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-कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन से इनकार के पीछे यही कारण बताया जा रहा है।

जयपुर। साल 2008 में कांग्रेस के अशोक गहलोत सरकार को बनाने में सबसे मददगार साबित होने वाले विधायकों की बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन से साफ इनकार कर दिया है।

बसपा प्रमुख मायावती ने साफ कर दिया कि आगामी विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं करेगी। बसपा के इस इनकार के साथ ही अशोक गहलोत के द्वारा किए जा रहे प्रयास भी धराशाही हो गए।

हालांकि कांग्रेस में टिकट की आस लगाए एक दर्जन लोगों को राहत मिली है। साथ ही सचिन पायलट के द्वारा किसी के साथ गठधंन नहीं करने के विचार ने भी स्वत: ही साकार रुप अख्तियार कर लिया है।

इधर, राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि तेजी से इस बात पर मंथन जारी है कि राजस्थान में पांच साल से सरकार के लिए मुसीबत बने हुए निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल और बसपा मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।

बताया जा रहा है कि दोनों के बीच इस मसले पर दो बार बात भी हो चुकी है, लेकिन अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इससे संभावना जताई जा रही है कि अगले एक-दो सप्ताह में बड़ी सियासी उठापटक हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि पांच साल के दौरान बेनीवाल ने पश्चिमी राजस्थान के चार जिलों में एक लाख लोगों से अधिक की रैलियां कर यह साबित कर दिया है कि एक बड़ा जनसमूह उनके साथ है।

बसपा को साल 2013 के चुनाव में 3.7 फीसदी वोट मिले थे, जबकि वर्ष 2008 में 7.5 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। बसपा का राजस्थान के धौलपुर, उदयपुरवाटी, बानसूर, बांदीकुई, करौली, दौसा, गंगापुर, बाड़ी, सार्दुपुर, नवलगढ़, नगर और खेतड़ी में खासा प्रभाव है।

बसपा 2008 में इन्हीं में से 6 सीटों पर चुनाव भी जीत चुकी है। इधर, बेनीवाल जिस तरह से पश्चिमी राजस्थान में भीड़ जुटा रहे हैं, उससे साफ है कि यदि दोनों के गठबंधन होता है, तो भाजपा-कांग्रेस के लिए मुसीबत हो सकती है।

सियासी चर्चा यह भी है कि बेनीवाल और मायावती के साथ ही तीसरे मोर्चे के रुप में भाजपा छोड़कर नई पार्टी बना चुके सांगानेर विधायक घनश्याम तिवाड़ी भी साथ आ सकते हैं।

भाजपा से अपने अपमान का बदला लेने और कांग्रेस को हराने के लिए तिवाड़ी इन दोनों से हाथ मिला सकते हैं। तिवाड़ी और बेनीवाल के बीच तालमेल से राजनीति के जानकार अच्छे से वाकिफ हैं।

हालांकि, तिवाड़ी ने दावा किया है कि वो सभी 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे, लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि चुनाव के वक्त इन तीनों में गठबंधन हो सकता है।

यह भी सच है कि वैचारिक रुप से मायावती और तिवाड़ी में दूरियां हैं, लेकिन राजनीति में कहावत ही है कि ‘कोई दोस्त और दुश्मन स्थाई नहीं होते।’