आयुर्वेदाचार्य प्रोफेसर डॉ. सत्येंद्र नारायण ओझा को वर्ष 2018 का यजुर्विद आयुर्वेद अवार्ड

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dr. rajvendra chaudhary jaipur-hospital

जयपुर।

प्रसन्नता की बात है कि आयुर्वेदाचार्य प्रोफेसर डॉ. सत्येंद्र नारायण ओझा को वर्ष 2018 के प्रतिष्ठित यजुर्विद आयुर्वेद अवार्ड से सम्मानित किये जाने का निर्णय लिया गया है|

वे वर्तमान में माननीय अन्नासाहेब डांगे आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज, आष्टा, सांगली,महाराष्ट्र के निदेशक हैं। डॉ. ओझा ने राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर से कायचिकित्सा में एम.डी. और पीएचडी किया है।

डॉ. सत्येन्द्र नारायण ओझा को इस पुरस्कार से सम्मानित किये जाने के बहुत स्पष्ट कारण हैं। संहिताओं, शोध और अनुभव की त्रिवेणी के संगम में उपजा ज्ञान ही समकालीन आयुर्वेद को वैश्विक परिदृश्य में दृढ़तापूर्वक सुस्थापित करने में सक्षम है।

प्रोफेसर ओझा के मन में आयुर्वेद की संहिताओं के प्रति अगाध सम्मान और श्रद्धा है, लेकिन उन्हें अपनी इस श्रद्धा को आधुनिक वैज्ञानिक शोध और स्वयं के अनुभवजन्य ज्ञान के प्रकाश में जांचने-परखने से कोई परहेज नहीं है।

यही कारण है कि उनकी चिकित्सा ज्ञान की त्रिवेणी से उपजे ऐसे प्रमाण पर आधारित होती है जिसमें त्रुटियों की कोई गुंजाइश शेष नहीं रहती।

डॉ. ओझा ने पिछले 29 वर्षों में आयुर्वेद चिकित्सा के द्वारा लाखों लोगों को उन औषधियों से रोगमुक्त किया है जो सर्वसुलभ हैं और जिनका मूल्य गरीबों की पहुंच में है। समकालीन विश्व को ऐसे ही आयुर्वेदाचार्यों की आवश्यकता है।

आयुर्वेद आज ऐसे मोड़ पर है जहाँ विश्व भर में बॉयो-मेडिकल पद्धतियों द्वारा संचारी व गैर-संचारी रोगों को रोक पाने में निरंतर और व्यापक असफलता के कारण वैश्विक समाज को एक बार पुनः आयुर्वेद की ओर गंभीरतापूर्वक देखने का अवसर प्राप्त हुआ है।

दरअसल, आधुनिक चिकित्सा पद्धति की इस असफलता ने आयुर्वेद को दुनिया भर में पुनर्प्रतिष्ठापन का एक विशेष अवसर दिया है| स्वाभाविक है कि इन परिस्थितियों में डॉ.सत्येन्द्र नारायण ओझा जैसे आयुर्वेदाचार्यों का भारी योगदान हो सकता है।

दुनिया की प्रत्येक विधा की भाँति आयुर्वेद में भी देश, काल और वातावरण में हुये परिवर्तनों के अनुरूप निरंतर वैज्ञानिक शोध के द्वारा नवीन ज्ञान के उत्पादन और उपयोग की आवश्यकता है।

वैज्ञानिक ज्ञान की व्यापकता को तिलाञ्जलि देकर आयुर्वेद का विकास संभव नहीं है। वस्तुतः व्यापक वैज्ञानिक प्रमाणों की उपेक्षा किसी विषय को कालांतर में अप्रासंगिक बना सकती है।

अग्निवेश तंत्र के बाद भी कई ग्रन्थ लिखे जाने का यथार्थ आयुर्वेद की गत्यात्मकता और नवाचार की सार्थकता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। आयुर्वेद में यदि नवाचार सर्वोपरि न होता तो महर्षि-वैज्ञानिक अग्निवेश का आप्तोप्देश अंतिम होता और उसके बाद किसी आचार्य ने कलम उठाने की हिम्मत न की होती।

समय के साथ विकसित अत्यंत प्रभावी औषधियों का भण्डार, जिसे भस्म एवं रस औषधियों के नाम से जाना जाता है, नवाचारी आयुर्वेद का उत्कृष्ट उदाहरण है। ज्ञान की सीमायें अनंत हैं।

आयुर्वेद के 5000 वर्षों के इतिहास में ऐसा एक भी ग्रन्थ नहीं लिखा गया जो वैज्ञानिक ज्ञान के निरंतर उत्पादन या चिकित्सकीय नवोन्मेष को महत्त्व न देता हो| शास्त्रों, अनुभवों एवं परम्पराओं से मिली समझ समकालीन विश्व में आयुर्वेद के नवाचारी-विकास के लिये तभी उपयोगी है जब आधुनिक विज्ञान की अनदेखी न की गयी हो।

संहिताओं के साथ ही समकालीन वैज्ञानिक शोध और अनुभवजन्य ज्ञान को चिकित्सकीय महत्त्व देना आयुर्वेद की महान परंपरा का सार्थक विस्तार ही है।

जहां तक उच्चकोटि की औषधियों के उत्पादन की बात है उस दिशा में संहिताओं, शोध और अनुभव के एकीकरण से यजुर्विद आयुर्वेद द्वारा आयुर्वेदिक औषधि निर्माण प्रारम्भ किया गया है|

आज इन औषधियों और अपनी युक्ति के माध्यम देश विदेश में बड़ी संख्या में आयुर्वेदाचार्यों द्वारा सफलतापूर्वक चिकित्सा की जा रही है|

आयुर्वेदाचार्यों के मध्य ज्ञान के विभिन्न स्रोतों की गहन समझ ही आयुर्वेद को समकालीन समाज हेतु निरंतर प्रासंगिक बनाये रख सकती है|

यजुर्विद आयुर्वेद अवार्ड इस नवाचारी परंपरा को आगे बढ़ाने का एक अभिनव प्रयास है| यजुर्विद आयुर्वेद पुरस्कार की स्थापना नवाचारी आयुर्वेदाचार्यों को सम्मानित कर आयुर्वेद में नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिये की गयी है|

यही यजुर्विद आयुर्वेद पुरस्कार का मूल उद्देश्य है| यजुर्विद आयुर्वेद अवार्ड विभिन्न देशों में कार्यरत ऐसे आयुर्वेदाचार्यों में से प्रतिवर्ष एक ऐसे आयुर्वेदाचार्य को दिया जायेगा जो स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा और बीमारियों के उपचार के लिये आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों के साथ साथ आधुनिक वैज्ञानिक शोध और अनुभवजन्य ज्ञान को भी महत्व देते हैं|

वस्तुतः जैसे-जैसे विश्व में ज्ञान का उत्पादन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे आयुर्वेद की चिकित्सा को नये आयाम में प्रतिस्थापित करने वाला आयुर्वेदाचार्य ही इस पुरस्कार का पात्र है|

इस अवार्ड की स्थापना संहिताओं, शोध और अनुभव से उत्पन्न प्रमाण के आधार पर उत्कृष्ट औषधियों के निर्माण में कार्यरत स्टार्ट-अप, यजुर्विद आयुर्वेद द्वारा की गयी है|

किन्तु अवार्ड हेतु आयुर्वेदाचार्यों के चयन मेंयजुर्विद आयुर्वेद की भूमिका नहीं है| चयन में वस्तुनिष्ठता सुनिश्चित करने के लिये समिति में ऐसे विद्वान आमंत्रित किये जाते हैं जो स्वयं आयुर्वेद के प्रकाण्ड विद्वान हैं और जिन्हें समाज बहुत सम्मान के साथ देखता है|

वर्ष 2018 में चयन समिति में प्रोफेसर डॉ. माधव बघेल, प्रोफेसर डॉ. श्रीकृष्ण खांडल, डॉ. अंबाशंकर दवे, डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष, डॉ. वी.बी. मिश्रा, डॉ. मोनिका अग्रवाल जैसे प्रतिष्ठित आयुर्वेदाचार्य सम्मिलित थे|

प्रति वर्ष राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस पर घोषित किया जाने यजुर्विद आयुर्वेद पुरस्कार में पचास हजार रुपये नकद, प्रशस्तिपत्र और चरकसंहिता की एक प्रति प्रदान की जाती है।

आचार्य सत्येंद्र नारायण ओझा अपनी चिकित्सकीय सफलता का श्रेय अपने गुरुजनों, विशेष रूप से डॉ. मदन गोपाल शर्मा, डॉ. बनवारी लाल मिश्रा, डॉ. श्रीकृष्ण खांडल तथा डॉ. विजय सिंह को देते हैं|

स्वाध्याय के लिये उन्हें महर्षि-वैज्ञानिक आचार्य चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ, जिसे आज चरकसंहिता के नाम से जाना जाता है, और इस संहिता पर आचार्य चक्रपाणिदत्त की टीका बहुत प्रेरणा देती है|

डॉ. ओझा अपनी माता स्वर्गीय श्रीमती शिवकुमारी ओझा को सेवाभाविता और कर्तव्यपालन की शिक्षा का मूल स्रोत मानते हैं| गुरुजनों के साथ ही अपने शिष्यों के प्रति भी डॉ. ओझा बहुत सम्मान से देखते हैं|

डॉ. ओझा ने अपने विद्वान और कर्मठ शिष्य डॉ. अनंत सामंत, जो वर्त्तमान में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं, के साथ मिलकर पुस्तकें लिखा है जो शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली हैं|

डॉ. ओझा का कहना है कि उन्हें गुरुजनों ने आयुर्वेद में निष्णात किया| साथ ही डॉ. विजय सिंह, जो उन दिनों जब सत्येन्द्र ओझा अपनी स्नातकोत्तर डिग्री एम.डी. हेतु शोध कर रहे थे, सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर थे|

उन्होंने आयुर्वेद एवं आधुनिक शोध विधियों का एकीकरण करने के लिये बहुत प्रोत्साहित किया। पीएचडी हेतु शोध के दौरान डॉ. ओझा ने हृदय रोग पर इन-वाइवो स्टडीज में चूहों और खरगोशों पर भी काम किया।

साझा समझ और निरंतर कठोर श्रम ने डॉ. ओझा को एक ऐसी अंतर्दृष्टि और अनुभव प्रदान किया, जिसके आधार पर आज आयुर्वेद कार्डियोलॉजी और मनोरोग पर उनकी गिनती विश्व के अगुआ विशेषज्ञों में की जाती है।

चिकित्सा के साथ ही डॉ. ओझा की रुचि इस बात पर भी है कि लोग आयुर्वेद के आहार, विहार, दिनचर्या और ऋतुचर्या, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त आदि के पालन से अपने आप को स्वस्थ रखें|

एक स्वस्थ व्यक्ति को कम से कम ऐसा क्या करना चाहिये कि उसका दिल और दिमाग बिल्कुल स्वस्थ रहे? डॉ. ओझा की सलाह यह है कि नियत समय पर, संतुलित और मात्रापूर्वक भोजन, प्रतिदिन अभ्यंग सहित आयुर्वेद की दिनचर्या पालन करना आवश्यक है|

ऐसे कारणों से यथासंभव दूर रहना चाहिये जो मन को दुःख पहुंचाते हैं| भोजन में फलों की मात्रा कम से कम 400 से 500 ग्राम रोजाना होना जरूरी है| पेट की अग्नि अर्थात पाचनशक्ति को सदैव चुस्त-दुरुस्त रखा जाना चाहिये|

भोजन में आंवले की चटनी, विशेषकर जब ताजा आमले के फल उपलब्ध रहते हैं, अवश्य शामिल की जानी चाहिये|

भोजन में लवण की मात्रा अधिक नहीं होना चाहिये| समय पर सोना और प्रातः जल्दी उठकर व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिये बहुत उपयोगी है|

यजुर्विद आयुर्वेद अवार्ड से प्रेरणा लेकर कुछ अन्य संस्थायें और लोग ऐसे और भी अवार्ड्स की स्थापना पर विचार की दिशा में आगे आये हैं|

उन सबको हमारी सलाह यही होगी किआयुर्वेद विश्वास-आधारित नहीं विज्ञान-आधारित चिकित्सा और जीवन पद्धति है|आयुर्वेद प्रमाण पर आधारित है, केवल श्रद्धा और विश्वास पर नहीं।

आयुर्वेद की संहिताओं,साइंस और अनुभव की त्रिवेणी से उपजे ज्ञान-संगम में ही समकालीन विश्व की हितायु और सुखायु आश्रित है। इन विषयों को आगे बढ़ाकर ही हम आयुर्वेद को आगे बढ़ा सकते हैं|

आने वाला समय उन आयुर्वेदाचार्यों का होगा जो समस्त आयुर्वेदिक संहिताओं, समकालीन वैज्ञानिक शोध और स्वयं की चिकित्सकीय दक्षता को निरंतर एकीकृत और आत्मसात करते हुये स्वस्थ्य व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी को रोगमुक्त करेंगे।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं)

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