आंकड़े बताते हैं, जाट समाज के ड़र से गहलोत को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं कर पा रही कांग्रेस!

5203
nationaldunia
- नेशनल दुनिया पर विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें 9828999333-
dr. rajvendra chaudhary jaipur-hospital

जयपुर।

राजस्थान में करीब 16 फीसदी, जो कि एक समाज के हिसाब से देखा जाए तो सबसे बड़ा समुदाय है जाट। यह समुदाय प्रदेश की सबसे बड़ी मतदाता कौम भी है। जाट समाज साल 1998 से कांग्रेस पार्टी से नाराज है।

यही नाराजगी है, जो इस बार अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने में सबसे बड़ी बाधा है। सर्व विदित है कि जाट समाज गहलोत द्वारा परसराम मदेरणा दरकिनार कर खुद मुख्यमंत्री बनने के राजनीतिक करियर को बर्बाद करने का दोषी मानता है।

प्रदेश में साल 1998 के विधानसभा चुनाव जाट मुख्यमंत्री के नाम पर लड़ते हुए कांग्रेस ने सत्ता हासिल की थी। तब परसराम मदेरणा के कारण समाज ने एकतरफा कांग्रेस को सपोर्ट किया था, जिसके चलते पार्टी को प्रदेश में भैंरूसिंह शेखावत के जादू के कारण लंबे समय बाद बहुमत मिला।

लेकिन ऐन वक्त पर सियासी होशियारी दिखाते हुए गहलोत ने परसराम मदेरणा को पीछे धकेल दिया और सीएम की कुर्सी ह​थियाने में कामयाब हो गए। तब मदेरणा काफी समय तक कांग्रेस से नाराज रहे। समाज के बुर्जुग कहते हैं कि उस दौरान जाट समाज की विभिन्न मीटिंग्स में समाज के लिए यह विषय काफी चर्चा में रहा। तब समाज ने यह ठान लिया कि कांग्रेस से इसका बदला लिया जाएगा।

ऐसे समय में भाजपा ने 2003 में वसुंधरा राजे को अपना नेता बनाकर भेजा और जाट समाज को बदला लेने का मौका मिल गया। वसुंधरा राजे ऐसा चेहरा था, जिसको जाट और राजपूतों ने बराबर तवज्जो दी। राजपूतों की बेटी और जाटों की बहु बनकर राजे ने 120 सीट जीतकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने में कामयाबी पाई।

इस दौरान कांग्रेस की ऐसी हा​लत हुई कि 150 सीटों के साथ बहुमत वाली पार्टी महज 56 सीटों पर सिमट कर रह गई। ऐसी हालत इतिहास में कांग्रेस की कभी नहीं हुई थी। यह गहलोत पर जाट समुदाय के गुस्से और राजे के पक्ष में जाने का ही परिणाम था।

2008 में सीएम राजे और तत्कालीन अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर के बीच टिकट बंटवारे के कारण पार्टी अंतर्कलह में उलझ गई। परिणाम यह निकला कि जो पार्टी सत्ता में बहुमत के साथ रिपीट होने को तैयार थी, वह कांग्रेस से भी कम सीटें हासिल कर पाई। भाजपा को 79 और कांग्रेस को 96 सीट पर जीत मिली।

इस दौरान बसपा के 6 विधायकों ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। भाजपा से अलग होकर अपनी पत्नी गोलमा देवी को जिताने वाले किरोड़ीलाल मीणा ने भी कांग्रेस को पहले सरकार में मंत्री बनाकर और फिर बाहर से समर्थन दे दिया।

उसके बाद साल 2013 में एक बार फिर से एकजुटता दिखाते हुए भाजपा ने ताकत लगाई। जिसपर तड़के का काम किया नरेंद्र मोदी लहर ने। बीजेपी ने इस बार सारे रिकॉर्ड धवस्त करते हुए 163 सीटों के साथ प्रचंड बहुत हासिल किया।

पांच साल पूरे होने और प्रदेश में ​कथित तौर पर राजपूतों की नाराजगी के कारण कांग्रेस सत्ता का सुख भोगने की कल्पना कर रही है, लेकिन इसके बावजूद अपना सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं कर पा रही है।

बीते दो साल से सचिन पायलट और अशोक गहलोत खुद का सीएम फेस घोषित करने के लिए शीतयुद्ध लड़ रहे हैं। इधर, भाजपा सीएम राजे को फिर से मुख्यमंत्री का चेहरा बना चुकी है। जिसको लेकर बीजेपी कांग्रेस पर हमलावर भी है।

अब बात करते हैं गहलोत को फिर से मैदान में नहीं उतारने के कारणों का। दरअसल, सचिन पायलट बीते पांच साल से कांग्रेस को संभालने का काम कर रहे हैं। महज 21 सीटों पर सिमटी कांग्रेस को पांच साल में पायलट 25 तक ले आए हैं।

इधर, गहलोत पर 2003 और 2013 में चुनाव हारने का ठप्पा भी लगा हुआ है। सियासी जानकारों की मानें तो 1998 में और 2008 में कांग्रेस को सत्ता मिलने का करण कतई गहलोत नहीं थे।

1998 के वक्त तो निर्विवाद रुप से मदेरणा के दम पर 156 सीटों पर कामयाबी मिली थी। उसके बाद 2008 में भी बीजेपी केवल अपनी पारिवारिक लड़ाई में उलझकर रह गई और बसपा के सहारे कांग्रेस सत्ता में लौट सकी।

भले ही वक्त 20 साल का गुजर चुका है, लेकिन जाट समाज का गुस्सा 1998 की तरह अभी भी गहलोत पर उसी तरह से बरकरार है। वसुंधरा राजे को जाट समाज में गलत नहीं माना जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस चाहकर भी गहलोत को सीएम उम्मीदवार नहीं बना पा रही है।

अब निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल के रुप में जाट समाज को नया विकल्प मिल गया है। 2014 में हारे हुए हरीश चौधरी, नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी जैसे नेता भले ही कांग्रेस में हो, लेकिन बावजूद इसके समाज को अब भी कांग्रेस पर भरोसा नहीं है।

समाज का मानना है कि गहलोत जब तक कांग्रेस पार्टी में किसी कद में हैं, तब तक इस समाज को प्रमुखता नहीं दी जाएगी। यह बात कांग्रेस भी जानती है, जिसके कारण ही 16 फीसदी मतदाताओं को नाराज करने की पार्टी रिस्क नहीं ले पा रही है।

अब तो परसराम मदेरणा ही नहीं शीशराम ओला, नाथूराम मिर्धा और रामनिवास मिर्धा सरीखे नेता भी कांग्रेस ही नहीं दुनिया से विदा हो चुके हैं। ऐसे में जाट समाज को फिर से कांग्रेस के साथ जोड़ पाना बेहद कठिन काम है।

बहराहल, झुंझुनूं, सीकर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चूरू, नागौर, अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, पाली, भरतपुर, धौलपुर समेत कई जिलों की कम से कम 90 सीटों पर जीत के लिए किसी भी पार्टी को जाट समाज को मनाना ही होगा।

खबरों के लिए फेसबुक और ट्वीटर और यू ट्यूब पर हमें फॉलो करें। सरकारी दबाव से मुक्त रखने के लिए आप हमें paytm N. 9828999333 पर अर्थिक मदद भी कर सकते हैं।