dravyavati river jaipur
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रामगोपाल जाट
राजस्थान में जनता सरकार हर पांच साल में बदल देती है। यह संवैधानिक बाधाएं नहीं हों, तो संभवत: 10 महीनें में ही लोग सरकार को बदल दें। इसके कारण भी साफ हैं। किसी भी राजनैतिक दल को मत बड़ी उम्मीद और आशा के साथ दिया जाता है, किंतु जब दल सत्ता प्राप्त करते ही अपने किये वादों से मुकरने लगे तो जनता का मन बदलते देर नहीं लगती।

यही कारण है कि 163 सीटों के साथ प्रचंड़ बहुमत से जिस वसुंधरा राजे सरकार को चुना गया था, उसको महज 9 माह के भीतर ही जनता ने 3 में से दो सीटों पर हार का स्वाद चखा दिया था। इसके बाद केवल धौलपुर की उपचुनाव सीट जीतने के अलावा मांडलगढ़ और अजमेर, अलवर की लोकसभा सीट पर भी वसुंधरा राजे की अगुवाई वाली भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था।

भले ही वर्तमान सरकार के साथ इतनी दुर्गति अभी तक नहीं हुई हो, किंतु जनता में जो क्रोध घर कर रहा है, वह गुब्बार बनकर 2023 में किसी भयावह रुप में सामने आ सकता है। सत्ता पर काबिज होने के बाद सत्ताशीनों को कम दिखाई देता है। जो हमेशा जनता के बीच रहते हैं और एक आवाज पर सड़क पर आ जाते हैं, वही लोग सत्ता प्राप्त करते ही जनता के लिये अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। द्वार पर बंदूकधारी द्वारपाल बिठा देते हैं।

हाल ही में हुये 49 जगह के निकाय चुनाव को लेकर जहां कांग्रेस अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं भाजपा इसको कांग्रेस की जीत नहीं मान रही है। काफी हद तक यह दिखता भी है कि जो कांग्रेस अपने काम का दम दिखा रही है, उसको 49 में से केवल 26 पर जीत क्यों किजी? यह तो आधी संख्या ही है। कांग्रेस की जीत नहीं बताने वाली भाजपा को क्यों केवल 6 सीट मिली, यह सोच का विषय है। क्या कारण रहा है कि निर्दलीय उम्मीदवार 17 सीटों पर जीत गये?

तमाम सवाल है, जिनका उत्तर ईमानदारी से न भाजपा देना चाहती है और न ही कांग्रेस? जनता ने जिस भी आधार पर वोट दिया है, वह अलग विषय है, किंतु यह बात तो तय है कि बहुमत न कांग्रेस को दिया है और न ही भाजपा को! अगर दिया होता तो 26 और 6 का यह आंकड़ा 40 से उपर होता।

पांच साल के लिये लोकतांत्रिक तरीके से राज करने का जनता लाइसेंस देती है, किंतु सत्ताशीन इस पांच साल को ही जीवन मान लेते हैं। जब सीट खिसकती है तो फिर जनता की याद आती हैं कई बार विशेषज्ञ यह जता चुके हैं कि यदि कोई जीता हुआ प्रतिनिधि पांच साल में ईमानदारी से पांच बार भी अपनी जनता के बीच चला जाये, भले काम नहीं करे, तो भी अगली जीत पक्की हो जाती है, लेकिन ऐसा अभी भारत के इतिहास में हुआ नहीं है, अगर कहीं हुआ है तो ऐसे उम्मीदवार को हराने वाला कोई हुआ नहीं है।

संविधान विशेषज्ञों की मानें तो भारत का लोकतंत्र अभी अपरिपक्व है, और अमेरिका का लोकतंत्र काफी परिपक्व हो चुका है। किंतु समाजशात्रियों के अनुसार भारत की सभ्यता और संस्कृति विश्व में सबसे बड़ी और पुरानी है। तो इसका यह मतलब हुआ कि लोकतांत्रिम मूल्यों में भारत की सभ्यता समाहित नहीं हो रही है। या कह सकते हैं कि भारत में लोकतंत्र के लिये अधिक जगह नहीं है, अथवा य कथित आधुनिक लोकतंत्र भारत को नियंत्रित नहीं कर सकता है?

काफी आगे जाने के बजाये हम बात करते हैं राजस्थान की बीते एक दशक से अधिक समय के दौरान बनी बड़ी योजनाओं और उनके हश्र पर। यहां पर दो मुख्यमंत्रियों ने 21 साल शासन किया है। अशोक गहलोत तीसरी बार सीएम बनें हैं और वसुंधरा राजे दो बार सीएम रह चुकी हैं।

इस दौरान दोनों की कैमिस्ट्री तो सर्वविदत है, किंतु दलगत राजनीति में उलझे दोनों नेता एक दूसरे की योजनाओं को सत्ता प्राप्त करते ही पानी पिला उदेते हैं। रिफायनरी को वसुंधरा राजे ने जमींदोज किया तो अब रिंग रोड और द्रव्यवती नदी सौंदर्यकरण को अशोक गहलोत दफना चुके हैं।

रिफायनरी का कभी सोनिया गांधी पत्थर रखती हैं तो कभी नरेंद्र मोदी कार्य शुभारम्भ करते हैं। दोनों के दलों की राज्य सरकारों ने अपने अपने ढंग से रिफायनरी को परिभाषित किया है। अब भी रिफायनरी राजस्थान को कम, गुजरात को ज्यादा फायदा करती हुई नजर आ रही है। जबकि पत्थर रखने वाले अशोक गहलोत की ही राज्य में सरकार है।

हजारों करोड़ की रिफायनरी विवाद का कारण बनकर रह गई है। जापान जैसे देश में यह होती तो अब तक पूरा पेट्रो पदार्थ निकाल चुकी होता, यहां पर प्रोपर ढंग से शुरू ही नहीं हुई है। रिंग रोड बीते 10 वर्ष से रिंग में फंसी हुई है। जनता का 3 हजार करोड़ रुपया एक बरसात में ही बह गया है।

द्रव्यवती नदी, जो कभी 1676 करोड़ की लागत से 47 किलोमीटर तैयार होनी थी, वह नदी पूरा खर्च होने के बाद केवल 16 किलोमीटर ही सौंदर्य हो पाई है। नदी के लिये अब बजट बढ़ाकर 3 हजार करोड़ कर दिया गया है, लेकिन काम बंद कर दिया गया है। सुंदर बनने का सपना देख रही जनता अब मच्छरों के हवाले है।

ये तीन योजनाएं तो बानगी है, असल तो प्रदेश में कई योजनाएं हैं, जो कभी नींव रखी जाती है, तो कभी उसकी नींव उखाड़ी जाती है, कभी उस योजना को गलत बताया जाता है, तो कभी उसको समूल समाप्त कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में लाखों करोड़ रुपये पानी में समा जाते हैं, किंतु परिणाम ढाक के तीन पात होता है।