नई दिल्ली।

अगले 3 महीने बाद देश में आम चुनाव होने वाले हैं। उससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के लिए शीर्ष अदालत का एक फैसला गले की हड्डी बनता जा रहा है।

हालांकि, फैसला उच्चतम न्यायालय का नहीं होकर इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए मूल फैसले की रिट के निस्तारण के रूप में सामने आया है। लेकिन जिस तरह से देशभर में इसको लेकर उबाल है, उससे साफ तौर पर कहा जा सकता है कि यदि इसको लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अध्यादेश नहीं लाती है, तो आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इससे पहले बीते साल सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एससी-एसटी एक्ट के तहत बिना जांच के गिरफ्तारी पर रोक लगाने के फैसले के बाद देशभर में मोदी सरकार के खिलाफ दलित समुदाय का गुस्सा फूटा था।

फैसला शीर्ष अदालत का होने के बावजूद दलित समुदाय ने देशभर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ 2 अप्रैल को भारत बंद करने का ऐलान किया। इसमें जहां हजारों करोड़ का नुकसान हुआ, वहीं सवर्ण समाज और दलित समुदाय की आपसी भिड़ंत में 9 लोगों की जान भी चली गई।

बाद में केंद्र की मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट में बदलाव किया और उसने तीन बिंदु जोड़ते हुए ज्यादा मजबूती के साथ पुनः स्थापित कर दिया। इसके बाद यह एक्ट मजबूती के साथ दलित समुदाय के लिए एक ढाल बन गया है। अब किसी दलित व्यक्ति को जाति सूचक शब्द कहने पर पुलिस के द्वारा बिना जांच किए ही गिरफ्तारी की जाती है।

खास बात यह है कि यह फैसला मोदी सरकार के बजाए सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिया गया था। जिसके तहत दलित समुदाय के द्वारा जाति सूचक शब्द कहने पर दर्ज करवाए जाने वाले केस के बाद तुरंत आरोपी की गिरफ्तारी होने पर रोक लगाई गई थी, लेकिन उसके विरोध में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अध्यादेश लाकर एक कानून पारित किया और एससी-एसटी एक्ट को मजबूती के साथ लागू किया। बावजूद इसके बीजेपी को दिसम्बर में हुए चुनाव के वक्त 5 में से 3 राज्यों (राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश) में हार का मुंह देखना पड़ा।

एक और खास बात यह है कि एससी-एसटी एक्ट के तहत गिरफ्तारी पर रोक लगाने का फैसला देने वाले शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा थे। जस्टिस दीपक मिश्रा को बीजेपी और नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता था, लेकिन उनके ही फैसले के बाद बीजेपी सरकार को तीन राज्य में सत्ता गंवानी पड़ी।

साल 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के द्वारा दिए गए फैसले के विरोध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई स्पेशल लीव पिटिशन (एसएलपी) को खारिज किए जाने के कारण फिर से शीर्ष अदालत सुर्खियों में है।

वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई हैं। जस्टिस रंजन गोगोई को कांग्रेस पार्टी के करीब कहा जाता है, जबकि उनके फैसले अभी तक कांग्रेस पार्टी के लिए मुफीद साबित नहीं हुए हैं। बावजूद इसके शीर्ष अदालत के इस ताजा फैसले ने नरेंद्र मोदी सरकार को मुश्किलों में जरूर डाल दिया है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार एक बार फिर से अध्यादेश लाकर 13 पॉइंट रोस्टर को पुनः 200 पॉइंट रोस्टर में बदलने का काम करेगी या फिर इसी तरह से ढुलमुल रवैये के साथ लोकसभा चुनाव का सामना करेगी?

कहा जा सकता है कि अगर केंद्र सरकार ने अध्यादेश लागू नहीं किया, और आज से बजट सत्र शुरू हो चुका है, तो इसी सत्र में कानून बनाकर फिर से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षक भर्ती के लिए 13 पॉइंट रोस्टर की जगह 200 पॉइंट रोस्टर को लागू नहीं किया, तो निश्चित रूप से बीजेपी को लोकसभा चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट के द्वारा साल 2017 में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा गया कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विभाग को इकाई मानकर शिक्षक भर्ती की जाएगी। इस फैसले के कारण देश के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हो रही शिक्षक भर्ती में एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षित वर्ग को सीट नहीं मिल पाई।

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुनाए गए फैसले से जहां मोदी सरकार को दलित समुदाय के गुस्से का सामना करना पड़ा था। वहीं चुनाव से करीब 4 माह पहले शीर्ष अदालत के एक दूसरे फैसले के कारण sc-st के अलावा ओबीसी वर्ग भी खासा गुस्से में है।

अगर मोदी सरकार ने अध्यादेश लाकर इसका निस्तारण नहीं किया तो लोकसभा चुनाव में एक मोटा वोट बैंक बीजेपी के खिलाफ खड़ा हो सकता है। इसके चलते एक बार फिर से सत्ता में आने का सपना देख रही बीजेपी और मोदी के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है।

आपको यह भी बता दें कि विपक्ष के द्वारा रफाल मामले में बार बार मोदी सरकार पर आरोप लगाने के अलावा सुप्रीम कोर्ट की ओर से बीते साल के शुरुआत में एससी-एसटी एक्ट को निष्प्रभावी करने वाले निर्णय ही नुकसान पहुंचाने की स्थिति में दिख रहा था।

लेकिन अब शीर्ष अदालत द्वारा ही कॉलेज-विवि की शिक्षक भर्ती में 200 पॉइंट रोस्टर की जगह 13 पॉइंट रोस्टर वाले मामला दिक्कतें करता नजर आ रहा है। इसके अलावा कोई भी ऐसा दाग नहीं है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि मोदी सरकार फिर से सत्ता में नहीं लौटेगी।

हालांकि, विपक्ष की मांग के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने रफाल मामले में जांच नहीं की, लेकिन पिछले साल sc-st एक्ट में बदलाव और अब 13 पॉइंट रोस्टर वाले प्रकरण को लेकर शीर्ष अदालत के द्वारा मोदी सरकार की मुश्किलें खड़ी की गई है। सुप्रीम कोर्ट के यह फैसले कई तरह के इशारे कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ मोदी सरकार द्वारा 2015 के शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के जजों की मर्ज़ी के खिलाफ कानून बनाकर कॉलेजियम सिस्टम लागू करने के फैसले से भी इनको जोड़कर देखा जा रहा है।

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