rusu 2019
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Jaipur

चुनाव चाहे सरपंच का हो या सांसद का, प्रत्याशी बनना और उसके बाद जीत हासिल होने तक उस हार जीत के खौफ में रहना किसी भयानक सपने से कम नहीं होता है।

देश में अभी कहीं बड़ा चुनाव नहीं हैं, लेकिन राजनीति की पहली सीढ़ी कहे जाने वाला राजस्थान के छात्रसंघ चुनाव ने भी जनता की रोचकता और उम्मीदों को आसमान की नई उंचाइयों पर पहुंचा दिया है।

आज से ठीक 11 दिन बाद राजस्थान के सबसे पुराने और बड़े विश्वविद्यालय, यानी राजस्थान यूनिवर्सिटी समेत प्रदेश के 27 सरकारी विश्वविद्यालयों और करीब 200 से अधिक गवर्नमेंट कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव होने जा रहे हैं।

अगस्त माह की 27 तारीख को मतदान और उसके अगले दिन होने वाली मतगणना के परिणाम तक छात्र राजनीति के इस सबसे बड़े चुनाव की सालभर से तैयारी कर रहे छात्रनेताओं की धड़कनों में धुकधुकी शुरू हो चुकी है।

अभी तक राज्य के किसी भी विवि या महाविद्यालय से प्रमुख छात्र संगठनों, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद या नेशनल स्टूडेंट यूनियन ओफ इंडिया के द्वारा अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान नहीं किया गया है।

चुनाव की तैयारी में अपना घर-बार छोड़कर बैठे छात्रनेता सांसदों और विधायकों के चुनाव की तरह ही इन संगठनों से टिकट के लिये जोड़तोड़ में जुटे हुये हैं।

संभावना है कि इसी सप्ताह में कुछ विश्वविद्यालयों और अधिकांश महाविद्यालयों में संगठन अपने पैनल की घोषणा कर देंगे और अगले सप्ताह में सभी विवि और महाविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में भाग्य आजमाने वाले पैनल तैयार हो जायेंगे।

इससे पहले हमने आपको बताया कि यह चुनाव सोशल मीडिया पर लड़ा जाने वाला है। इस खबर में हम आपको बताएंगे कि छात्रसंघ का चुनाव लड़ने वाले नेताओं के सामने क्या क्या समस्याएं आने वाली हैं।

परिणाम से पहले मतगणना, मतगणना से पहले मतदान और मतदान से भी पहले छात्रनेताओं को टिकट मिलना एक बड़ी अग्निपरीक्षा माना जाता है।

यही कारण है कि टिकट हासिल करना इतना आसान नहीं है। कई छात्र तीन से चार साल तक संगठन और छात्रों के बीच जमकर मेहनत करते हैं।

कुछ छात्रनेता हार्ड वर्क के बजाए, स्मार्ट वर्क पर काम करते हैं, मसलन छात्रों की भीड़ एकत्रित कर संगठन पर टिकट के लिये दबाव बनाने के इतर संगठन के पदाधिकारियों को खुश करके टिकट हासिल करना।

कुछ छात्रों ने पैसे के दम पर टिकट हासिल की है। हालांकि कोई भी संगठन पैसे लेकर टिकट देने की बात को स्वीकर नहीं करता है, लेकिन यह सर्व विदित है कि आज की तारीख में कोई भी संगठन ऐसा नहीं है, जो छात्रों से टिकट देने के बदले पैसे नहीं लेता है।

आपको याद होगा बीते दिनों राज्य में बसपा के विधायक राजेंद्र गुढ़ा ने कहा था कि उनकी पार्टी में पैसे लेकर टिकट दिया जाता है, हालांकि उसके बाद विधायक गुढ़ा को बसपा की तरफ से बयान वापस लेने के दबाव का भी सामना करना पड़ा था।

ऐसा पहली बार हुआ कि किसी विधायक ने विधानसभा के भीतर ही खुलेआम अपनी ही पार्टी पर पैसे लेकर टिकट देने का आरोप लगाया था।

इस तरह से खुलकर बोलने की हिम्मत अभी कोई छात्रनेता नहीं कर पाया है, खासकर जीतकर आने वाला तो कतई ही नहीं। हां, हारने या टिकट नहीं मिलने पर जरूर पैसे लेकर टिकट देने के आरोप लगते रहते हैं।

तो छात्रनेताओं के सामने सबसे बड़ी और पहली चुनौती बिना पैसे या कम से कम पैसे में टिकट हासिल करने की होती है।

यह भी विदित है कि छात्रसंघ का चुनाव अब खर्चे के मामले में किसी सांसद या विधायक से कम व्यय होने वाला नहीं है। चुनाव का खर्च 3 करोड़ रुपयों तक पहुंच गया है।

तमाम तरह की कश्मकश के बाद जिस छात्र को टिकट मिलता है, वह अपनी आधी जीत मान लेता है। हालांकि, इसके बाद भी उसके समस्याएं कम नहीं होती है, किंतु उसका आत्मविश्वास उंचा जरूर हो जाता है।

टिकट मिलने के बाद संगठन के दूसरे दमदार छात्रों और उन छात्र नेताओं को मनाने की चुनौती होती है, जो खुद भी टिकट के दावेदार थे।

लेकिन उनको टिकट नहीं मिलता है, जिसके कारण कोपभवन में चले जाते हैं। इसलिये ऐसे छात्र नेताओं को मनाने के लिये साम, दाम, दंड, भेद समेत सभी हथियार आजमाये जाते हैं।

चूंकि साल 2010 से कोर्ट के आदेश पर लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों से चुनाव सम्पन्न होते हैं, अत: उम्र की सीमा भी छात्रों के लिये बड़ी समस्या है।

जो छात्र तय उम्र से काफी पीछे होते हैं, उनको अगले साल टिकट का आश्वासन दिया जाता है, जो उम्मीदवार उम्र पार करने के पड़ाव पर होते हैं, उनको अर्थ प्रभाव से पक्ष में लेने का प्रयास किया जाता है।

हालांकि, ऐसे नहीं है कि इन संगठनों में पार्टियों की तरह भीतरघात नहीं होता है। कुछ छात्र तमाम तरह की सुख सुविधाओं का फायदा लेकर भी भीरतघात कर जाते हैं। तो छात्रनेताओं को ऐसे छात्रों से भी सावधान रहने की समस्या से जूझना पड़ता है।

टिकट मिलने के बाद और मतदान से पहले की रात तक कई छात्रनेताओं का चिंता के मारे दो—चार किलो वजन तक कम हो जाता है।

मतदान से पहले की रात दूर दराज के सभी वोटर्स को एकत्रित कर उनकी बाड़ेबंदी की जाती है, उनकी खातिरदारी की जाती है।

छात्राओं के लिये फिल्म देखने की व्यवस्था के लिये छात्रनेता सिनेमा हॉल तक बुक करवाते हैं। इसके बाद उनको महंगे रेस्टोरेंट में खाना खिलाने का काम भी किया जाता है।

जिस दिन वोटिंग होती है, उस दिन सुबह से लेकर मतदान की प्रक्रिया पूरी होने तक अधिकांश छात्रनेता भूखे ही मिन्नतें करते हुये मिलते हैं। मतदान की प्रक्रिया पूरी होने पर ही सामान्यता उनको भोजन नसीब होता है।

मतदान होने के बाद छात्रनेताओं की मिन्नतें वोटर्स से हटकर देवी—देवताओं की तरफ चली जाती है। हालांकि, मतगणना में शामिल कर्मचारियों से भी फेवर की अनौपचारिक अपील करते हुये मिल जाते हैं।

जैसे जैसे मतगणना शुरू होती है, वैसे वैसे प्रत्याशियों की धड़कनों की रफ्तार स्पीड पकड़नी शुरू होती है। परिणाम आने तक कितनी बार ब्लड प्रेशर उपर—नीचे होता है,।

इस बात को वही जान सकता है, जिसने या तो खुद चुनाव लड़ा हो, या अपने किसी स्वजन को चुनाव लड़वाया हो।

परिणाम आने के बाद जीते हुए प्रत्याशी जहां विवि और कॉलेज में कई दिन तक डिप्रेशन के चलते जाते ही नहीं हैं, जो जीत जाते हैं, उनका बदला व्यवहार देखते ही बनता है।

जो छात्रनेता चुनाव लड़ने से पहले विद्यार्थियों के लिए दिनरात खड़े पाए जाते हैं, वो जीतने के बाद अक्सर फोन नहीं उठाने के आरोप झेलते हैं।