-आदेश हुए भी और नहीं भी हुए, पिछले छह से आठ माह का मानदेय भुगतान भी अभी तक नहीं हुआ, दोनों विभागों की लड़ाई में फुटबॉल बनकर रह गए हैं पंचायत सहायक।

Jaipur

मई 2017 से पंचायतों एवं विद्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे पंचायत सहायक दोनों विभागों की आपसी तनातनी में शतरंज के मोहरे बनकर रह गए हैं।

अल्प मानदेय में कार्य कर रहे पंचायत सहायकों को दोनों विभाग जैसी मर्जी हो उस तरीके से इस्तेमाल करते हैं अपनी जरूरत अनुसार और फिर एक दूसरे की तरफ फुटबॉल के किक मारते हैं, उस तरीके से किक लगाते हैं।

राजस्थान विद्यार्थी मित्र पंचायत सहायक संघ के प्रदेश संयोजक अशोक सिहाग ने बताया कि पिछले 4 माह से कार्यकाल वर्दी के आदेश को लेकर दोनों विभागों की आपसी लड़ाई चरम पर रही, उसके बाद जैसे तैसे 6 सितंबर को पंचायत राज विभाग द्वारा आधे अधूरे आदेश या यूं कहें दिशा-निर्देश निकाले गए।

जिनके ऊपर आगामी कार्रवाई शिक्षा विभाग द्वारा सुनिश्चित करनी थी और पंचायत सहायकों का स्पष्ट
आदेश जारी करना था, जिसको समस्त जिला शिक्षा अधिकारियों एवं जिला परिषद सीईओ को प्रेषित करना था। पंचायत राज विभाग के साथ जबकि आज तक ऐसा नहीं किया गया है।

विभाग की इस आपसी लड़ाई में 27000 पंचायत सहायक पिस रहे हैं। विभागों की इस आपसी लड़ाई में आदेश होकर भी आदेश नहीं हुए।

आदेशों की आड़ लेकर ही पिछले 6 से 8 माह के मानदेय का भुगतान भी अब तक नहीं किया गया है जिसके कारण पंचायत सहायकों को मानसिक तनाव के साथ आर्थिक परेशानी भी झेलनी पड़ रही है।

दरअसल, विद्यार्थी मित्र शिक्षकों को समायोजन के लिए निकाली गई पंचायत सहायक भर्ती प्रक्रिया अपनी शुरुआत से ही विवादास्पद रही है।

वर्तमान में 6000 विद्यार्थी मित्र पंचायत सहायक भर्ती प्रक्रिया से बाहर हैं। 1700 पदों का मामला न्यायालय में विचाराधीन है जिसके ऊपर भी अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है।

प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र चौधरी के नेतृत्व में राजस्थान विद्यार्थी मित्र पंचायत सहायक के संघ के बैनर तले मुख्यमंत्री उपमुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, पंचायती राज मंत्री के साथ पंचायत राज विभाग एवं में शिक्षा विभाग के तमाम आला अधिकारियों के सामने अपनी समस्याएं रखी गई।

उनके समाधान की मांग की गई। उसके बावजूद भी आज के दिन तक सकारात्मक पहल के साथ समाधान नहीं हुआ है जबकि यह सारा मामला 1 दिन में साफ किया जा सकता है।

संविदा कर्मियों के लिए गठित कमेटी के सामने भी अपनी बात रखी गई, जहां नियमितीकरण की बात की गई। नियमितीकरण तो दूर की बात है 4 महीने के दौरान एक स्पष्ट आदेश भी जारी नहीं किया गया है।