Jaipur

भारतीय जनता पार्टी के द्वारा 14 सितंबर, यानी शनिवार को राजस्थान भाजपा इकाई अध्यक्ष के तौर पर प्रदेश प्रवक्ता सतीश पूनिया की ताजपोशी कर दी गई है।

माना जा रहा है कि सतीश पूनिया के बीजेपी अध्यक्ष के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता रही वसुंधरा राजे के सियासी ताबूत में आखिरी कील अमित शाह द्वारा ठोक दी गई है।

इससे पहले दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनाव में बीजेपी की राजस्थान में हार के बाद जिस तरह से राज्य की 25 लोकसभा सीटों पर टिकटों का बंटवारा हुआ, उसमें भी कहीं न कहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नाकामी बनकर सामने आई।

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद तो जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने वसुंधरा राजे की राजनीति को खत्म करने की कसम खा ली।

उनके धुर विरोधी समझे जाने वाले जोधपुर से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। बीकानेर से सांसद अर्जुन राम मेघवाल को एक बार फिर से मंत्री बनाया गया।

दूसरी तरफ खुद की पार्टी खड़ी कर चुनाव लड़ने वाले हनुमान बेनीवाल के साथ केवल एक सीट पर गठबंधन करके वसुंधरा राजे को अमित शाह ने एक तरह से ठेंगा दिखा दिया।

अब आमेर से बीजेपी विधायक और संघ के मजबूत कार्यकर्ता सतीश पूनिया को बीजेपी की कमान सौंपने के बाद स्पष्ट हो गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को 2023 से पहले पहले राज्य की राजनीति से करीब-करीब निपटाने की योजना बना ली गई है।

इसी योजना के रूप में वसुंधरा के विरोधी खेमे से माने जाने वाले सतीश पूनिया को अध्यक्ष बनाया गया है। उनके सहयोग के रूप में कैबिनेट मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और दलित समाज से आने वाले अर्जुन राम मेघवाल को भी मजबूती प्रदान की गई है।

सतीश पूनिया को मजबूत करने का काम संगठन के द्वारा दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव से शुरू कर दिया गया था, जब उनको चुनाव प्रचार समिति का गजेंद्र सिंह शेखावत के साथ सह संयोजक बनाया गया था।

इसके बाद बीते दिनों सदस्यता अभियान के दौरान उनके हाथ और मजबूत किए गए, जब उन्हें राजस्थान इकाई की सदस्यता अभियान का संयोजक बनाकर प्रमोट किया गया।

सदस्यता अभियान जबरदस्त सफल होने के बाद माना जा रहा था कि सतीश पूनिया का बीजेपी अध्यक्ष बनना लगभग तय है।

‘नेशनल दुनिया’ ने 25 जून 2019 को इस बात के साफ संकेत दिए थे, कि सतीश पूनिया का नाम संघ की तरफ से फाइनल हो चुका है और बीजेपी को इसके ऊपर फैसला लेना है।

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के द्वारा धारा 370 हटाने और कश्मीर की समस्या और समाधान करने की प्रक्रिया के चलते उनके नाम का ऐलान नहीं हो सका।

अब जिस तरह से सतीश पुनिया को अध्यक्ष बनाया गया है और वसुंधरा के धुर विरोधी माने जाने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत राज्य के सबसे मजबूत राजपूत नेता के रूप में सामने आए हैं।

उसी तरह से वसुंधरा के विरोधी माने जाने वाले किरोड़ी लाल मीणा राज्यसभा सांसद हैं, तो तीसरी तरफ दलित नेता अर्जुन राम मेघवाल भी मोदी के करीबी लोगों में से एक हैं।

ऐसे में 2023 से पहले राजस्थान में वसुंधरा राजे अलग-थलग पड़ती हुई दिखाई दे रही हैं, हालांकि उनके पुराने सहयोगी रहे कुछ नेता उनके साथ खड़े दिखाई देते हैं, किंतु संगठन के तौर पर लिए जाने वाले फैसलों में उनमें से कोई भी विरोध करने की हिमाकत नहीं कर सकता।

स्पष्ट है कि विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह राजस्थान भर में नारेबाजी हुई, उससे साफ है कि लोग राजस्थान में वसुंधरा राजे को पसंद नहीं करते हैं, जिसका विधानसभा चुनाव का परिणाम और लोकसभा चुनाव का परिणाम बड़ा सबूत है।

बहरहाल भारतीय जनता पार्टी के तमाम छोटे-बड़े कार्यकर्ता सतीश पूनिया के साथ खड़े हुए नजर आ रहे हैं। आरएसएस के पुराने कार्यकर्ता और संगठन के बेहद कर्मठ कार्यकर्ता सतीश पूनिया का राजस्थान में बीजेपी में चंहुओर स्वागत हो रहा है।

दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे फिर से सक्रिय होने का प्रयास कर रही है। देखने वाली बात यह होगी कि केंद्रीय आलाकमान और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच चल रहे इस राजनीति की युद्ध में जीत किसकी होती है।

फिलहाल सतीश पूनिया को कमान सौंपी जाने के बाद वह पूरी तरह से मुस्तैद दिखाई दे रहे हैं। बीते 20 घन्टे के दौरान उन्होंने अपनी सक्रियता दोगुनी कर दी है, जो उनके उत्साह को दर्शाती है।