bjp foundation day 39-6-April 1980
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कुछ ही दिनों के बाद हमारे भारतवर्ष की लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद यानीए 19वीं लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं।

अगर राष्ट्रहित में सोचा जाए तो यह चुनाव किसी को सांसद या मंत्री बनाने का नहीं है। परन्तु दो प्रमुख विचारधाराओं का चुनाव है.. एकतरफ मां भारती को परम शिखर पर प्रस्थापित करनेवाली, पंचनिष्ठा से प्रेरित सर्व स्पर्शी समावेश की अवधारणा के साथ सबको लेकर चलने वाली राष्ट्रवादी विचारधारा है तो दूसरी तरफ केवल मात्र एक परिवारवादी विचारधारा।

आज वैश्विक युग है, हर क्षेत्र में त्वरित प्रतिद्वंद्विता का आगाज हो चुका है। चाहे व्यापार हो, विज्ञान और तकनीक हो या फिर अंतरिक्ष हो सभी जगह वैश्विक स्तर पर अपना वर्चस्व स्थापित करने हेतु सभी देश निरंतर प्रयासरत हैं।

इसी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में हमारा भारत वर्ष भी शामिल है और जब बात प्रतिस्पर्धा की होती है तो सफलता के लिए निष्ठा का होना अति आवश्यक हो जाता है।
निष्ठा शब्द विराट स्वरूप रखता है जिसकी अनेकों व्याख्या की जा सकती हैं।

स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन भारतवर्ष में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत अवश्य हुई लेकिन विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो यह कहा जा सकता है की वर्षों तक भारत के वैश्विक विकास हेतु राष्ट्र को सर्वोच्च मानते हुए सटीक और दूरगामी निर्णय कम हुए क्योंकि किसी न किसी रूप में व्यक्तिगत निजी स्वार्थों का महत्व रहा।

आज भी विश्लेषकों और राष्ट्रहित के लिए निस्वार्थ समर्पित विचारकों के लिए यह एक विचारणीय प्रश्न है कि भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश की स्वतंत्रता के पश्चात यह क्यों कहा की एक राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस को समाप्त हो जाना चाहिए?

हमारा भारत प्राचीन समय में भी विश्व गुरु रहा है पूरे विश्व को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाली
भारत माता के निस्वार्थ समर्पित सपूतों को जब यह महसूस हुआ की मां भारती के सम्मान की रक्षा और देशवासियों के जीवन स्तर में सकारात्मक सुधार हेतु लोकतंत्र में जनता की आवाज बनना होगा तब उन्होंने जनसंघ की स्थापना की जो राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य लेकर 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी में बदल गई।

भारतीय जनता पार्टी भारत के विश्व गुरु के ताज की पुनः प्राप्ति हेतु पंच निष्ठा के सिद्धांत पर जनसेवा के सर्वोपरि लक्ष्य को लेकर राजनीति करती है।

ये पंच निष्ठा हैं (1) सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता, (2)लोकतंत्र, (3) गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना (4) सकारात्मक पंथ निरपेक्षता (5) मूल्य आधारित राजनीति

आज के भारत वर्ष की वर्तमान परिस्थितियों में इन पंच निष्ठाओं का विशेष महत्व है।

एक एक कर इन पंच निष्ठाओं पर हम ध्यान दें तो पाएंगे कि वर्तमान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में राष्ट्र की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है और मेरे भारत के लिए आज हर जिम्मेदार नागरिक के मन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की समर्पित संकल्पना और कटिबद्दता सही मायने में लोकतांत्रिक भारत के सर्व स्पर्शी समावेश वाली संस्कृति को जीवंत रखने के लिए अति आवश्यक हो गई है।

दीनदयाल उपाध्याय जी का कहना था कि व्यक्ति की भांति एक राष्ट्र की भी आत्मा होती है, उस आत्मा के अस्तित्व के कारण ही सारा राष्ट्र एकात्म बनता है एकजुट होता है।

गहन विश्लेषण करें तो हम यही पाएंगे की भारतीय जनता पार्टी की पंच निष्ठाओं में शामिल राष्ट्रवाद की परिकल्पना ना कोरी राजनीतिक कल्पना है ना संवैधानिक कल्पना, ना भौगोलिक कल्पना है ,बल्कि यह एक सांस्कृतिक कल्पना है। इस कल्पना पर आधारित राष्ट्रवाद ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।

भारतीय जनता पार्टी के सभी क्रियाकलाप इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

हालांकि इसी भारतवर्ष में कुछ लोग बहुसंस्कृति के नाम पर बहुराष्ट्रवाद की बात करते हैं लेकिन वे यह भूल जाते हैं की द्विराष्ट्रवाद की संकल्पना ने ही मेरे भारतवर्ष का विभाजन किया था।

जिन्ना, मुस्लिम लीग और उनके अनुयाई यही मानते थे कि हिंदू और मुसलमान दो अलग सभ्यताऐ हैं इसलिए यह दो अलग राष्ट्र हैं, केवल एक भौगोलिक इकाई का हिस्सा होने मात्र से यह एक नहीं हो सकते और उसका परिणाम हुआ भारत माता का विभाजन।

जरा सोच कर देखिए क्या भारत माता के विभाजन के पश्चात हिंदू मुस्लिम समस्या का समाधान हुआ?

नहीं बल्कि यह द्विराष्ट्रवादी और बहुराष्ट्रवादी कथित सोच स्वतंत्रता के बाद भी आज तक विद्यमान है जो बार-बार मुस्लिम तुष्टिकरण अल्पसंख्यकवाद और वोट बैंक की राजनीति के रूप में परिलक्षित होती है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता की निष्ठा के साथ भारतीय जनता पार्टी हमेशा इस सोच का विरोध करती है, और अपनी इस वैचारिक सोच को आग्रह पूर्वक स्थापित करती है की भारत एक संस्कृति वाला एक राष्ट्र है जिसमें जाति धर्म और भाषा आदि बहु विधा विविधता दिखाई देती है।

कुछ लोग राष्ट्र और राज्य का पर्यायवाची रूप में प्रयोग करते हैं जो उचित नहीं है, राज्य एक राजनीतिक संकल्पना है और राष्ट्र एक सांस्कृतिक संकल्पना है।
यानी यदि राज मतलब सत्ता नहीं है तो भी राष्ट्र हो सकता है यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।

अर्थात राष्ट्र निर्माण के लिए आहुति देने वाले मातृभूमि के सेवक निजी हितार्थ सत्ता सुख भोगने को नहीं बल्कि जनसेवा को परम लक्ष्य मानते हैं।

एक समान राष्ट्रीयता का अभाव हमेशा विखंडन का कारण बनता है सोवियत रूस इसका उदाहरण है जिसमें अनेक राष्ट्रीयताऐं शामिल हुई थी किंतु एक समान राष्ट्रीयता की भावना के अभाव में सब कुछ समाप्त हो गया।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी पंच निष्ठाओं में स्थान देने वाली भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रहित को पार्टी हित से हमेशा ऊपर रखती है।

ऐसे तत्व और प्रवृतियां जो भारत राष्ट्र की एकता को चुनौती देती है, हमेशा भारतीय जनता पार्टी के आंदोलन के प्रमुख विषय रहे हैं।

बहु राष्ट्रवाद की सोच क्षेत्रवाद जातिवाद अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण माओवाद नक्सलवाद आदि समय-समय पर उभरने वाले विषयों पर राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सर्वोपरि मानने वाले भारतीय जनता पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं ने आंदोलन किया और राष्ट्रहित के लिए अपना सर्वस्व समर्पण दिया।

लिखने को तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन संक्षेप में यही कहूंगा की भारतीय जनता पार्टी एक जन एक देश और एक संस्कृति की अवधारणा में विश्वास रखने वाला अविचल संगठन है जो यह मानता है की मां भारती की हम सभी संतानों के सभी कार्यकलापों का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र का संरक्षण, कल्याण, और अभ्युदय होना चाहिये।

अब हम दूसरी निष्ठा यानी लोकतंत्र पर बात करें तो पाएंगे की हमारे भारतवर्ष में कतिपय निजी हितों को वरीयता देने के लिए लोकतंत्र में भी परिवारवाद को बढ़ाने का सिलसिला वर्षों तक चला और जब अब भारत की जागरूक जनता ने अंगड़ाई ली है तब जनता को बहकाने हेतु हरकतें पुनः शुरू हो गई।
लोकतांत्रिक सिद्धांतों को जानने वाले यह भी जानते हैं की गणराज्य लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक अभिन्न अंग होता है और इसका अर्थ है की शासन की कमान संभालने वाला गण हो यानी कि उस राष्ट्र के जनसाधारण का एक हिस्सा हो, ना कि किसी वंश या परिवार विशेष का सदस्य।

राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित निष्ठाओं के इस क्रम में समतामूलक समाज की स्थापना करने का उद्देश्य भी विशेष महत्व रखता है।
हमारी भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही सबके समग्र कल्याण की कामना करती आई है।

दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सामाजिक आर्थिक दर्शन से प्राप्त दृष्टिकोण के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक सत्ता के विकेंद्रीकरण में विश्वास रखती है।
भाजपा का विश्वास है कि संयम का आचरण कर हम विषमता और शोषण को समाज से मिटा सकते हैं।

दीनदयाल उपाध्याय का कहना था कि जब सभी धर्म एक परम सत्ता को स्वीकार करते हैं फिर मानव मानव में भेदभाव क्यों?

शोषण मुक्त और समता युक्त समाज की स्थापना मानव के समक्ष हमेशा एक चुनौती रही है।

मार्क्सवाद ने इसका समाधान सुझाते हुए राज्य को क्रूर और दमनकारी बना दिया था, जिसका परिणाम हुआ की यह व्यवस्था भी पूंजीवादी व्यवस्था के समान उत्पीड़नकारी सिद्ध हुई।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी मानव समाज में व्याप्त शोषण को मिटाकर समतामूलक समाज की स्थापना करने हेतु प्रयत्नशील रहे, उन्होंने व्यक्ति के स्वायत्त व्यक्तित्व को नहीं नकारा लेकिन व्यक्ति की चेतना के उन्नयन और समाजीकरण पर बल दिया।

यानि व्यक्ति को सामाजिक दायित्व का बोध करवाने पर विशेष बल दिया। एकात्म मानववाद व्यक्ति और समाज को एक दूसरे का पूरक मानता हैए अर्थात व्यक्ति और समष्टि एक ही चेतना से व्याप्त हैं।

एकात्म मानव दर्शन का मूल तत्व है समरसता जिसे भारतीय जनता पार्टी ने विभिन्न सामाजिक प्रश्नों के प्रति अपने दृष्टिकोण में अपनाया है।

यह दृष्टिकोण भारतीय जनता पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं को समाज के सभी वर्गों सभी जातियों सभी धर्मों और विशेष रूप से वंचित और दलित लोगों के प्रति आत्मीयता और अपनत्व का भाव रखने के साथ उनकी सेवा के माध्यम से अंतोदय के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है।

यह निष्ठा सामाजिक सौहार्द्र और सदभावना को प्रेरित करते हुए असमानता और शोषण को मिटाने पर बल देती है।

राष्ट्र के प्रति निष्ठाओं के इस क्रम में सकारात्मक पंथनिरपेक्षता का भी विशेष महत्व है।

हमारी भारतीय संस्कृति के धार्मिक उदारवाद का ही परिणाम है कि भारत एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र है।
लेकिन सेकुलरिज्म के नाम पर वोटों की घ्रणित राजनीति करने वाले कुछ लोगों ने इसके स्वरूप को विकृत करने का कई बार प्रयास किया है।

हमारे देश में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जिन्हें वंदे मातरम गाना या सरस्वती वंदना करना धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का उल्लंघन लगता है।

यह लोग सिर्फ सत्ता प्राप्ति के शॉर्टकट के लिए इस तरह की हरकतें करते हैं और समाज को बांटकर ही रखना चाहते हैं।

इनके बिल्कुल विपरीत भारतीय जनता पार्टी जिस सेकुलरिज्म में निष्ठा रखती है उसमें पंथीय राजतंत्र या थियोक्रेसी के लिए कोई स्थान नहीं है।

भारतीय समाज के प्राचीन चिंतन और परंपरा पर आधारित भारतीय जनता पार्टी की इस निष्ठा का अर्थ है सभी धर्मों का आदर, सभी को न्याय ,तुष्टीकरण किसी का नहीं ,यानी सर्व स्पर्शी समावेश।

वर्तमान वैश्विक और हमारे देश की परिस्थितियों में भी भारतीय जनता पार्टी की पांचवी निष्ठा मूल्य आधारित राजनीति का विशेष महत्व है।

एक बार पुनः कहूंगा की भारतीय जनता पार्टी केवल एक राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि यह सिद्धांतों विचारधाराओं और नीतिगत मान्यताओं पर आधारित वह संगठन है जिसका उद्देश्य है सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण।

दीनदयाल उपाध्याय जी का कहना था की राजनीति अन्ततः सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण के लिए ही होती है।
यदि राष्ट्र का विचार त्याग दिया अर्थात राष्ट्र की अस्मिता इतिहास संस्कृति एवं सभ्यता का विचार नहीं किया तो राजनीति किस काम की?

आज यदि हम आकलन करें तो पाएंगे कि अधिकांश राजनीतिक दलों के लिए राजनीति का उद्देश्य सत्ता की प्राप्ति और निजी हितों की पूर्ति करना ही रह गया है।
जबकि भारतीय जनता पार्टी विकृत राजनीतिक संस्कृति के स्थान पर वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति की स्थापना हेतु हमेशा प्रयत्नशील रहती है।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारतीय जनता पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण प्रदान करती है ताकि वे अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में शुचिता को सर्वोपरि रखें।

भारतीय जनता पार्टी एक अनुशासित कैडर वाली पार्टी कही जाती है और भाजपा का मानना है कि आज देश को मूल्य आधारित राजनीति की जरूरत है, ऐसे मूल्य जो समय के साथ नहीं बदलते हो।

आजकल स्वार्थी लोग और कुछ राजनीतिक दल समय के साथ अपने मूल्यों की परिभाषा बदलते रहते हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीति के मूल्य हैं सत्य अहिंसा ईमानदारी सेवा परस्पर प्रेम और आदर तथा राष्ट्र प्रेम और जरूरत के समय राष्ट्र के प्रति निस्वार्थ बलिदान।

भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि जब राजनीति के इन सही मूल्यों को वह समाज के अंतिम व्यक्ति के मन मस्तिष्क में हमेशा के लिए स्थापित कर पायेगी तभी भारत माता की अप्रतिम सेवा का उसका स्वप्न पूरा होगा, और अपने इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये वह संकल्पबद्द और समर्पित है।

भाजपा के स्थापना दिवस पर लिखने को बहुत कुछ है लेकिन यही कहकर अपनी लेखनी को विराम दूंगा की भाजपा की पंचनिष्ठा वर्तमान भारत के उत्थान और विकास हेतु विशेष महत्व रखती हैं।

लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है सब जानती है और शासक और सेवक का फर्क भी समझती है।
मेरा प्रबल विश्वास है कि भारतीय लोकतंत्र की शान विश्व में बरकरार रहेगी और शासकीय भावना से परे रह कर जनसेवा को वरीयता देने वाले मेरे भारत के प्रधान सेवक को आगामी लोकसभा चुनाव में राष्ट्रहित के लिए निष्पक्ष मतदान के माध्यम से एक बार पुनः जनता जनार्दन स्वीकार करेगी।

लेखक
डाक्टर आलोक भारद्वाज
राजनीतिक विश्लेषक