डूंगरपुर में आंदोलन की जड़: सामान्य वर्ग के लिये आरक्षित नहीं हैं 50 फीसदी सीटें, योग्य हो तो आरक्षित वर्ग भी हो सकता है सलेक्ट

डूंगरपुर में आंदोलन की जड़: सामान्य वर्ग के लिये आरक्षित नहीं हैं 50 फीसदी सीटें, योग्य हो तो आरक्षित वर्ग भी हो सकता है सलेक्ट

जयपुर। राजस्थान के दक्षिण क्षेत्र के जिले डूंगरपुर, जिसको मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ​द्वारा तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के साथ ही नक्सलवाद पनपने का क्षेत्र करार देते हुये बीटीपी के विधायकों के जीतने पर एक तरह से तंज कसा था, वहां पर इस महीने की 7 तारीख से हजारों अभ्यर्थी अपने हकों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

पहले सरकार से गुजारिश की गई, लेकिन जब बात नहीं बनी तो लगातार 18 दिन तक खुद का कष्ट देते हुये आदिवासी बहुल क्षेत्र के अभ्यर्थियों ने सरकार और प्रशासन से उनकी मांगों पर ध्यान देने की अपील की। इस दौरान छात्राओं ने पहाड़ों पर सांकेतिक तौर पर फांसी के फंदे लगाकर भी प्रदर्शन किया गया।

इस दौरान प्रशासन ने उनकी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के बजाए उनके खिलाफ महामारी एक्ट उल्लंघन के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। गैर जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज होने के बाद पिछले गुरुवार को अचानक से अभ्यर्थी भड़क गये। जो अभ्यर्थी अब तक पहाड़ी क्षेत्र में प्रदर्शन कर रहे थे, वो अब उदयपुर—अहमदाबाद नेशनल हाईवे पर जमा हो गये।

स्थानीय पुलिस से मामला नियंत्रण में नहीं हुआ तो और अधिक पुलिस बल मंगवाया गया। जब नेशनल हाईवे जाम हो गया, तब ही सरकार की नींद खुली। सरकार ने अभ्यर्थियों को उपद्रवी बना दिया। कारण यह था कि जिनकी मांगों पर कार्यवाही करनी थी, उनपर समय रहते ध्यान नहीं दिया और जब मामला हाथ से निकल गया, तब सरकार ने लाठी और गोली का इस्तेमाल शुरू कर दिया।

इससे मामला अनियंत्रित रूप से भड़क गया। प्रदर्शनकारियों ने इससे उग्र होकर हाईवे पर 10 किलोमीटर तक कब्जा कर लिया। शनिवार को पुलिस की झड़प में 2 लोगों की जान जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, इसकी पुलिस—प्रशासन की तरफ से पुष्टि नहीं की है। रविवार तक यहां पर तोड़फोड़, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान करने और नेशनल हाईवे को बाधित करने जैसे 16 प्रकार के केसों में 3300 जनों पर मुकदमा दर्ज किया गया है। साथ ही 34 जनों को गिरफ्तार किया गया है।

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मामला संभल नहीं रहा है, इसको देखते हुये गहलोत सरकार ने नरेंद्र मोदी सरकार से रेपिड एक्शन फोर्स की मांग की है। साथ ही एडीजी क्राइम एमएल लाठर, एससीबी एडीजी दिनेश एमएन और जयपुर पुलिस कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव को देर रात हैलिकॉप्टर से भेजा गया है। उनके द्वारा रविवार को भी प्रयास जारी हैं, लेकिन अभी भी हाईवे खाली नहीं हो पाया है।

हालात यह हैं कि जहां पुलिस ने कई होटलों, पेट्रोल पंपों और कॉलोनियों में अराजकता फैलाते आदिवासी लोगों के द्वारा तोड़फोड़ करने का आरोप लगाया है, तो दूसरी तरफ बीटीपी के विधायकों और कांग्रेस सरकार में मंत्री ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात की है, पर इसके बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला है।

गहलोत सरकार ने दावा किया है कि यहां पर उत्तराखंड़, झाड़खंड़ से विशेष विचारधारा, यानी नक्सली लोगों ने भोले भाले आदिवासियों को भड़काने का काम किया है। प्रशासन ने यह भी दावा किया है कि कुछ लोगों को पकड़ा गया है और कुछ अभी भी पहाड़ियों में पिछपकर इस आंदोलन को आग दे रहे हैं। गहलोत ने मोदी सरकार से गुहार लगाई है, उन्हीं नरेंद्र मोदी से, जिन्होंने गुजरात में सीएम रहते 2002 में हिंदू मुस्लिम दंगों को रोकने के लिये तत्कालीन गहलोत सरकार से सहायता मांगी थी और गहलोत ने सहायता नहीं की थी।

यह है पूरा मामला, जिसको लेकर लड़ाई हो रही है
प्रदर्शन करने वालों का कहना है कि 12 अप्रेल 2018 में शिक्षक भर्ती में 5431 पदों पर भर्ती होनी थी। जिसमें से 45 फीसदी पद एसटी वर्ग, 5 फीसदी एससी वर्ग और शेष 50 प्रतिशत पद सामान्य वर्ग के लिये थे। किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि इन पदों पर केवल सामान्य वर्ग के लोगों का ही सलेक्शन होगा।

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यहां पर जिन 5431 पदों में 2721 पदों पर सामान्य वर्ग के लिये रखा गया था। भर्ती के बाद सामान्य वर्ग के महज 965 जने ही सलेक्ट हुये। इन्हीं पदों पर एसटी वर्ग के 589 जनों का सामान्य वर्ग के अभ्य​र्थियों की भांति ही 60 प्रतिशत अंकों की योग्यता के साथ रीट के लिये सलेक्शन हुआ, किंतु इसके बाद भी सामान्य वर्ग के 1167 पद रिक्त रह गये। इन रिक्त रहे 1167 पदों पर ही एसटी वर्ग के अभ्यर्थी नियुक्ति की मांग कर रहे हैं।

शासन सचिव का पत्र बना आधार
दूसरी ओर अभ्यर्थियों का कहना है कि 16 अप्रेल 2015 को तत्कालीन शासन सचिव आलोक गुप्ता के द्वारा एक पत्र लिखकर उदयुपर, जोधपुर के संभागीय आयुक्त, उदयपुर विकास विभाग के आयुक्त और उदयपुर, डूंगरपुर, चित्तोडगढ़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, राजसमंद और सिरोही के कलेक्टर्स को पत्र लिखकर सारी बात से अवगत करवाया था।

आलोक गुप्ता के पत्र में जिक्र किया गया है कि 16 जून 2013 के आदेश में कहा गया था कि सामान्य वर्ग के लिये अनारक्षित सीटों को आरक्षित नहीं माना जा सकता है। उन्होंने कहा था कि एससी और एसटी वर्ग के आरक्षण के बाद बची हुई 50 प्रतिशत सीटों का मतलब यह नहीं है कि उनको केवल सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से ही भरा जाएगा। क्योंकि यहां पर लड़ाई 5 प्रतिशत एससी और 45 फीसदी एसटी वर्ग के आरक्षण के बाद बची हुई 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग की सीटों पर रिक्त रहे पदों की लड़ाई है।

गतिरोध इसलिये बना हुआ है
दरअसल, रीट भर्ती 2018 के 5431 पदों पर नियुक्ति को लेकर मामला गर्माया हुआ है। यहां पर सामान्य वर्ग की सीटें खाली रह गई हैं, जिनपर एसटी वर्ग के अभ्यर्थी ही नियुक्ति चाहते हैं। जबकि प्रशासन का कहना है कि सामान्य वर्ग की सीटों पर एसटी वर्ग को नियुक्ति कैसे दे दें? असल में यदि एसटी, एससी, ओबीसी, एमबीसी, एसबीसी आरक्षण के बाद जो सीटें बचती हैं, उनपर योग्य उम्मीदवार कोई भी फाइट कर सलेक्ट हो सकता है। ऐसे में यहां पर भी सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को निर्धारित 60 फीसदी से अधिक अंक नहीं आने के कारण सीटें रिक्त रह गई हैं, जिनको लेकर लड़ाई जारी है।

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अगर सामान्य वर्ग की 50 फीसदी सीटों पर एसटी, एससी, ओबीसी, एमबीसी या एसबीसी वर्ग के अभ्यर्थी फाइट कर सलेक्ट होते हैं, तो किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिये। लेकिन डूंगरपुर में 60 फीसदी से कम अंक लाने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी भी बची हुई 1167 सीटों पर अपना दावा कर रहे हैं। उनके द्वारा 60 फीसदी से कम अंक होने पर भी सलेक्शन करने दा दबाव बनाया जा रहा है।