जयपुर।
राजधानी जयपुर के गोपालपुरा मोड पर 5 सितंबर 1997 को सुबह करीब 8 बजे का वो वक्त, जिसने एक ऐसे कांड़ को जन्म दिया, जो राजस्थान के छात्र जीवन इतिहास में श्याह बनकर दर्ज हो गया। सुबह की सुनहरी किरण के साथ शुरू हुई घटना ने कई होनहार ग्रामीण छात्रों की जिंदगी में शाम होते—होते हमेशा के लिये अंधेरा दिया।

रोचक, किंतु दिल दहला देने वाली घटना को भले ही आज कोई 22 साल बाद हम फिर से अपने शब्द दे रहे हैं, मगर इसके जो असली पात्र थे, उनके यहां केवल काल्पनिक नाम लिख रहे हैं, ताकि किसी को मानसिक, सामाजिक, आर्थिक या राजनीति हानि नहीं पहुंचें।

यह सारी जानकारी और इसके तथ्य हमने उस घटना के चश्मदीदों से पूछकर जुटाये हैं, इसलिये इसके तमाम आंकड़ों के लिये हम दावा नहीं करते हैं, केवल उसको शब्दों में पिरोने का काम कर रहे हैं। उस घटना के बाद जो कुछ हुआ, वह सबकुछ थाने की फाइलों और न्यायायिक प्रक्रिया में दर्ज है और उसको कोई भी झुठला नहीं सकता।

घटना इस तरह है:— सुबह करीब 8 बजे राजस्थान विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्र प्रदीप, जो कि जेसी बॉस हॉस्टल में रहता था, उसने अपने दुपहिया वाहन की सर्विस करवाने के लिये ​हॉस्टल से त्रिवेणी के लिये रवानगी ली। बमुश्किल 10 से 15 मिनट के भीतर वह गोपालपुरा मोड पहुंचा, जहां उसको एक परिचित युवती मिल गई।

प्रदीप ने तुरंत अपना दुपहिया रोका। दोनों के बीच चूंकि जान पहचान पहले से थी, तो 2 मिनट के लिये वार्तालाप हुआ और तय हुआ कि दुपहिया की सर्विस बाद में करवाई जायेगी, पहले युवती को उसकी मर्जी से लेकर हॉस्टल जाया जाए। दोनों हॉस्टल पहुंच गये और दोनों एक—एक बोतल बीयर पी। बीयर पीने के बाद दोनों ने एक—दो बार शारीरिक संबंध बनाये।

किंतु मामला यही नहीं थमा। प्रदीप के साथी हॉस्टलर्स को इस दौरान सारी बात पता चल गई। बताया जाता है कि युवती ‘निम्फोमेनिया’ नामक बीमारी से ग्रसित थी। इस बीमारी में वैसे तो कोई अवगुण सामने नहीं आते हैं, किंतु डॉक्टरों के अनुसार कम उम्र में जिस बच्चे या बच्ची को संभोग का चस्का लग जाता है, वह इसके लिये जवानी में बहुत ज्यादा उग्र होता है, उसको अधिक और बार—बार चाहत होती है।

बताया जाता है कि वह युवती इसी ‘निम्फोमेनिया’ बीमारी से ग्रसित थी, जिसको एक से अधिक मर्दों के साथ संभोग करने में आनंद का अनुभव होता है। हॉस्टल में प्रदीप के अन्य साथी, जो करीब 8 जने थे, ने भी बीयर पीकर युवती से उसकी स्वेच्छा से शरीरिक संबंध बनाये। यहां तक भी सबकुछ ठीक चल रहा था।

मगर, जब युवती को रुपये देने की बारी आई तो उन लड़कों ने उसका पर्स छीन लिया और उसमें 100 रुपये थे, वह भी निकाल लिये। नशे में धुत्त लड़कों ने युवती को वहां से दो—चार थप्पड़ जड़कर भगा दिया। इस सारी घटना के एक और चश्मदीद गवाह थे, जो वहां पर गार्ड की नौकरी किया करते थे। उनका नाम था दलपत चौकीदार।

जब लड़कों ने युवती को चांटे मारे, तब सारी घटना को दलपत भी देख रहा था। उसने युवती को कहा कि तुम अभी यहां से चले जाओ। युवती रोती हुई विवि के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ रही थी। तभी राजनीतिक विज्ञान भवन के सामने उसको रोती देखकर कुछ लड़कों ने गांधी नगर थाने में जाकर शिकायत करने की सलाह दी।

यह बात युवती के दिमाग में क्लिक कर गई। वह सीधी थाने पहुंची। जहां पर थानाधिकारी का चार्ज एक सब इंस्पेक्टर के पास था। वह बहुत ही ईमानदार बताया जाता है, किंतु उसकी सोच हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के प्रति दुर्भावनापूर्ण थी। उसने युवती की शिकायत लिखी और उसे वापस तस्दीक के लिये हॉस्टल ले गया।

हॉस्टल में जैसे अमुमन हालात होते हैं, वही मिले। कमरों में जगह जगह बीयर की बोतलें, सिगरेट के कस लगाये हुये टुकड़े और यहां—वहां बिखरा हुआ सामान। थानाधिकारी ने घटना को भांप लिया, किंतु उसने गोपालपुरा मोड से शुरू हुई असली कहानी को दरकिनार कर युवती के साथ सॉफ्ट कॉर्नर रखते हुये रिपोर्ट तैयार कर दी।

बाद में हॉस्टल के गार्ड दलपत ने अपने बयानों में साफ बताया कि युवती उन लड़कों के पास हॉस्टल में अक्सर आया—जाया करती थी, लेकिन उस दिन उसके साथ मारपीट करने और पैसे छीनने के कारण उसका ‘ईगो हर्ट’ हो गया। साथ ही उसको थानाधिकारी का साथ मिल गया, जो उसकी दबी हुई भावनाओं को उभारने का काम कर रहा था।

थानाधिकारी ने लड़की की शिकायत पर दो एफआईआर दर्ज की। एक में उसके साथ गैंगरेप होने और दूसरी में एक से अधिक लड़कों द्वारा लगातार यौन शोषण करने का मुकदमा दर्ज किया। यौन शोषण के मुकदमे में 142 छात्रों को आरोपी बताया गया। हॉस्टल में रहने वाले तकरीबन सभी छात्र इसमें आरोपी हो गये थे।

इस घटना में एक पात्र और था, जिसका नाम था भोला यादव। वह कई मर्डर करने के कारण दिल्ली पुलिस का हिस्ट्रीशीटर था। वह भी उसी दिन हॉस्टल में अपने दोस्तों के पास आया हुआ था। मुकदमा दर्ज होने और पुलिस के पीछे पड़ने बाद उसने आरोपी छात्रों को अपनी जीप में लेकर हॉस्टल से फरार कर दिया। वह तब भी स्वचालित हथियारों का जखीरा अपने साथ रखता था। ​विवि से निकलते वक्त उसका सामना पुलिस से हुआ, किंतु उसने अपनी चालाकी से जीप को निकालने में कामयाबी हासिल कर ली।

उसने सभी आरोपियों को राजापार्क में अलग अलग जगह उतार दिया। तब तक पुलिस को सूचना मिल चुकी थी, कि दिल्ली का हिस्ट्रीशीटर मदद कर रहा है। पुलिस ने उसकी तलाशी शुरू कर दी। गाड़ी नंबरों के आधार पर उसकी ‘टाटा सूमो’ गाड़ी की पहचान हुई। पुलिस उसके पीछे लग गई।

अब तक एक चीज और इस घटना में शामिल हो चुकी थी, और वह थी उच्च स्तरीय राजनीतिज्ञों का दखल। बताया जाता है तब के मुख्यमंत्री भैंरूसिंह शेखावत ने खुद इसमें इंटरेस्ट लिया और बिना देरी किये सभी आरोपियों को पकड़ने के सख्त निर्देश दिये।

यह भी सर्वविदित है कि सीएम शेखावत बहुत मजें हुये राजनीतिज्ञ थे। इस कांड़ में जो आरोपी थे, उनमें एक छात्र तब के एक विधायक का बेटा था, जो कांग्रेस के थे। सीएम शेखावत बीजेपी के थे। एक अन्य आरोप दूसरे कांग्रेसी विधायक का साला था।

मजेदार बात यह है कि एक आरोपी तो ऐसा था, जो खुद पुलिस का अधिकारी बन चुका था। जिसकी पहचान युवती ने जांघ पर तिल का निशान होने के रूप में बताई थी। बाद में वह इस कांड़ से बरी हो गया। आज भी वह पुलिस में उच्च अधिकारी है।

तत्कालीन मुख्यमंत्री शेखावत के द्वारा अधिक रुचि ली गई और आरोपियों की धरपकड़ तेज कर दी गई। पुलिस अधीक्षक अजीत सिंह और डीसीपी सीबी शर्मा मामले को देख रहे थे। वैसे भी सीबी शर्मा को एक खास वर्ग का धुर विरोधी माना जाता है, इसलिये उन्होंने इस घटना के आरोपियों को पकड़ने के लिये दोगुने जोश से काम किया।

दूसरे या तीसरे दिन दिल्ली के हिस्ट्रीशीटर भोला यादव जयपुर से निकल गया। इसकी सूचना पुलिस को लगी, तो वह पकड़ने के लिये पीछे लग गई। चौमू के पास भोला के द्वारा नाकाबंदी तोड़ने के दौरान उसकी गाड़ी के टायर में लोहे का एंगल लग गया। उसने पंचर हुई सूमो गाड़ी वहीं छोड़ी और बस में बैठकर पहले चौमू और वहां से जयपुर—दिल्ली रोड होते हुये दिल्ली निकल गया।

इस मामले में पुलिस ने अपनी पूरी जान झोंक दी। आखिरकार सभी 8 मुख्य आरोपियों समेत सभी सहयोगियों को पकड़ लिया गया। दूर गांव से, जहां के छात्र मूल निवासी थे, वहां से भी पुलिस ने धरपकड़ कर सभी को गिरफ्तार कर लिया। आरोपी श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर, झुंझुनूं, नागौर और चूरू के थे।

अब पुलिस का काम खत्म हुआ, उसने चालान पेश कर दिया। फिर कोर्ट की ट्राइल शुरू हुई। कई बरसों बाद, जैसा कि हमारी न्यायायिक व्यवस्था की परम्परा है, मुख्य आरोपी प्रदीप, द्वेषनारायण, काटे सिंह, देवेंद्र, प्रभुदयाल, खुरदीप और भूपसिं​ह को 27 अक्टुबर 2012 को 15 साल की सजा हुई।

उस घटना को मीडिया ने ‘जेसी बॉस कांड़’ नाम दिया। एक और घटना का जिक्र करना जरूरी हो। जब उस कांड़ की ट्राइल चल रही थी, तब तक उस युवती के एक नामी डॉक्टर से संबंध स्थापित हो गये थे। उसने डॉक्टर पर भी 1998 के दौरान बलात्कार का मामला दर्ज करवाया था। जिसको सीबीआई द्वारा जांच में फ्रॉड पाया।

इसके बाद युवती का एक एनआरआई से विवाह हो गया, किंतु वह कोई एक साल बाद ही अपने पति को छोड़कर वापस भारत आ गई। अब सभी सजायाप्ता कैदी अपनी सजा काटकर जेल से बाहर आ चुके हैं। जो पीड़ित चुवती थी, वह भी आज एक महकमें में सरकारी नौकरी कर रही है, जो कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार के द्वारा दी गई थी।