आखिर क्यों नहीं बना राजस्थान में ‘जाट मुख्यमंत्री’?

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-राजस्थान का रण….जाट बनाम कांग्रेस…………

कांग्रेस में जाट मुख्यमंत्री बनने की कहानी शुरू होती है 1972 में। रामनिवास मिर्धा से
राजस्थान में दो बार कांग्रेस विधायक दल के नेता के चुनाव में 1972 में रामनिवास मिर्धा व 2008 में शीशराम ओला ने सीधा मुकाबला किया, मगर दोनों ही बार उनको हरा दिया गया।

1972 में ब्राम्हण समाज के हरिदेव जोशी व 2008 में माली समाज के अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बन गये।
दोनो ही बार जाट मुख्यमंत्री बनने से रह गये। राजस्थान में 7 अप्रैल 1949 से लेकर अब तक 24 मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

जिनमें ब्राम्हण 8 बार, बनिया 5 बार, मुस्लिम 1 बार, राजपूत 5 बार, खटीक एक बार, कायस्थ 2 बार और 2 बार माली समाज से मुख्यमंत्री बने हैं।

मगर इस सूची में जाट समाज के एक भी व्यक्ति का नाम नहीं हैं। आबादी के हिसाब से जाट समाज राजस्थान में सबसे अधिक है, करीब एक चौथाई आबादी के उपरान्त भी जाट समाज का अब तक राजस्थान मुख्यमंत्री नहीं बन पाना जाटों की उपेक्षा को ही दर्शाता है। राजस्थान में जाट मतदाता शुरू से ही कांग्रेस समर्थक रहे हैं।

आजादी के बाद से जाट समाज कांग्रेस के पक्ष में एकजुटता से मतदान करता रहा है। जाटों के वोटों से कांग्रेस ने राजस्थान में करीबन 48 वर्षों तक राज किया।ऐसा नहीं था कि राजस्थान में जाटों में कोई प्रभावशाली नेता नहीं थे, जो मुख्यमंत्री नहीं बन सके, ऐसी बात नहीं थी।

राजस्थान में प्रभावशाली जाट नेताओं की कमी नहीं थी।
आजादी के बाद से ही सरदार हरलाल सिंह, कुम्भाराम आर्य, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, कमला, दौलतरात सारण, परसराम मदेरणा, सुमित्रा सिंह, रामनारायण चौधरी, शीशराम ओला, नारायण सिंह, बलराम जाखड़, ज्ञानसिंह चौधरी, कुंवर नटवर सिंह, रामदेव सिंह महरिया, डॉ. हरिसिंह, मनफूल सिंह भादू अपने जमाने के प्रभावशाली जाट नेता हुए।

जिनके प्रभाव के सामने मुख्यमंत्री भी घबराते थे। इनमें से कई नेताओं ने मुख्यमंत्री बनने का प्रयास भी किया, मगर कांग्रेस में जाट विरोधी लाबी ने जाट का मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। वर्तमान में राजेन्द्र चौधरी, हेमाराम चौधरी, विश्वेन्द्र सिंह, महादेव सिंह खण्डेला और रामेश्वर डूडी जैसे जाट नेता हैं, जो आज भी प्रभाव रखते हैं, मगर उन्हे नेतृत्व करने का मौका नहीं दिया जा रहा है।

रामेश्वर डूडी निवर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। वह पूर्व में बीकानेर के सांसद व जिला प्रमुख भी रह चुके हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद गत पांच वर्षों में उन्होंने राजस्थान के सभी क्षेत्रों में दौरे कर कांग्रेस को मजबूत करने का काम किया है। उन्होंने विधानसभा में भी अपनी प्रभावी भूमिका निभाई।

इसके बावजूद भी राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार माली समाज के अशोक गहलोत व गुर्जर समाज के सचिन पायलट को ही माना जा रहा है। मुख्यमंत्री के दावेदारों में किसी जाट नेता का नाम नहीं होना जाट समाज की उपेक्षा को ही दर्शाता है।

राजस्थान में 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सबसे बड़ा कारण राजस्थान की प्रभावशाली जाट जाति का कांग्रेस से दूर होना माना जाता है। राजस्थान के 20 जिलों की करीबन 80-90 ऐसी सीट हैं, जिन पर हार जीत का फैसला जाट मतदाता ही करते हैं।

इन सीटों पर जाट मतदाताओं का खासा प्रभाव माना जाता रहा है। 2003 से पहले जाट समाज के प्रदेश में 35 से 40 विधायक जीत कर आते थे, उनमें से अधिकांश कांग्रेस पार्टी से जीतते रहे थे, क्योंकि जाट मतदाताओं को राजस्थान में कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता रहा था।

मगर 2003 में स्थिति बदली और जाट मतदाताओं का कांग्रेस से मोह भंग हुआ। जाटों के कांग्रेस से दूर जाने से प्रदेश में कांग्रेस को इतिहास की सबसे बुरी हार देखनी पड़ी थी।

2013 में तो कांग्रेस मात्र 21 सीटों पर ही सिमट गयी। आजादी के बाद से ही जाट कांग्रेस को वोट देते आये थे। इस कारण कांग्रेस ने जाटो को अपने वोट बैंक के रूप में ही इस्तेमाल किया। जाटों के सर्वाधिक विधायक जीतने के बाद भी कांग्रेस ने कभी जाट समाज के किसी नेता को प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनाया।

राजस्थान कांग्रेस में 1988 से अशोक गहलोत प्रभावी रहें हैं। प्रदेश की पूरी कांग्रेस पार्टी उनके इर्द-गिर्द ही परिक्रमा करती रही है। इस दौरान गहलोत कई बार प्रदेशाध्यक्ष व दस वर्षों तक राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। गहलोत ने गत तीस वर्षों में एक-एक कर प्रभावशाली जाट नेताओं को किनारे किया, बल्कि उनका राजनीतिक कैरियर ही खत्म कर दिया।

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गहलोत ने रामनिवास मिर्धा, डॉ. बलराम जाखड़, कुंवर नटवरसिंह, शीशराम ओला, डॉ. हरिसिंह, नारायण सिंह, राजेन्द्र चौधरी, कर्नल सोनाराम जैसे प्रभावी जाट नेताओं को कमजोर करने का हर संभव प्रयास ही नहीं किया, बल्कि जाटों के नाम पर ऐसे लोगों को आगे बढ़ाया जिनका जाट मतदाताओं पर ज्यादा असर नहीं था।

ऐसा करने के पीछे गहलोत का एकमात्र मकसद यही रहा था कि राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री का मुद्दा दबा रहे।

गहलोत ने अपनी मंडली में डाॅ. चन्द्रभान, लालचन्द कटारिया, हरीश चौधरी, ज्योति मिर्धा, बद्रीराम जाखड़, महादेव सिंह खण्डेला, नरेन्द्र बुडानिया, राजाराम मील जैसे जाट नेताओं को आगे बढ़ाया, जिनका अपना कोई जनाधार नहीं। वे सिर्फ गहलोत के नाम पर ही राजनीति करते रहें हैं। राजस्थान कांग्रेस के वर्तमान में सिर्फ 6 जाट विधायक हैं, जो मात्र चार जिलों से ही है।

राजस्थान के 29 जिलो में कांग्रेस का कोई जाट विधायक नहीं हैं। कांग्रेस से जीते 6 विधायकों में सीकर जिले से नारायण सिंह, गोविन्द डोटासरा, झुंझुनू से बिजेन्द्र ओला, श्रवण कुमार, बीकानेर से रामेश्वर डूडी व भरतपुर से विश्वेन्द्र सिंह शामिल हैं।

बाकी सभी जाट नेता चुनाव हार गये। सबसे बुरी हार का सामना तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डाॅ. चन्द्रभान को करना पड़ा था, उनकी ना केवल जमानत ही जब्त हुई, बल्कि वो करीबन पन्द्रह हजार मतों पर ही सिमट गये थे। प्रभावशाली जाट नेता शीशराम ओला, परसराम मदेरणा का निधन हो चुका है।

इस विधानसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस को यदि वर्तमान स्थिति से बचाना है तो पार्टी को अपने नाराज जाट मतदाताओं को अपने पाले में लाना होगा।

इसके लिये कमजोर व चापलूस छवि वाले जाट नेताओं के स्थान पर उन प्रभावशाली जाट नेताओं को आगे लाना होगा, जिनके कहने पर जाट मतदाता वोट डाल सकते हैं।

प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष चौधरी नारायण सिंह, नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी, हरेन्द्र मिर्धा, राजेन्द्र चौधरी, सुचित्रा आर्य को कांग्रेस में आगे लाना चाहिये। इनमे से काफी नेताओं को तो कांग्रेस ने टिकट तक नहीं दिया है।

निर्दलीय जाट विधायक हनुमान बेनीवाल प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस के खिलाफ तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

हालांकि उनके ऊपर भी लोग बीजेपी से मीले हुए होने का आरोप लगा रहे हैं, जिसकी सच्चाई समय आने पर पता चल जाएगी।

हनुमान बेनीवाल को जाट समाज का भरपूर साथ मिल रहा है। उनकी रैलियों में लाखों की भीड़ उमड़ चुकी है, जो यह दर्शाती है कि इस बार जाटों ने हनुमान बेनीवाल का साथ देने की ठान ली है।

हनुमान बेनीवाल भी जाट मुख्यमंत्री बनने की बात का खुलकर समर्थन कर चुके हैं। यदि इस विधानसभा चुनाव में जाट हनुमान बेनीवाल के समर्थन में आ जाते हैं तो फिर उनको कोई ताकत नहीं रोक पाएगी।
(पी. चंगल)

नोट:-यह लेखक के निजी विचार हैं।