hanuman beniwal kirodilal meena ghanshyam tiwari
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जयपुर।
हनुमान बेनीवाल खींवसर से दूसरी बार जीतकर आए थे। किरोड़ीलाल मीणा राजपा के जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसी तरह से भाजपा के टिकट पर घनश्याम तिवाड़ी भी तीसरी बार सांगानेर से रिकॉर्ड 65 हजार से ज्यादा वोटों से जीते।

यह जीत थी साल 2013 के विधानसभा चुनाव की, प्रदेश में भाजपा ने 163 सीटों पर जीत हासिल कर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नेतृत्व में सशक्त सरकार बनाई थी।

सरकार बनने के साथ ही वसुंधरा राजे की तानाशाही, राजशाही और मनमर्जी सामने आने लगी। प्रचंड़ जीत पर सवार वसुंधरा राजे ने घनश्याम तिवाड़ी जैसे दिग्गज को मंत्री नहीं बनाया और हाशिए पर जाने को मजबूर कर दिया।

हालांकि, तिवाड़ी ने खुद ही 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले कह दिया था कि वर्तमान नेतृत्व में वह मंत्री नहीं बनेंगे, मतलब साफ था कि वसुंधरा राजे उनको मुख्यमंत्री के तौर स्वीकार नहीं थीं।

खैर! तेज घोड़ों पर सवार वसुंधरा राजे ने भी तिवाड़ी को लेकर ज्यादा मान मनोव्वल नहीं की। हालांकि, एक दो बार दोनों के बीच बातचीत हुई, किंतु वह मात्र औपचारिकता ही साबित हुई, कोई परिणाम सामने नहीं आया।

इसके बाद शुरू हुआ घनश्याम तिवाड़ी का बागी सफर। जिसमें सारथी बने किरोड़ीलाल मीणा और साथ रहे फायर ब्रांड नेता हनुमान बेनीवाल। खास बात यह रही है कि इनमें सबसे ज्यादा जनता से जुड़ने वाले नेता के तौर पर बेनीवाल ने अपनी पहचान बनाई। राजस्थान में 2014 से 2018 के बीच पांच बड़ी रैलियां कर केंद्र को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

इस दौरान कई मौकों पर तीनों नेता एक जाजम पर आए भी और रणनीतियां भी बनीं, लेकिन अंतत: तिवाड़ी ने 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले तकरीबन अपने हथियार ही डाल दिए। जब टिकट बंटवारे की बारी आई तो उन्होंने रालोपा के संयोजक हनुमान बेनीवाल को रेस्पोंस करना ही बंद कर दिया।

जो नेता कभी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से 2 हजार करोड़ का सरकारी आवास खाली करने का आंदोलन करता था, वह आज हजारों करोड़ के दो—दो सरकारी बंगलों में रह रहे अशोक गहलोत की गोद में बैठा है।

अब हनुमान बेनीवाल लोकसभा सांसद हैं, किरोड़ीलाल मीणा राज्यसभा सांसद हैं, लेकिन घनश्याम तिवाड़ी सांगानेर से भारत वाहिनी के टिकट पर बुरी तरह से हारकर घर बैठ गए हैं। बेनीवाल मोदी सरकार में मत्री बनने की तरफ बढ़ रहे हैं, तो किरोड़ी भी अपना वजूद बचाकर इज्जत बसर कर रहे हैं।

एक समय तीनों एक मंच पर आए थे। उनमें घनश्याम तिवाड़ी ही ऐसे नेता हैं जो आज सियासी तौर पर गुरबत की जिंदगी जी रहे हैं। भाजपा से पहले भारत वाहिनी बनाई, चुनाव लड़े, हारे और लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में चले गए।

भाजपा के दिग्गज थे, लेकिन ऐसा लगता है कि गलत निर्णय करते हुए करीब एक साल से भी कम समय में तीन पार्टियां बदलने वाले तिवाड़ी ने अपनी 45 साल के राजनीतिक तपस्या को मिट्टी में मिला दिया।

हनुमान बेनीवाल और किरोड़ीलाल मीणा ने समय को समझा और उसी के अनुरुप निर्णय लिए। आज दोनों अच्छी स्थिति में हैं। बल्कि हनुमान बेनीवाल अपने चरम की तरफ बढ़ रहे हैं। हो सकता है 2023 के विधानसभा चुनाव में उनका बड़ा रोल सामने आए।