tharpakar cow bharat
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नई दिल्ली।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान आईवीआरआई के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि देसी गायों के ऐसे गुण पाए जाते हैं, जिसकी वजह से वह 22वीं सदी में संभावित बढ़ हुए 2 से 3 डिग्री तापमान के ग्लोबल वार्मिंग में भी पूरी तरह से बेअसर रहेंगी।

अगर 80 साल बाद धरती का तापमान तीन डिग्री तक भी बढ़ता है तो भी भारत की थारपारकर और साहीवाल गायें बिना असर वर्तमान की भांति आराम से दूध देती रहेंगी।

आईवीआरआई ने किए गए अपने ताजा शोध में यह पाया है कि भारत की देसी नस्ल की गाय खुद को आसानी से हर तरह के मौसम के अनूकूल ढाल लेती हैं।

देसी गायों में होता है खास जीन

आईवीआरआई को नेशनल इनोवेशन इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट के तहत पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी थी कि क्या भविष्य में धरती का तापमान बढ़ने पर कौन-कौन नस्ल की गायों पर विपरीत असर नहीं होगा।

इसकी जिम्मेदारी पशु जीव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. एके तिवारी को मिली थी। डॉ. तिवारी ने अपने लगभग 7 साल तक किए गए अध्ययन में यह पाया कि थारपारकर और साहीवाल में अन्य गायों के बजाए एक विशेष जीन पाया जाता है, जो इनको अन्य गायों से विशेष बनाता है।

गायों ने खुद को अनुकूल बना लिया

अपने शोधा में वैज्ञानिकों ने पाया कि लगातार बढ़ते टेंपरेचर के दौरान थापरकर और साहीवाल नस्ल की गायों ने खुद को तापमान के अनुकूल बना लिया। इसमें थारपाकर नस्ल में कुछ विशेष गुणसूत्र मिले हैं, जो उनको अधिक तापमान को भी सहने की क्षमता विकसित करने का काम करता है।

शोध करने वाले डॉ. तिवारी ने बताया कि गुणसूत्रीय अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकला कि संकर नस्ल की विदेशी गायें ज्यादा तापमान को झेल नहीं पाती हैं। लेकिन साहीवाल नस्ल की गायें और थारपारकर गाय बढ़ते ताममान के दौरान खुद को अनूकूल करने में सफल रहती हैं। इसमें भी थारपारकर नस्ल की गायों में अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता अधिक मिली है।

राजस्थान में मिलती हैं थारपारकर और साहीवाल

थारपारकर और साहीवाल नस्ल की गायें राजस्थान में बहुतायत में पाई पाई जाती हैं। यह गायें ज्यादा दूध देने के लिए जानी जाती हैं। यह नस्ल पड़ोसी मुल्क पाक के थारपारकर जिले के नाम से जानी जाती है, इसका उद्गम स्थल वहीं से है।

थारपारकर सफेद रंग की चौड़े माथे और मध्यम कदकाठी की होती है। थारपारकर नस्ल में सूखा पड़ने की स्थिति में खूद को उसके अनुकूल डालने की गुणवत्ता होती है।

गिर गाय, राठी और कांकरेज का होगा अध्ययन

आईवीआरआई के वैज्ञानिक साहीवाल व थारपारकर के शोध के बाद अब गिर, कांकरेज और राठी पर बढ़ते तापमान के असर का अध्ययन करने का काम शुरू कर दिया है। यहां पर एक ऐसा टीका भी तैयार किया जा रहा है, जो तापमान बढ़ोत्तरी के बाद जानवरों कीड़ों पर के प्रकोप की बीमारियों की रोकने कारगर होगा।

टेंपरेचर चेंबर से 22वीं सदी जैसा माहौल बनाया

डॉ. तिवारी ने बताया कि इस शोध के तहत 22वीं सदी जैसी परिस्थितयों के लिए साइकोमेट्रिक चैंबर तैयार किए गए। जिनमें 10-10 गायों के 3—3 ग्रुप बनाकर उनमें रखा गया। इन ग्रुप्स में थारपारकर, साहीवाल और संकर नस्ल की गायें शामिल की गईं।

चैंबरों का तापमान बढ़ाकर उसमें गायों को शिफ्ट में 6-6 घंटे रखा। क्योंकि अधिकतम टेंपरेचर कुछ घंटे के लिए ही होता है, इसलिए 6-6 घंटे के स्लॉट लिए गए। इन 6 घंटो में गायों के शरीर में हुए बदलाव के आंकड़े तैयार कर अध्ययन किया गया।

चुनकर करानी होगी ब्रीडिंग
डॉ. तिवारी ने बताया कि आने वाले समय में ताममान में बढ़ोतरी होगी। ऐसे में जिन जानवरों में तापमान सहने की क्षमता अधिक है, उनमें सलेक्टिव ब्रीडिंग करवानी होगी, ताकि आने वाले समय में उनकी नई जनरेशनल वैसी ही पैदा हो।

आज की बात करते हुए डॉ. तिवारी बताते हैं कि संकर नस्ल को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि यह अधिक समय तक रहने वाली नहीं है, हमें फिर से देसी नस्ल पर जाना होगा।

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