जयपुर।

राजस्थान में 2013 के चुनाव में 163 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत से जीतकर आई भारतीय जनता पार्टी वाली वसुंधरा राजे सरकार का 11 तारीख को विधानसभा चुनाव परिणाम के साथ ही अंत हो गया।

भारतीय जनता पार्टी बीते 1 साल से राजस्थान में 180 सीटों पर जीत का दावा करते हुए उसी के अनुकूल चुनाव प्रचार की तैयारियों में जुटी हुई थी, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने उनके सारे सपनों पर पानी फेर दिया।

हालांकि, राजस्थान की जनता ने कांग्रेस पार्टी को भी पूर्ण बहुमत नहीं दिया। जिसके चलते बहुमत से 2 सीट कम कांग्रेस 99 सीटों पर विजय हासिल कर पाई। एक सीट पर आरएलडी के विधायक जीते हैं। इसके अलावा 6 विधायक बहुजन समाजवादी पार्टी के हैं, जिन्होंने कांग्रेस को समर्थन दे दिया है।

दोनों पार्टियों के बीच वोटों का अंतर बहुत अधिक नहीं होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के क्षेत्र विधायक जीतने में कामयाब हुए हैं। भाजपा को 1.37 करोड़ से ज्यादा वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 1.38 करोड़ मत हासिल हुई हैं।

यानी दोनों के बीच केवल 1.63 लाख वोटों का अंतर रहा है। वोट प्रतिशत की बात करें तो दोनों के बीच महज .50% का फर्क रहा है। बीजेपी सरकार के 30 में से 20 मंत्री चुनाव हार गए।

कांग्रेस के 99, भाजपा के 73, बसपा के 6, पहली बार चुनावी समर में उतरी हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के 3, वामपंथियों के 2 और बाकी निर्दलीय विधायक जीतकर आये हैं।

बहुमत हासिल नहीं कर पाई और मुख्यमंत्री के साथ उप मुख्यमंत्री भी बनाए गए हैं। इस तरह यह कांग्रेस की डेढ़ टांग की सरकार कही जा रही है। इससे पहले राजस्थान में 2008, 1993, 1990 में भी अपूर्ण बहुमत (अल्पमत) की सरकारें बनी थीं।

इससे पहले वर्ष 2008 में उठापटक की सरकार रही। साल 1993 के दौरान मुख्यमंत्री भैंरु सिंह शेखावत और भाजपा के दिग्गज हरिशंकर भाभड़ा के बीच खूब खींचतान थी। उससे पहले 1990 में भी भैंरु सिंह शेखावत की सरकार थी, लेकिन वह भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई।

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