नई दिल्ली।

एक दिन बाद फरवरी का महीना शुरू होने वाला है। केंद्र सरकार समेत तकरीबन सभी राज्य सरकारें फरवरी माह में अपना-अपना सालाना बजट पेश करेंगी।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जहां अपना अंतरिम बजट पेश करेगी, वहीं राजस्थान की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार अपना पहला बजट पेश करने जा रही है।

दोनों ही सरकारों से राज्य के किसानों को बड़ी उम्मीदें हैं। अन्नदाता कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है, तो दूसरी तरफ उसकी आय दोगुनी करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते साडे 4 साल से प्रयासरत हैं।

देखना अब यह होगा कि किसानों की उम्मीदों को यह दोनों बजट कैसे पूरा करते हैं, और आने वाले 5 साल के दौरान किसानों की आय पर इन बजट के माध्यम से क्या प्रभाव पड़ता है।

हम इस बीच आपको किसानों की प्रमुख मांगों की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। आइए इन बिंदुओं में समझिए। प्रदेश के किसानों की क्या-क्या खास मांगे हैं, जो सरकारी बजट में पूरा कर सकती है-

  1. किसानों की आज सबसे बड़ी समस्या बैंकों से लिया गया कर्ज़ है। और उससे भी बढ़कर साहूकारों से लिया हुआ मोटा लोन है, जो बेहिसाब है। उसको लेकर सरकार को कोई स्थाई उपाय करना चाहिए।
  2. न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर किसानों की फसल खरीद नहीं हो पाने के कारण उसे मंडी और लड़कियों को औने पौने दामों में बेचना पड़ता है। जिसके चलते किसान की फसल उत्पादन की लागत नहीं निकलती है और वह लगातार कर्जे में दबदबा चला जाता है।
  3. परिवार बढ़ने के चलते होने वाले बंटवारे के कारण किसानों की जोत लगातार छोटी होती जा रही है। यह एक ऐसी समस्या है जिसके चलते किसान को प्रॉफिट नहीं हो पाता है। छोटी जोत होने के कारण अन्नदाता पर्याप्त मात्रा में फसल उत्पादन भी नहीं कर पाता है और किसानी को छोड़ भी नहीं पाता है। इससे उसकी आर्थिक स्थिति नहीं सुधर पाती है। इस पर भी सरकारों को ध्यान देना चाहिए।
  4. किसान कर्ज माफी की बात तो हर एक राजनीतिक दल करता है, सरकारी करती है, किंतु खेती किसानी को किस तरह प्रॉफिट में लाया जाए, इस बात पर किसी का ध्यान नहीं है। एमएसपी पर क्रय नहीं होने पर किसान द्वारा उत्पादन की गई फसल, अन्न और तिलहन बाजार में बेहद कम दरों पर बिकता है। जिसके कारण किसान की लागत नहीं निकलती है, और अंततः उसे एक बार फिर से बैंकों से और साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि किसानों के उत्पादन के ऊपर एक निश्चित आएगा इंतजाम किया जाए।
  5. परिवार बढ़ने के साथ बेटे-पोतों में जमीन का बंटवारा तो हो जाता है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में ज़मीने दादा और परदादा ओं के नाम ही रहती है। जिसके चलते ओलावृष्टि और अतिवृष्टि के वक्त किसानों को मिलने वाला मुआवजा किसी एक जने की हाथ में होता है। परिणाम यह निकलता है कि खेती करने वाला, मुआवजे का हकदार व्यक्ति रह जाता है, जबकि दूसरा आदमी उसका लाभ ले लेता है। इसी तरह से बटाई में खेती होती है, जिसमें खेती करने वाले के नाम जमीन नहीं होती है। जमीन किसी साहूकार या जमीदार के नाम होती है और उसके सब्सिडी समेत सभी लाभ मालिक लेता है, खेती करने वाला केवल नुकसान का हकदार रह जाता है।
  6. घटते जलस्तर के कारण सिंचाई के लिए पानी की कोई व्यवस्था नहीं होती है। नतीजा अधिकांश वक्त अन्नदाता को प्रकृति के भरोसे रहना पड़ता है। कभी अधिक बरसात तो कभी सूखा किसान को कभी पनपने नहीं देता है। यदि देश में सभी नदियों को जोड़ दिया जाए, तो सिंचाई की समस्या का समाधान संभव है।
  7. वैसे तो राज्य सरकार के द्वारा बीते 5 बरस के दौरान बिजली के बिलों में भर्ती नहीं की गई और नवंबर माह से 5 एचपी तक के कनेक्शन पर राज्य सरकार ₹833 प्रतिमाह सब्सिडी भी देती है, लेकिन पानी जमीन में काफी नीचे चला गया है, इसलिए किसान को 10 एचपी की मोटर लगानी पड़ती है। राज्य सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी के बावजूद किसान के ऊपर बिजली का भार बढ़ गया है। किसान को खेती के लिए बिल्कुल मुफ्त बिजली बिजली दी जानी चाहिए, चाहे मोटर कितने भी एचपी की हो।
  8. न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर उत्पादन खरीद के लिए पर्याप्त केंद्र होने चाहिए और भंडारण की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि एक बार एक सीजन में राज्य के सभी किसानों द्वारा की गई खेती का भंडारण किया जा सके। इससे किसान को तुरत-फुरत में ओने-पौने दामों में अपनी फसलें बेचने नहीं पड़ेगी, और उसको सही समय पर, सही दाम दिए जा सकेंगे।