Jaipur पूरी दुनिया जहां चांद पर पहुंच चुकी है। वहीं राजस्थान के कई जिलों की कई तहसील के कुछ गांवों में आज भी बच्चों को बेचा जाता है, उनको रेबारियों और शहरों में काम करने के लिए गिरवी रखा जाता है।

हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं होने के कारण माता-पिता अपने बच्चों को गिरवी रखने को मजबूर हो रहे हैं।

छोटे-छोटे बच्चों को रेबारियों और शहरों में छोटे मोटे कामों के लिए 1 साल, 2 साल, 3 साल के लिए भेड़, बकरियां और ऊंट चराने के लिए 30000 से लेकर 40000 में गिरवी रखा जा रहा है।

इस गंभीर समस्या को आज विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव के जरिये उठाते हुए डूंगरपुर जिले की चौरासी विधानसभा क्षेत्र के विधायक राजकुमार रोत ने सरकार से सवाल किया और इस प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच करवाने के बाद आदिवासी इलाके में रहने वाले सभी लोगों को रोजगार मुहैया करवाया जाए।

विधायक राजकुमार रोत ने राज्य सरकार से गुजारिश की, कि आदिवासी क्षेत्र में व्याप्त भारी समस्याओं में से एक समस्या यह भी है कि लोग अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी नहीं दे पा रहे हैं और परिवार का खर्चा चलाने के लिए मासूमों को गिरवी रख रहे हैं, जिनका भयंकर शोषण हो रहा है।

ये बच्चे दूसरे राज्यों में बेचे जाते हैं और यहां तक कि दूसरे देशों में भी भेजे जा रहे हैं। मानव तस्करी का यह बहुत बड़ा मामला है, जो आदिवासी क्षेत्रों में आम हो चुका है। यहां पर लोगों को रोजगार नहीं मिलता है, जिसके चलते 2 जून की रोटी खाने के लिए उनको ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं।

आपको बता दें कि राजस्थान के उदयपुर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा समेत कई जिलों में आदिवासी लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, उनको अपनी जमीन का खातेदारी हक नहीं मिला है।

जिसके चलते यहां पर ब्यूरोक्रेट्स के द्वारा उद्योगपतियों और अन्य लोगों को आदिवासियों की जमीन अलॉट कर दी जाती है। ऐसे में उद्योगपति और धनवान लोग इन जमीनों पर कब्जा करने के लिए आते हैं तो पुलिस भी उनका सहयोग करती है, और अंततः आदिवासियों को उनके हक से वंचित कर दिया जाता है, उनको जमीन से खदेड़ दिया जाता है।

ऐसी स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन गंभीर नहीं है और आदिवासियों को मजबूरन शस्त्र उठाने पड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि हालात यही रहे तो आने वाले कुछ समय बाद राजस्थान में भी कई जिले नक्सलवाद जैसी समस्या से ग्रसित हो सकते हैं।

राजकुमार रोत इस मामले को गंभीर बताते हैं। वह कहते हैं कि आदिवासियों को अपनी जमीनों से वंचित किया जा रहा है, उनको बाहर निकाला जा रहा है अपनी जमीन और जंगल बचाने के लिए आदिवासी प्रशासन और पुलिस के मुखातिब होते हैं।

स्थिति यह है कि सदियों से उस जमीन के मालिक रहे आदिवासियों को खातेदारी हक नहीं दिया गया है। जिसके कारण स्थिति यह हो गई है कि ब्यूरोक्रेट्स के द्वारा आदिवासियों की जमीन उद्योगपतियों और अमीरों को आवंटित कर दी गई है।

खाली जमीने, जहां पर आज भी आदिवासी सदियों से रह रहे हैं, उनको उद्योगपतियों को देने का काम बदस्तूर जारी है। इसके चलते आदिवास समुदाय अपने बच्चों को गिरवी रखने को मजबूर हैं।