जयपुर। सरकारी विद्यालयों का ढर्रा केवल ड़रावना नहीं है, बल्कि अब तो जरजर से भी जरजर हो चुका है। कह सकते हैं कि राजस्थान में सरकारी स्कूल अपने आखिरी दिन गिन रहे हैं। शिक्षक दूर गांवों से अपने घर के नजदीक शहरों में तबादलों के लिए मंत्री, अधिकारी और विधायकों के यहां सेटिंग बिठाने में व्यस्त हैं और बच्चों की संख्या स्कूलों को बंद करने की तरफ बढ़ रही हैं।

ऐसे ही एक सरकारी स्कूल की कहानी आज हम आपको बताएंगे, जहां पर बच्चों की संख्या इतनी है कि स्कूल में दिखाई भी नहीं देते हैं। जबकि पढ़ाने वाले और स्कूल को संभालने वाले, कह सकते हैं कि उन शिक्षकों को चाय—पानी पिलाने वाले स्टाफ के अलावा विद्यालय में कुछ दिखता ही नहीं है।

यह स्कूल है राजस्थान की राजधानी जयपुर के बजाज नगर में। यूं तो यहां पर कई मंत्रियों, उच्च अधिकारियों और आईएएस, आईपीएस के अलावा विधायकों के बंगले हैं, किंतु स्कूल में बच्चों और स्टाफ के अनुपात की स्थिति देखकर ग्रामीण इलाके का स्कूल भी शरमा जाये।

इस स्कूल में एक छात्रा समेत कुल 6 विद्यार्थी हैं, जबकि यहां पर उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों और सहायक स्टाफ को मिलाकर 30 जने हैं। न शिक्षकों को शर्म है और न ही यहां से दिनरात गुजरने, देखने और रहने वाले सरकारी अधिकारियों को ही शर्म आती है।

कम बच्चों के बारे में बात करने पर स्कूल की प्रधानाध्यापक डॉ. सरला शर्मा बहुत ही बेशर्मी से कहती हैं कि वह मोटिविशनल स्पीच देती हैं, ताकि अधिक से अधिक बच्चे हों, किंतु सवाल यह उठता है कि डॉ. शर्मा किसको यह स्पीच देती हैं?

6 विद्यार्थी, 30 जनों का स्टाफ, देखिये राजधानी का सरकारी स्कूल 1

एक अन्य शिक्षिका ने बताया कि उन्होंने आसपास के लोगों बहुत से भी संपर्क किया, लेकिन कोई आना ही नहीं चाहता है। कई शिक्षकों ने तो कैमरा देखकर बात करने से मना कर दिया। एक शिक्षक ने बताया कि वह अपना 100 फीसदी देते हैं। ​मगर सवाल यह है कि वह यह 100 प्रतिशत देते किसकों हैं?

सवाल कई उठते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार सरकारी अधिकारी, मंत्री और खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार इस प्राइम लोकेशन पर बने स्कूल भवन को विद्यार्थियों से मुक्त कर निजी हाथों में बेचना चाहती है? जिस तरह की चर्चा चल रही है, उससे यही प्रतीत होता है।

कुछ भी संभव है, ​क्योंकि जयपुर में कई ऐसे भवन, जो अस्पतालों और सरकार के अन्य कार्यालयों के लिये बनाए गये भवन निजी हाथों में सौंपे जा चुके हैं। शायद विधाायक, मंत्री भी जीतकर इसलिए जन प्रतिनिधि बनते हैं ताकि अपना जुगाड़ बिठाकर जमीनें हड़पी जा सकें और अपने चहेतों को दिला सकें।

विद्यालय की बात की जाये तो यह शहर की सबसे प्राइम लोकेशन में से एक पर स्थि​त है। यहां पर राज्य के सरकार के तमाम मंत्री, अधिकारी और जजों के बंगले हैं। कह सकते हैं कि राजस्थान की सरकार पूरी की पूरी यहां पर मौजूद है, किंतु सभी ने अपनी आंखें बंद कर रखी है।

शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को पाठ्यक्रम से हटाने,​किताबों से जोहर का चित्र मिटाने, साइकिलों से भगवा रंग मिटाकर उनको काला करवाने, स्कूलों में मिलने वाले छात्रवृत्ति से पं. दीनदयाल उपाध्याय का नाम हटाने में व्यस्त हैं और सरकारी स्कूल बंद होने की कगार पर पहुंच गये हैं।

यहां के स्थानीय लोगों का कहना कहना है कि यह स्कूल कभी बहुत आबाद हुआ करता था। यहां पर प्रवेश लेने के लिए बड़े बड़े अधिकारियों की एप्रोच लगानी पड़ती थी, किंतु आज हालात यह है कि कोई भी अपने बच्चों को यहां भेजकर उनका भविष्य खराब नहीं करना चाहता है।

राज्य सरकार भले ही समय की मांग कहकर हर जिले में एक अंग्रेजी स्कूल खोलने का दावा करती हो, लेकिन सवाल यह है कि जब पहले से मौजूद सरकारी स्कूलों में चल रहे पाठ्यक्रम ही पूरे नहीं होंगे तो अंग्रेजी स्कूल खोलकर क्या हासिल कर लेंगे?

बिलकुल साफ है, हर माह एक लाख रुपये के करीब तनख्वाह लेने के बाद भी अगर कोई शिक्षक विद्यार्थियों की संख्या नहीं बढ़ा सकता तो साफ है कि राज्य के शिक्षक केवल अपना समय गुजारने और वेतन भोगने के लिए ही विद्यालयों में जाते हैं।