

आमलकी रसायन के चमत्कारिक प्रभाव का विज्ञान तो अभी पकड़ में आना शुरू ही हुआ है| क्लिनिकल ट्रायल में आमलकी व गुडूची मुख-कैंसर के उपचार में लाभकारी पायी गयीं हैं| आमलकी रसायन, आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया में भी लाभकारी पाया गया है|

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से पुनः देखा जाये तो यह सिद्ध करने के लिये कि आमलकी आयु को स्थिर करने वाला द्रव्य है, प्रमाणों के दो अलग-अलग समूह देखना आवश्यक है।

प्रथम समूह यह कि कोई भी द्रव्य जो जीवन को सुरक्षित रख सकता है, उसमें दो गुण होना अनिवार्य है: पहला, फ्री-रेडीकल स्केवेंजिंग के द्वारा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करना एवं, दूसरा, एन्टीइन्फ्लेमेटरी गुण का होना।

इन दोनों गुणों के कारण ही कोई द्रव्य बढ़ती हुई उम्र के कारण लगने वाले रोगों से लड़ सकता है। प्रमाणों के दूसरे समूह में सीधे इस बात को देखना है कि उम्र के कारण होने वाली बीमारियों को रोकने एवं हो जाने पर उपचार करने की शक्ति आमलकी में है या नहीं।

फ्री-रेडीकल स्केवेंजिंग एवं एन्टीइन्फ्लेमेटरी गुण के सन्दर्भ में आमलकी उच्चकोटि का रसायन एवं एडॉप्टोजेन होने के कारण दोनों ही प्रभाव पर्याप्त आधुनिक शोध में सिद्ध हुये हैं।

बढ़ती उम्र की गैरसंचारी बीमारियों जैसे कैंसर, डायबिटीज हृदय रोग, अपर श्वसन तंत्र के रोग, मानसिक रोग एवं इन रोगों के कारण होने वाली द्वितीयक-जटिलताओं को रोकने के प्रमाण भी हैं।

इस दिशा में विश्व भर में आमलकी पर गंभीर अध्ययन हुये हैं। मुख्य रूप से प्रयोगशाला-उपकरणों के द्वारा इन-वाइट्रो तथा विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों में इन-वाइवो अध्ययनों पर 250 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।

इन सबसे सिद्ध हुआ है कि आमलकी में एंटीऑक्सीडेंट, इम्यूनोमोड्यूलेटर, हिपेटोप्रोटेक्टिव, कार्डियोप्रेटेक्टिव, रीनोप्रोटेक्टिव, एंटीडायरियल, एंटीएमेटिक, एन्टीकैंसर, एन्टीडायबेटिक, एन्टीइन्फ्लेमेटरी, एन्टीहाइपरटेंसिव, न्यूरोप्रोटेक्टिव, एंटीएथीरोस्क्लीरोटिक, एन्टीवायरल, ऐन्टीप्रोलीफेरेटिव, एन्टीपायरेटिक, एनलजेसिक, एन्टीमाइक्रोबियल, एन्टीएलर्जिक, एन्टीहापरलिपिडेमिक, एंटीहाइपरथायरॉयडिज्म, एल्डोज रिडक्टेज इनहिबिटर, प्रोटीन काइनेज इनहिबिटर, गेस्ट्रोप्रोटेक्टिव, स्मृतिवर्धक, एन्टीअल्जीमर, एन्टीकेटरेक्ट आदि गुण हैं।

विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण शोध-पत्रिकाओं में आमलकी पर 2200 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इन शोध पत्रों में इन-वाइट्रो और इन-वाइवो अध्ययनों के अलावा कुछ क्लीनिकल ट्रायल्स भी हैं जो निर्विवाद रूप से आँवला में रसायन गुणों को प्रमाणित करते हैं।

इसका तात्पर्य यह हुआ कि आँवला के गुणधर्मों पर शास्त्रीय सिद्धांतों एवं साइंटिफिक अध्ययनों के निष्कर्षों में पूर्ण समानता है। त्रिफला नामक उपयोगी रसायन में भी आमलकी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हालाँकि अभी क्लिनिकल ट्रायल्स कि आवश्यकता है, परन्तु अभी तक के अध्ययनों में त्रिफला के रोगरोधी या प्रोफायलैक्टिक तथा रोगोपचारी या थेराप्यूटिक गुणधर्म का शास्त्रों और साइंस में निर्विवाद प्रमाणीकरण हुआ है।

आइये अब संहिताओं की ओर चलते हैं| आमलकं वयःस्थापनानाम् (च.सू. 25.40) चरकसंहिता का एक महावाक्य है। अनेक शताब्दियों बाद आचार्य वाग्भट ने इसी वाक्य को वयसः स्थापने धात्री (अ.हृ.उ. 40.56) दोहराया है।

सन्दर्भ-विशेष में अर्थ यह है कि आमलकी या आँवला आयु को स्थिर करने वाले द्रव्यों में श्रेष्ठतम है। वयःस्थापन का शब्दिक अर्थ तो उम्र को स्थिर करना है, तथापि आयुर्वेद के विशाल संस्कृत वांग्मय में वयःस्थापन शब्द विस्तृत और सार्वभौमिक अर्थ समाहित करता है।

इसका एक भावानुवाद यह है कि आमलकी ग्रहण करने से उम्र का स्थायित्व प्राप्त होता है, या उम्र का बढ़ना रुक जाता है। निहितार्थ यह भी है कि बढ़ती उम्र के बावज़ूद शरीर में आयु-आधारित-व्याधिजनन या तो रुक जाता है या गति धीमी हो जाती है।

आयु-आधारित व्याधिजनन या एज-रिलेटेड-पैथोजेनेसिस समकालीन विश्व की सबसे गंभीर समस्या है जिससे बायो-मेडिकल साइंस अभी तक पार नहीं पा सका है।

दूसरे अर्थ में वयःस्थापन का तात्पर्य युवावस्था, तरुणाई या जवानी के स्थायित्व के प्रसंग में देखा गया है। निहितार्थ यह भी है कि वयःस्थापक रसायनों का प्रयोग शरीर को कान्तिवान, पुष्ट, स्थिर एवं प्रसन्न बनाये रखता है।

जैसा कि आचार्य चरक ने कहा है (च.चि.,1.7-8): दीर्घमायुः स्मृतिं मेधामारोग्यं तरुणं वयः। प्रभावर्णस्वरौदार्यं देहेन्द्रियबलं परम्।। वाक्सिद्धिं प्रणतिं कान्तिं लभते ना रसायनात्। लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्।।

अर्थात, रसायन दीर्घ-आयु, स्मरण-शक्ति, मेधा, आरोग्य, तरुणाई, चमकदार शरीर, मोहक रंग, उदार-स्वर, शरीर और इन्द्रिय में परम बल, विलक्षण वाणी, शिष्टाचार, कान्ति आदि प्राप्त करने का उपाय है|

सौन्दर्य विज्ञान की भाषा में कहें तो मन, प्राण और शरीर के स्वास्थ्य और सौन्दर्य का निखार स्थायी होने लगता है।

कम से कम पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर वर्त्तमान काल तक लिखित या संकलित आयुर्वेद की संहिताओं और ग्रंथों के निचोड़ के आधार पर यह कहना उचित है कि आयुर्वेद का ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं जिसने आमलकी को एक उच्चकोटि का भोजन, प्रभावी रसायन और महत्वपूर्ण औषधि के रूप में मान्यता नहीं प्रदत्त की हो।

चरक, सुश्रुत, वाग्भट, सारंगधर, भावमिश्र, चक्रपाणि, आदि आचार्यों द्वारा लिखित संहिताओं और ग्रंथों का सारांश रोचक है। चरकसंहिता के अनुसार आँवला में लवण रस के अतिरिक्त सभी रस हैं। अम्लरस-प्रधान, रुक्ष, मधुर, कषाय है।

परम कफ-पित्त नाशक, वृष्य या पुरुषत्व-वर्धक, रसायन, तथा गुल्म, उदर, ज्वर, पांडु, अतिसार, प्रमेह, कामला, कृमि आदि रोगों के विरुद्ध उपयोगी है। सुश्रुतसंहिता के अनुसार रक्त-पित्तशामक, नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला, पुरुषत्व-वर्धक रसायन है।

भावप्रकाश निघंटु के अनुसार यह पुरूषत्व बढ़ाने वाला, रसायन एवं रक्त-पित्त-हर, गुल्महर और प्रमेहहर है। धन्वन्तरि निघंटु के अनुसार पुरूषत्व-वर्धक, रसायन, ज्वरहर, तथा स्त्रीरोगों में लाभकारी है।

राजनिघंटु के अनुसार आमलकी रक्त-पित्त-हर है। इस सम्बन्ध में भावप्रकाश में वर्णित गुणधर्म देखना उपयोगी है (पूर्वखण्ड 6.2.39-40): हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषतः। रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम्।। हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः। कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित्।।

आँवला हरीतकी की भांति है, विशेषकर रक्त-पित्त-प्रमेहहर, पुरुषत्ववर्धक व रसायन है। अपने अम्ल रस व शीत वीर्य द्वारा वात का शमन और शुष्कता और कषाय के द्वारा कफ शमन करता है।

इस प्रकार तीनों दोषों के शमन में विजयी होता है। आचार्य वाग्भट ने आमलक रसायन का वर्णन करते हुये लिखा है (अ.हृ.उ. 39.149): धात्रीरसक्षौद्र सिताघृतानि हिताशनानां लिहतां नराणाम्।

प्रणाशमायान्ति जराविकारा ग्रन्था विशाला इव दुर्गृहीताः।। आमले का रस, शहद, खण्ड, तथा घी मिलाकर प्रतिदिन चाटते रहने से जरा-जन्य-विकार ठीक उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे बेमन से पढ़े गये ग्रन्थ भूल जाते हैं।

इसी प्रकार आँवले का वाजीकारक, अर्थात वृष्य या पुरुषत्व-वर्धक योग भी निर्दिष्ट है (अ.हृ.उ. 40.27): कृष्णाधात्रीफलरजः स्वरसेन सुभावितम्। शर्करामधुसर्पिर्भिर्लीढ्वा योऽनु पयः पिबेत्।। स नरोऽशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति। जैसा कि आचार्य सुश्रुत ने भी कहा है (सु.चि. 26.24-25): एवमामलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम्। शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीढ्वा पयः पिबेत्।। एतेनाशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति।

तात्पर्य यह है कि आँवला स्वरस से अच्छी तरह भावित आँवला-चूर्ण में, खण्ड, मधु व घी मिलाकर जो व्यक्ति चाटने-चुस्कियाने के बाद दूध पीता है, वह अस्सी साल की उम्र में भी युवा की तरह आनंदित होता है।

एथनोमेडिसिन या लोकज्ञान पर आधारित पारंपरिक औषधि में आमलकी का उपयोग पुरुषत्व बढ़ाने, भूख बढ़ाने, अपच एवं अजीर्ण कम करने, बुखार कम करने, केश वृद्धि, उल्टी, सिरदर्द तथा श्वसन की समस्यायें दूर करने एवं महिलाओं में योनि-जलन को दूर करने में उपयोग किया जाता रहा है।

आयुर्वेद की संहिताओं में आँवला कम से कम 400 औषधि योगों का एक अंग तो है ही, साथ ही अब 5000 से अधिक प्रोपराईटरी औषधियों में भी यह महत्वपूर्ण घटक के रूप में लिया गया है।

सारांश यह है कि शास्त्रों में आमलकं-वयःस्थापनानाम् के सिद्धान्त को खण्डित करने के लिये न केवल कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, बल्कि आज तक उत्तरोत्तर इस सिद्धांत का पुष्टीकरण ही हुआ है।

आमलकी में कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, वसा, फाईबर, आयरन, मेग्नीशियम, फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शीयम, कॉपर, निकोटनिक एसिड आदि रासायनिक संघटक हैं।

इसके अतिरिक्त अनेक फिनोलिक कम्पाउंड्स, टेनिन आदि पाये जाते हैं। गेलिक ऐसिड व क्वेर्सीटिन जैसे पदार्थ केवल फल में ही पाये जाते हैं।

इस विश्लेषण से यही सिद्ध होता है कि आचार्य चरक द्वारा 2000 वर्ष पूर्व प्रतिपादित आमलकं वयःस्थापनानाम् (च.सू. 25.40) या उसके बहुत बाद आचार्य वाग्भट द्वारा पुनः दोहराया गया वयसः स्थापने धात्री (अ.हृ.उ. 40.56) का सिद्धांत पूर्णतः विज्ञान-सम्मत सिद्धांत है।

यही कारण है कि आमलकी न केवल औषधि एवं रसायन के रूप में आयुर्वेद में सदैव प्रयुक्त होता आया है, बल्कि आहार के रूप में भारत के रसोईघरों में चटनी, आचार, मुरब्बा जैसे इतने रूपों में प्रयुक्त होता है कि इस पर कई ग्रंथ लिखे जा चुके हैं।

इन सब तथ्यों के कारण भूले-बिसरे आँवले को अपने भोजन का अंग बनाने के लिये हमारा उत्साहित होना स्वाभाविक है।

हाँ, कुछ बातें ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। पहली बात तो यह है कि आमलकी के रस का उपयोग जहाँ तक संभव हो ताजा ही उचित रहता है। रस का भण्डारण करने पर गुणों में कमी आती है।

दूसरी बात यह है कि वृक्षों से कच्चे फल तोड़ने के बजाय परिपक्व फल ही उपयोग में लिये जाने चाहिये। तीसरी बात यह है कि यदि आप आँवले को सुखा कर रखना चाहते हैं तो छाया में ही सुखायें और फंगस व बैक्टीरिया आदि से बचाने के लिये सुरक्षित व वायुरोधी बर्तनों में ही रखें।

आवश्यकता अनुसार शुष्क फलों से चूर्ण बनायें। चौथी बात यह है कि यदि आँवले की खेती की जा रही है तो वृक्षों को नगरीय-मल-जल या औद्योगिक उच्छिष्ठ-जल का उपयोग कर सिंचाई में कदापि नहीं किया जाये, ताकि आँवले के फलों को भारी-धातुओं के प्रदूषण से बचाया जा सके।

और अंत में, यदि आप आँवले का औषधि के रूप में प्रयोग करना चाहते हैं तो अपने आयुर्वेदाचार्य से परामर्श अवश्य करें एवं उनकी पूर्व-सलाह के अनुरूप आहार-विहार एवं औषधि का प्रयोग करने में ही अपनी भलाई समझें।

औषधियों के मामले में अपनहँथा-जगन्नथा की उक्ति नहीं, बल्कि आयुर्वेद का युक्ति-व्यपाश्रय सिद्धांत ही उचित है, और इसे समझना और उपयोग का निर्देश देना आयुर्वेदाचार्यों के ही बस की बात है।

चलते चलते आपको एक बढ़िया चटनी बनाने की विधि भी बता देते हैं| यह स्वादिष्ट चटनी आपको स्वस्थ रखने में मददगार हो सकती है|

चार लोगों के लिये 12 बादाम भीगे और छिलके उतारे हुये या यदि जवान लोगों के लिये है तो छिलका सहित, 2 इंच अदरक का टुकड़ा, 12 मुनक्के, 4 आमलकी के ताज़े फल, 1 मिर्च देसी, 4 दाना लहसुन, यदि आप लेते हों, 20 ग्राम अनार के ताज़े दाने, 1 ग्राम मिश्री, 12 ग्राम धनिया के पत्ते और सैन्धव लवण स्वादानुसार लेकर पीस डालिये| बस बन गयी चटनी| आनंद लीजिये और स्वस्थ रहिये|

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)

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