hanuman beniwal diya kumari rajyavardhan gajendra singh shekhawat
hanuman beniwal diya kumari rajyavardhan gajendra singh shekhawat

जयपुर।
राजनीति करने वालों द्वारा राजस्थान की राजनीति में कोई 5 दशक पहले जाट—राजपूत जातियों को सियासी तौर पर प्रतिद्वंदी बनाया गया था। तब से लेकर अब तक इन दोनों मार्शल कौम के कई छोटे—बड़े नेताओं ने अपने सियासी फायदे के लिए एक—दूसरे को गालियां निकालकर जातियों को अपमानित करने का काम किया है।

इन पांच दशकों में संभवत: यह पहला अवसर है, जब राज्य की राजनीति में जाट और राजपूत एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं। हालांकि, इस द​रमियान भी कुछ छुटभैये नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं।

इस बार जहां जोधपुर में राजपूत समाज से आने वाले भाजपा के प्रत्याशी गजेंद्र सिंह शेखावत के लिए जाट समाज के हनुमान बेनीवाल प्रचार करने गए, वहीं जयपुर के पूर्व राजघराने की दीया कुमार के लिए राजसमंद भी गए।

इसी तरह से हनुमान बेनीवाल जयपुर ग्रामीण में कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के लिए वोट मांगने जयपुर ग्रामीण में रैलियां कर रहे थे, वहीं गजेंद्र सिंह शेखावत नागौर में हनुमान बेनीवाल के लिए राजपूत समाज की मीटिंग कर वोट मांग रहे थे।

दीया कुमारी भी जहां नागौर में शनिवार शाम को चुनाव प्रचार को शोर थमने के कुछ समय पहले तक सभाएं कर बेनीवाल के लिए मतदान करने की अपील कर रही थीं, वहीं जयपुर ग्रामीण में सनी देओल रोड शो कर रहे थे।

इसी तरह से गजेंद्र सिंह शेखातव ने बाड़मेर—जैसलमेर में कैलाश चौधरी के लिए वोट मांगे, वहीं उनके सामने चुनाव लड़ रहे राजपूत समाज के मानवेंद्र सिंह को हराने की अपील भी की। बेनीवाल ने नागौर में तीन दिन तक ड़ेरा ड़ाले रखा। इसी तरह से राजेंद्र राठौड़ ने नागौर में बेनीवाल के लिए वोट मांगे, वहीं चूरू में राहुल कस्वां के लिए वोट देने की अपील की।

कुल मिलाकर देखा जाए तो जाट और राजपूत समाज से आने वाले नेताओं ने एक दूसरे के लिए वोट मांगने के लिए जान की बाजी लगा दी है। इस दौरान जाति के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों को इन नेताओं ने नकारा और समाजों को तोड़ने वाला कहकर एक नई इबारत लिखी, तो जाट—राजपूतों को भाइचारे की शपथ भी दिलवाई।

लंबे समय तक एक दूसरे की प्रतिद्वंदी बनाकर लड़ाने वाले समाज के ठेकेदारों को इन आधा दर्जन बड़े नेताओं ने धत्ता बताया, तो साथ ही यह भी कहा कि हमारा भाईचारा बिगाड़ने का प्रयास करने वालों की दुकानें अब बंद हो चुकी हैं।

कहने में भले ही यह बातें अच्छी लगे,लेकिन क्या यह सारा माजरा चुनावों तक ही सीमित रहने वाला है। क्या इन जातियों में रहकर जाति के नाम पर जिंदगी चलाने वालों के जहरीले बोल बंद हो जाएंगे? क्या यह लोग भविष्य में सामाजिक सौहार्द को नहीं बिगाड़ेंगे?

अगर यह सब नहीं होगा तो ही सही मायने में इस बात को चुनाव के साथ जोड़कर कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। किंत यदि ऐसा हुआ तो समझ लेना चाहिए कि राजनीति कुछ भी करवा सकती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन समाज के ही कुछ नेताओं द्वारा जो जहर घोला गया, वह भूलना मुश्किल है।

वैसे यह बात केवल चुनाव तक ही सीमित रहती है। क्योंकि गांव—कस्बों में जहां पर जाट और राजपूत साथ साथ रहते हैं, वहीं एक दूसरे के सुख दुख में भी हमेशा साथ खड़े नजर आते हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि जाट—राजपूतों का यह कॉम्बिनेशन क्या गुल खिलाएगा?