-आयुर्वेद व आधुनिक शोध के अनुसार आहार काल व उपवास

आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार भोजन में पोषक तत्वों के विविध प्रकार और मात्रा तथा कैलोरी की मात्रा को जीवन के विभिन्न चरणों में समुचित आहार सुनिश्चित करने के लिये मानकों के रूप में उपयोग किया जाता है।

वस्तुतः भोजन की मात्रा और आवृत्ति का संयोजन बुढ़ापे की ओर बढ़ने और बुढ़ापा-जन्य बीमारियों की शुरुआत को प्रबंधित करने हेतु एक शक्तिशाली उपाय के रूप में उभरा है|

कितना और कब खाने का विषय तो महत्वपूर्ण है ही, इसके साथ ही उपवास की अवधि व आवृत्ति, और उपवास के दौरान लिये जाने वाले भोजन में कैलोरी में कमी भी स्वास्थ्य-लाभ की उत्तम रणनीति हो सकती है|

इन लाभों को प्रदान करने वाली अंतर्निहित शारीरिक प्रक्रियाओं में मुख्यतया चयापचय हेतु ईंधन स्रोतों अर्थात भोजन में बदलाव, शरीर के टूट-फूट मरम्मत तंत्र की

सार-संभाल और उन्नयन, तथा कोशिकीय और शारीरिक स्वास्थ्य के लिये ऊर्जा-उपयोग का समुचित संयोजन हैं। आयुर्वेद की दृष्टि में युक्तिपूर्वक उपवास स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और बीमार व्यक्ति के विकारों का प्रशमन, दोनों में ही लाभकारी है|

आयुर्वेद के दृष्टिकोण और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण में समानता होते हुये एक मूल अंतर यह है आयुर्वेद में भोजन निर्धारण के कारक अधिक विस्तृत, बहुकोणीय और व्यापक हैं|

इस पर अनेक खण्डों में लम्बी चर्चा होगी| आज का विश्लेषण मूलतः इन प्रश्नों पर केन्द्रित है कि 24 घंटों में भोजन कितनी बार लिया जाये और अच्छे स्वास्थ्य के लिये उपवास का महत्त्व क्या है?

इन प्रश्नों का उत्तर आयुर्वेद, आधुनिक वैज्ञानिक शोध और अनुभव के आधार पर एकीकृत दृष्टिकोण से दिया जायेगा|

समकालीन वैज्ञानिक शोध वस्तुतः भोजन की मात्रा (ऊर्जा या कैलोरी के सेवन के नियंत्रण द्वारा) और भोजन की आवृत्ति (भोजन और उपवास के समय के नियंत्रण द्वारा) में बदलाव के माध्यम से कार्डियोवैस्कुलर बीमारी, मधुमेह, कैंसर, और डिमेंशिया सहित उम्र-आधारित रोगजनन को रोकने या विलम्ब करने पर केन्द्रित है|

इन अध्ययनों से ज्ञात होता है कि हेल्थ-स्पान या रोग-रहित जीवन काल और जीवन-काल में विस्तार उन उपायों से प्राप्त किया जा सकता है जिनमें कुल कैलोरी सेवन में कमी की आवश्यकता हो भी सकती है और नहीं भी।

किन्तु आयुर्वेद की दृष्टि में देखें तो केवल दीर्घायु नहीं बल्कि हितायु और सुखायु सम्हालना आवश्यक है|

यही कारण है कि आयुर्वेद की दृष्टि में केवल ऊर्जा या कैलोरी के सेवन पर नियंत्रण और भोजन व उपवास के समय के नियंत्रण के भरोसे दीर्घायु, हितायु और सुखायु नहीं प्राप्त हो सकते| भोजन में केवल कैलोरी गिनने की सनक आयुर्वेद का विषय नहीं है|

आइये, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपवास पर विचार करते हैं (देखें, साइंस, 2018, 362:770-775)|

पहले हम कैलोरी-रेस्ट्रिक्शन से प्राप्त मॉलिक्यूलर और चयापचय परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिसमें कैलोरी की मात्रा और उपवास अवधि भी शामिल है।

कैलोरी-रेस्ट्रिक्शन अध्ययनों के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि कैलोरी सेवन में कमी मनुष्यों में वृद्धावस्था के दौरान स्वास्थ्य में सुधार और बीमारी को रोकने के लिए एक प्रभावी हस्तक्षेप हो सकती है|

लेकिन दुनिया के सर्वोत्कृष्ट जर्नल में प्रकाशित शोध-विश्लेषण अभी भी इस विषय में एक मत नहीं है|

दूसरा, जहाँ तक टाइम-रेस्ट्रिक्टेड फीडिंग (कुल कैलोरी सेवन में कमी लाये बिना, भोजन-सेवन के समय को 4 से 12 घंटों तक की दैनिक सीमाओं में बांधना) का प्रश्न है, अभी भी शोध निष्कर्ष अंतिम पड़ाव पर नहीं पहुंचे हैं|

फिर भी टाइम-रेस्ट्रिक्टेड फीडिंग शरीर के वजन में कमी, ऊर्जा व्यय में वृद्धि, बेहतर ग्लाइसेमिक नियंत्रण और कम इंसुलिन के स्तर, हेपेटिक वसा में कमी, हाइपरलिपिडेमिया में कमी और इन्फ्लेमेशन में कमी आदि का लाभ देकर बिगड़े हुये समकालीन पाश्चात्य आहार (खूब वसा और खूब कार्बोहाइड्रेट, और परिष्कृत शर्करा) के कई हानिकारक चयापचय परिणामों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

चयापचयी-स्वास्थ्य पर परिवर्तित भोजन-काल के प्रभाव की मॉलिक्यूलर मैकेनिज्म क्या हो सकती है? दरअसल यह लाभ, 24 घंटे के दौरान उपवास और भोजन के समय और सर्केडियन रिदम के बीच सिंक्रनाइज़ेशन, तालमेल या लयबद्धता के कारण से होना माना जाता है।

तीसरा, जहाँ तक आवृत्तिक या बीच बीच में उपवास या इंटरमिटेंट-फास्टिंग का प्रश्न है कई अल्पावधि क्लिनिकल ट्रायल्स से ज्ञात होता है कि बीच-बीच के दिनों में उपवास वजन घटाने और कार्डियोमेटाबोलिक स्वास्थ्य के मामले में कैलोरी-रेस्ट्रिक्शन के समान ही लाभ प्रदान कर सकता है|

इनमें शरीर के वजन में कमी और बेहतर लिपिड प्रोफाइल, कम रक्तचाप, और इंसुलिन संवेदनशीलता में वृद्धि शामिल हैं|

और अंत में चौथा, फास्टिंग-मिमिकिंग डाइट या उपवास की तरह लगने वाले भोजन का प्रश्न है, यह उपवास के दौरान भोजन से पूर्ण वंचित होने की बजाय कम कार्बोहाइड्रेट और उच्च वसा वाले आहार की रणनीति है|

पांच दिन तक उपवास-जैसा-भोजन कैंसर, डायबिटीज, कार्डियोवैस्कुलर डिजीज जैसे अनेक पचड़ों के संकेतकों को सामान्य करता है| साथ ही इसका एंटी-एजिंग प्रभाव भी देखा गया है|

इस प्रकार का उपवास प्रोटीन काइनेज ए और एमटीओआर मार्गों के रेगुलेशन के माध्यम से चूहों में इंसुलिन स्राव और ग्लूकोज होमियोस्टेसिस को बहाल करके अग्नाशयी बीटा कोशिकाओं के पुनर्जनन को बढ़ावा देने, इंसुलिन स्राव और ग्लूकोज होमियोस्टेसिस को बहाल करके एंटीडाइबेटिक प्रभाव डालता है।

इसके साथ ही यह प्रतिरक्षा प्रणाली के रेगुलेशन के माध्यम से ऑटोम्यून्यून बीमारियों के नियंत्रण में मदद करता है। हालांकि इसकी मदद से आयु में वृद्धि के प्रमाण नहीं मिले और जब बहुत बूढ़े चूहों को इस प्रकार की खुराक दी गयी तो उनमें यह हानिकारक पाया गया।

आयुर्वेद की दृष्टि से लंघन, उपवास, अपतर्पण आदि पर बहुत विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध है, जिनकी व्याख्या एक आलेख में तो क्या एक पुस्तक में समेटना मुश्किल है|

तथापि, भोजन करने के समय और आवृत्ति को लेकर कुछ निष्कर्ष सूत्र दिये जाना आवश्यक है| पुनर्वसु आत्रेय अपने शिष्य अग्निवेश को सर्वश्रेष्ठ द्रव्यों, भावों और क्रियाओं को समझाते हुये भोजन के सन्दर्भ में कुछ रोचक सूत्र बताते हैं (च.सू.25.40): एकाशनभोजनं सुखपरिणामकराणां श्रेष्ठम्|

तात्पर्य यह है कि 24 घंटे में केवल एक बार भोजन तत्समय में सुख देने में श्रेष्ठ है क्योंकि यह सुखपूर्वक पच जाता है| कालभोजनमारोग्यकराणां श्रेष्ठम्|

तात्पर्य यह है कि नियत समय पर भोजन आरोग्य देने वालों में श्रेष्ठ है| ध्यान दीजिये आयुर्वेद में भोजन के दो काल बताये गये हैं, न कि दिन भर कुछ न कुछ खाते रहना|

पुनर्वसु आत्रेय ने एक अन्य संदर्भ में निर्दिष्ट किया है कि विषम भोजन से उत्पन्न तमाम अति-कष्टकारी रोगों को देखते हुये बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों पर काबू पाकर हिताशी, मिताशी और कालभोजी होना चाहिये (च.नि.6.11): हिताशीस्यान्मिताशीस्यात्कालभोजीजितेन्द्रियः|

पश्यन्रोगान्बहून्कष्टान्बुद्धिमान्विषमाशनात्| तात्पर्य यह है कि हितकर द्रव्यों का आहार करने वाला, अपनी पाचन-शक्ति को देखते हुये मिताहार या नपा-तुला भोजन करने वाला और समय पर भोजन करने वाला होना चाहिये|

लेकिन उपवास के सन्दर्भ में इस बात पर भी ध्यान देना आवश्यक है कि अति उपवास दुर्बल करता है (च.सू.21.10-11): सेवा रूक्षान्नपानानां लङ्घनं प्रमिताशनम्|

क्रियातियोगः शोकश्च वेगनिद्राविनिग्रहः|| रूक्षस्योद्वर्तनं स्नानस्याभ्यासः प्रकृतिर्जरा| विकारानुशयः क्रोधः कुर्वन्त्यतिकृशं नरम्||

तात्पर्य यह है कि रूखा-सूखा व मात्रा से कम खाना और अति उपवास करना, शोधन क्रियाओं की अति (पंचकर्म आदि), शोक, वेगों व नींद को रोकना, शरीर के रुक्ष रहने पर रुक्ष उबटन व नित्य रुक्ष स्नान, स्वाभाविक कमजोर गुणसूत्र, वृद्धावस्था, रोगों का लग जाना, और गुस्सा इंसान को बहुत कमजोर (कृश) कर देते हैं| बहुत अधिक उपवास वात को प्रकुपित कर वात व्याधियों को जन्म देता है|

इस सब चर्चा का निष्कर्ष यह है कि एक स्वस्थ व्यक्ति के लिये दिन में केवल दो बार किन्तु प्रतिदिन नियत समय पर भोजन करना ही सर्वोत्तम है| पूर्वान्ह में नाश्ते को भोजन की तरह लें और फिर कार्यालय या काम से लौटते ही लगी भूख में दूसरा भोजन लें|

भोजन के बाद कुछ अनुपान ले सकते हैं, परन्तु दिन भर कुछ न कुछ खाते रहना या चाय पीते रहना अग्नि, स्वास्थ्य, और आरोग्य का सत्यानाश कर देता है| यदि आप उपवास रखना चाहते हैं तो अति न करें|

अच्छा होगा कि सप्ताह या 15 दिन में कोई एक दिन तय करके पूरी तरह उपवास रखें| उपवास टूटते ही भोजन पर न टूट पड़ें| उपवास और उसके बाद वाले दिन को संसर्जन क्रम में बाँटते हुये लघु पेय से प्रारंभ कर गुरु पेय और खाद्य पदार्थ देते हुये एक समयावधि में अग्नि सम करना और नियमित भोजन तक आयें|

यह युक्ति संसर्जन का छोटा रूप है| मूल तर्क यह है कि पूरे दिन का सही सही उपवास करने से मंद जठराग्नि को क्रमशः समत्व तक लाना आवश्यक है| सीधा नियमित तरमाल खा लेने से मन्दाग्नि और आमाशय-क्षोभ के कारण ऐसा आहार पच नहीं पायेगा|

इससे अजीर्ण होते ही आम बनना प्रारंभ हो जायेगा| आम बनाते ही सारे किये-धरे पर पानी फिर जाता है|

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं)

सन्दर्भ—
Burke, L.M., Hawley, J.A., 2018. Swifter, higher, stronger: What’s on the menu? Science 362, 781-787.

Di Francesco, A., Di Germanio, C., Bernier, M., de Cabo, R., 2018. A time to fast. Science 362, 770-775.

Gentile, C.L., Weir, T.L., 2018. The gut microbiota at the intersection of diet and human health. Science 362, 776-780.

Ludwig, D.S., Willett, W.C., Volek, J.S., Neuhouser, M.L., 2018. Dietary fat: From foe to friend? Science 362, 764-770.

Ray, L.B., 2018. Optimizing the diet. Science 362, 762-763.

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