जयपुर।

राजधानी में 65 साल की शिक्षिका को इनदिनों अपने रोजी रोटी के जुगाड़ के लिए गुहार लगानी पड़ रही हैं। दिल की बीमारी के आगे सरकारी नौकरी चली गई तो गुजर बसर करना मुश्किल हो गया।

शिक्षिका ग्रेच्यूटी और पेंशन की मांग को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक को अपनी पीड़ा भेज चुकी हैं, लेकिन अब तक उन्हें राहत नहीं मिल सकी हैं।

65 साल की शम्मीरानी भार्गव को साल 1974 में सरकारी नौकरी मिली थी, तब वो काफी खुश थीं। शुरूआती दौर में जोधपुर और जयपुर की विभिन्न स्कूलों में बतौर शिक्षिका उन्होंने कई विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षा का उजियारा फैलाया।

इस दौरान साल 2004 में दिल की बीमारी हुई तो उनके जीवन में कई तकलीफें एक साथ खड़ी हो गई। इस दौर में उनका तबादला कभी चौमू तो कभी सांगानेर हुआ।

उन्होंने अपने गिरते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए छुट्टिया मांगी, किन्तु शम्मीरानी को छुट्टी नहीं मिली। बीमारी के कारण ड्यूटी ज्वाइन नहीं कर पाने पर उनकी नौकरी चली गई।

साल 2004 से 2017 तक उनके पास गांधी नगर में सरकारी आवास था, लेकिन उसे भी बाद में प्रशासन ने खाली करवा लिया। ऐसे में आवास के लिए इधर-उधर भटकना पड़ा।

आखिर में कमरा किराए पर लिया तो किराया चुकाने की मुसीबत हो गई। शम्मीरानी ने तत्कालीन सरकार से लेकर मौजूदा सरकार के कई मंत्रियों और नेताओं के खूब चक्कर लगाए, लेकिन उन्हें कोई भी उनकी पेंशन दिलवाने में कामयाब नहीं हुआ।

सरकारी विभागों ने नियमों का हवाला देते हुए उनसे दूरी बना ली। हार्ट पेंशेंट होने के कारण दवाई के खर्च तक के लिए शिक्षिका को हाथ फैलाने पर मजबूर होना पड़ रहा हैं।

जब वे अपने बीते दौर को देखती हैं तो उनकी आंखों से आंसू निकल आते हैं। अपनी शारीरिक तकलीफों के चलते नौकरी जाने से पहले उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसे भी दिन देखने को मिलेंगे।

पति नारायण दास भार्गव का स्वास्थ्य सहीं नहीं होने के कारण वे भी कोई काम करने में सक्षम नहीं हैं। परिवार में कोई बेटा नहीं होने के चलते बेटियों ने सार संभाल भी की है, लेकिन इस दम्पत्ति की गुहार है कि उन्हें 30 साल सेवा के बाद भी पेंशन नहीं मिल रही है।

सवाल यह है कि जिस शिक्षिका ने बरसों तलक बच्चों के भविष्य को संवारा, वही अब खुद के अतीत को देखकर जिंदा रहने की आस छोड़ती नज़र आ रही हैं।

अपने भविष्य की तो उन्हें चिंता नहीं है, लेकिन वर्तमान में जीवन बसर करने के लिए उन्हें सरकारी मदद की दरकार है। मंत्रियों के चक्कर लगाने के बाद मिले आश्वासनों से काम चलता तो शायद एक शिक्षिका आज यूँ न भटकती। लेकिन उनको अब भी उम्मीद है कि बुढापे में उनकी ये पीड़ा जिम्मेदारों की आंखे खोलेंगी।