Jaipur metal's
Jaipur metal's employers dharana

Jaipur news.

आज़ाद हिन्दुस्तान (freedom india) में शायद ही ऐसा धरना कहीं चल रहा हो, जैसा की जयपुर मैटल कारखाने (Jaipur metal’s factory) के श्रमिक (employee) दे रहे हैं।

पूरे 5 हज़ार दिन से इस कारखाने के श्रमिक हर रोज आकर कारखाने के बाहर धरना दे रहे हैं, लेकिन 18 साल पहले शुरू हुआ और कभी राजस्थान सरकार को सबसे ज्यादा टेक्स जमा कराने वाला यह कारखाना अब भी बंद पड़ा है।

इस फैक्ट्री फिर से शुरू करवाने के लिए श्रमिक इसके गेट के बाहर बैठकर ही धरना दे रहे हैं, लेकिन सरकारी लापरवाही ऐसी है कि 405 श्रमिकों की मौत हो जाने और 12 से ज्यादा मजदूरों के परेशान होकर कारखाने को खुलवाने के लिए आत्महत्या किये जाने के बावजूद भी इस पर लगे ताले अब तक नहीं खुल रहे हैं।

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करीब 18 साल पहले जयपुर मैटल के कारखानों में धुआं उगलना क्या बंद हुआ, इसके फिर से शुरू होने की आस लगाए धरना दे रहे इस कारखाने के मजदूरों के घर का मानों चूल्हा ही बुझ गया।

बंद होने के साथ ही इन्होंने जो धरना शुरू किया, आज उसे पूरे 5000 दिन हो चुके हैं। इस दौरान कई सरकारें आई और गईं भी, मुख्यमंत्री बदले, मंत्री बदले, अधिकारी भी बदले, लेकिन आश्वाशन के अलावा इन्हें अब तक कुछ भी नहीं मिला।

इस दौरान किसी का घर छूटा तो कईयों के बच्चों की पढाई ही बंद हो गई। जेवर-मकान बिके और पूरा परिवार ही मानों बिखर गया।

बावजूद इसके चकरी वाले मीटर बनाकर किसी जमाने में घर-घर पहुंच चुकी जयपुर मैटल में आज न तो चिमनी से धुआं निकलता है और न ही मशीनों की आवाजें आती हैं।

यह संघर्ष की कहानी एक ऐसे उद्योग की है, जो हमेशा फायदे में रहा और जिसके उत्पाद गुणवत्ता के कारण देश-विदेश में सराहे गए।

मजदूर संघ के महासचिव कन्हैया लाल का कहना है कि देश-प्रदेश की सरकारों को हर स्तर पर गुहार लगाई, लेकिन हमेशा केवल अस्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। अभी प्रदेश में संवेदनशील कहे जाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अभी, पहले की सरकारों में खूब मिन्नतें की जा चुकी हैं।

दरअसल, घर की नैया को चलाने वाला कारखाना बंद होने का गम इसके श्रमिक अब तक भी सहन नहीं कर पा रहे हैं। उम्मीद ऐसी है कि कारखाने के बाहर ही अपना दम तोड़ने को मजबूर हैं।

नतीजा 30 सितम्बर साल 2000 को जब कारखाने में अचानक ताला लगाकर इन सबकी नौकरी छीन ली गई, तब से लेकर अब तक यहां पर काम करने वाले 1558 श्रमिकों ने धरना शुरू कर दिया।

इसी दौरान अब तक 405 श्रमिकों की मौत हो चुकी है और 12 से ज्यादा मजदूरों ने इसे खुलवाने की मांग को लेकर आत्महत्या भी कर ली। आज भी इनकी विधवाएं मैटल के दरवाजे पर चल रहे धरने में आती हैं और कारखाना चालू होने की प्रार्थना करती हैं।

कंपनी का कर्मचारी लाडू राम शर्मा का कहना है कि ऐसी सरकारी संस्थानों को बंद कर दिया जाना सरकारों की असलियत दिखाने के लिए काफी है। रोंगटे खड़े कर देने वाला यह मंजर यहां खड़ी महिलाओं के चेहरे पर साफ झलकता है।

यह इन श्रमिकों की मेहनत और आधुनिक तकनीक के उपयोग का ही नतीजा था कि ना केवल उस वक़्त कंपनी के उत्पाद प्रदेश में घर-घर पहुंच चुके थे, बल्कि अन्य राज्यों और विदेशों में भी इनकी भारी मांग थी। जिसके चलते यह उद्योग राजस्थान के विकास के पहिए का अहम हिस्सा भी साबित हो रहा था।

लाडू राम शर्मा का कहना है कि वर्ष 1995 में जयपुर मैटल का लाभ 5.85 करोड़ रुपए को छू गया था। यह कंपनी सरकारी खजाने की बड़ी जरिया रही, लेकिन इस कंपनी को सरकार की लापरवाही ने ऐसा खोखला किया कि श्रमिक तक अपनी तनख्वाह के लिए तरस गए।

साल 1995 तक भारी मुनाफे में रहने वाला जयपुर मैटल सरकारी लापरवाही के चलते घाटे में चला गया। प्रबंधन के गलत निर्णयों से निजी कंपनियों को मुनाफा हुआ।

बिना जरुरत के करीब 7 करोड़ रुपए लागत की विदेशी व स्वदेशी मशीनें भी खरीद ली गईं। इन मशीनों को लगाया भी नहीं गया। ये मशीनें आज भी कारखाने के गोदामों में पैकिंग में रखी हैं।

इस कारखाने की जमीन भी अब सरकारी अफसरों ने कौड़ियों के दाम बेच दिया है, जिस पर अब आवासीय परिसर बन गए हैं। हालात यह है कि कर्मचारियों को उसके बाहर सड़क पर ही धरने देकर बैठे हैं।

यूनियन अध्यक्ष हनुमान मेहर का कहना है कि इसको निपटाने का काम कुछ अफसरों का था, जिसको सरकार ने आंख बंद करके स्वीकार कर लिया। सरकार का एक ऐसा उपक्रम, जो फायदे में था को चंद लोगों के लालच ने खत्म कर दिया।

तथ्य यह है कि तत्कालीन प्रबंधन पर अपने चहेतों को कई तरह से लाभ पहुंचाने का भी आरोप लगा। किसी कम्पनी से आर्डर मिलने की खुशी में लाखों रुपए के उपहार दिए गए। जिसके चलते केवल दो साल में ही कंपनी का ढांचा चरमरा गया।

बिजली विभाग को मीटर व केबल की आपूर्ति करने के लिए जारी टैंडर को अधिकारियों ने मिलीभगत कर लीक कर दिया, जिससे कारखाने को करोड़ों के ऑर्डर से वंचित होना पड़ा।

7 माह मजदूर ठाले बैठे रहे मजदूरों को भी वेतन दिया। नतीजा कारखाना बंद होने के बाद इसके श्रमिक आज भी मुफलिसी की जिंदगी जी रहे हैं। आश्वासन तो कई न्मंत्रियों और नेताओं ने इन्हें दिया लेकिन सरकार से कोई कभी कोई रेस्पॉन्स नहीं आया।

हालांकि, कारखाना चलाने के लिए सरकार ने 24 जुलाई 2007 में जीनव पावर कम्पनी के साथ समझौता करके इन्हें उम्मीद की किरण दिखाई, लेकिन इस समझौते के अब तक लागू नहीं होने से कारखाने के श्रमिकों का भविष्य अंधकारमय ही बना हुआ।

बेरोजगार हुए 4 श्रमिक आज भी पागल होने के कारण बाजारों में चिल्लाते हुए नजर आते हैं। बहरहाल 5003 दिन धरना पूरा होने के बावजूद भी यहां पर कभी काम करने वाले मजदूरों को लगता है की उनके भी देर सवेर अच्छे दिन तो आयेंगे ही।

Content by- Shrivatsan

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