जयपुर।

किसान और कांग्रेस दोनों की एक ही राशि है।साथ भी बरसों पुराना है, जब युग हुआ करता था राजे -रजवाड़ो का, जब भरी जाती थी जमींदारी प्रथा के खिलाफ हुंकार। तब कांग्रेस की कोख से जन्म किसान नेताओं ने सामंती-जागीरदारी प्रथा के खिलाफ अलख जाई और किसान आंदोलन का सूत्रपात किया।

अब फिर लगता है कि राशि की महादशा शुरु हुई है। कांग्रेस के चुनावों में किये गये किसानों से वायदों ने तीन राज्यों में जीत दिला दी। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का किसान फेक्टर सबके सामने।

उन्होंने बुधवार को जयपुर में हुई किसान सभा में साफ कह दिया कि देश में कांग्रेस सरकार बनी तो हर राज्य में किसान के कर्ज माफ किये जायेंगे।

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40 से 50के दशक के बीच जमींदारी प्रथा के खिलाफ राजस्थान में किसान आंदोलन का बिगुल बज गया था। मारवाड़ से लेकर शेखावाटी तक हर ओर सामंती-जागीरदारी प्रथा के खिलाफ किसान आंदोलन ने हिंलौरे लेना शुरु कर दिया था। देश को आजादी मिली तो आंदोलन को और धार मिल गई।

उस समय देश की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस का भी आंदोलन के प्रति समर्थन आ गया। आगे चलकर 1952 के चुनावों मे किसान आंदोलन के प्रणेता कांग्रेस के साथ खड़े हो गये तो राजे-रजवाड़ो से निकले नेताओं ने अलग पार्टी का गठन कर लिया।

किसान नेता आगे चलकर कांग्रेस पार्टी की बैक बॉन साबित हुये। इनमें सबसे प्रखर नाम रहा चौधरी बलदेव राम मिर्धा का। किसान आंदोलन को ख्याति दिलाने में बलदेव राम मिर्धा का योगदान रहा।

धीरे-धीरे किसान और कांग्रेस की राशि साथ साथ दिखने लग गई। नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, चौधरी हरलाल सिंह, कुंभाराम आर्य, दौलतराम सारण, परसराम मदेरणा, शीशराम ओला, रामनारायण चौधरी, रामदेव सिंह महरिया,नारायण सिंह सरीखे दिग्गज नेताओं ने किसानों के बीच सामाजिक औऱ राजनीतिक चेतना की अलख जगाई।

इन नेताओं का कांग्रेस पार्टी से जुड़ाव रहा। हरियाणा के किसान नेता सर छोटूराम के विचारों का राजस्थान की किसान राजनीति पर असर दिखा। सियासत में किसान नेताओं ने कांग्रेस को भी परवान चढाने का काम किया भले ही क्षेत्र कोई भी रहा।

किसान नेता मिर्धा परिवार का सियासी गढ़ नागौर रहा। शेखावाटी का झुंझुनूं क्षेत्र ओला परिवार की सियासी जमीन के तौर पर कांग्रेस का गढ़ रहा है।

झुंझुनूं के गुढा गौड़जी के गिलों की ढाणी की झौंपड़ी में रहने वाले शिवनाथ सिंह गिल ने बिरला परिवार को चुनाव हराकर यह जत्ता दिया था कि क्यों राजस्थान को किसान पॉलिटिक्स का केन्द्र कहा जाता है।

देश के प्रखर किसान नेता औऱ पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल ने हरियाणा से आकर शेखावाटी की धरती से चुनाव लड़ा। बलराम जाखड़ भी यहां चुनाव लडने के लिये आये थे।

राजस्थान की सियासत में किसान हमेशा से ही पॉवर सेंटर रहे हैं। राहुल गांधी या उनके सलाहकार इस बात को बखूबी समझते थे। लिहाजा उन्होंने राजस्थान के विधानसभा चुनावों से पहले ही कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र में किसान कर्ज माफी से जुड़ी घोषणाएं कराई।

सरकार बनने के 10दिन के अंदर घोषणा को सरकारी अमलीजामा पहनाया। राहुल गांधी और उनकी पार्टी का किसान प्रेम साफतौर पर दिखने लगा अब इसी प्रेम के सहारे लोकसभा चुनाव की नैया भी पार लगाना चाहते है।

उनकी बताई राह पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट आगे बढ़ रहे है।

राजस्थान में प्रत्येक जाति से जुड़े लोग किसान वर्ग में समाहित माने जाते है प्रमुख तौर जातियां जाट, माली, गुर्जर, विश्नोई, मीना को खेतीहर माना जाता रहा है।

ओबीसी, मूल ओबीसी और एसबीसी वर्ग के अंदर अधिकांश तौर पर किसान कौम से जुड़े वर्ग है, लेकिन ब्राह्मण, राजपूत, दलित वर्ग के अंदर कई ऐसी उपजातियां हैं जो किसान वर्ग में आती हैं।

यूं कह सकते है किसान कार्ड खेलकर सियासत को साधा जा सकता है। कांग्रेस पार्टी ने अपने शासनकालों के दौरान इसे साधने का काम किया था। भैंरो सिंह शेखावत ऐसे पहले गैर कांग्रेसी नेता थे जिन्होंने इस बात को समझा कि परिस्थितियां बदली जानी चाहिये।

लिहाजा उन्होंने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे दिग्गज किसान नेताओं को अपने साथ जोड़ा इनमें गंगाराम चौधरी सरीखे नेता प्रमुख रहे। शेखावत के प्रयोग का राजस्थान की बीजेपी को लाभ मिला।

वसुंधरा राजे ने तो किसान राजनीति में बीजेपी की जड़े जमाने का काम किया और कांग्रेस के वजूद वाले किसान बेल्ट में सेंध लगाई। किसान राजनीति की दूसरी धारा राजस्थान में साम्यवादियों की रही, जिनमें प्रमुख तौर पर श्योपत सिंह मक्कासर, हेतराम बेनीवाल, कॉमरेड़ अमराराम जैसे दिग्गज नेता रहे, जिन्होंने लाल सलाम का झंडा किसानों के बीच बुलंद रखा।

कांग्रेस ने किसान राजनीति में जब भी मध्यम मार्ग तब तब उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। राहुल गांधी ने मध्यम मार्ग को बदलने का काम किया और जो कहा उसे अपनी सरकारों से तत्काल लागू करने को कहा।

मकसद साफ है कि किसान पॉलिटिक्स सधे अंदाज में होनी चाहिये जिसका राजनीतिक लाभ समय रहते मिले। जाहिर जो किसान वोट कांग्रेस से छिटका है और राशि में जो ग्रहण लगा था उसे दूर किया जाये।

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