नई दिल्ली।

कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के द्वारा इस्तीफा देने के बाद तरह तरह के सवालों पर रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी ने हालांकि कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर मोतीलाल वोरा को अध्यक्ष बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही यह बात भी चर्चा का विषय बन गई है।

आखिर ऐसा क्या कारण है कि केवल 2 साल के भीतर ही राहुल गांधी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा, जबकि उनकी मां लगातार 19 साल तक कांग्रेसका राष्ट्रीय नेतृत्व संभाल चुकी है।

दरअसल इस कहानी की शुरुआत होती है 2013 से राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी ने उपाध्यक्ष बनाया था।

कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस पार्टी में कोंग्रेस दो दलों में बंटी हुई है। एक वह है जिसमें सोनिया गांधी और उनके करीबी वरिष्ठ नेता है तो दूसरे धड़े में राहुल गांधी और कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच रखने वाले युवा लीडर हैं।

जिनमें माधव राज सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट जैसे नाम शामिल है इसी तरह से सोनिया गांधी के करीबी लोगों में मोतीलाल वोरा, अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत कमलनाथ नाम जैसे शामिल है।

2013 में राहुल गांधी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया तब कांग्रेस पार्टी सोनिया गांधी और उनके करीबी थे।

दूसरे धड़े में राहुल गांधी और उनके करीबी जब भी राहुल गांधी को उपाध्यक्ष के तौर पर कड़े फैसले लेने होते थे, तब कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता उनका साथ छोड़ देते थे।

जबकि फाइनल फैसला सोनिया गांधी के द्वारा किया जाता था, जब 2017 में राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया तब इन वरिष्ठ नेताओं की पहुंच कम हो गई।

सोनिया गांधी एक रिश्ते में चली गई और उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में सीधा दखल देना बंद कर दिया।

ऐसे में इन वरिष्ठ नेताओं की पहुंच कम हुई तो उन में खलबली भी शुरू हो गई।

राहुल गांधी के साथियों और पार्टी के जूनियर नेताओं के द्वारा खुद को आगे करने का प्रयास किया गया, क्योंकि राहुल गांधी अध्यक्ष बन चुके थे तो तमाम फैसले को नहीं को लेने होते थे।

लेकिन कई बार ऐसे मौके आए जब राहुल गांधी अध्यक्ष के तौर पर भी कड़े फैसले नहीं ले सके।

उनके आड़े हमेशा कमलनाथ, अशोक गहलोत, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह जैसे लोग आते रहे। कहा जाता है कि जब जब पार्टी को सफलता मिली तब यह सारे नेता आगे बढ़कर राहुल गांधी को अध्यक्ष के तौर पर स्वागत करते थे और उनके फैसलों पर सहमति जताते थे।

लेकिन जब पार्टी को सफलता मिलती और राहुल गांधी कड़े फैसले लेने के लिए तैयार होते तो यह सारे नेता पीछे हट जाते थे, जिसके चलते सारी असफलता का ठीकरा राहुल गांधी के सिर पर फूट जाता था।

इसकी शुरुआत 2014 में हुई जब कांग्रेस पार्टी को पहली बार सत्ता से पूरी तरह बेदखल होना पड़ा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने न केवल मजबूत फैसले लिए बल्कि, पहली बार भारत की विदेशों में बड़ी शादी कांग्रेस उपाध्यक्ष होने के नाते राहुल गांधी पार्टी को जिंदा करना चाहते थे।

लेकिन जब भी उनको कड़े फैसले लेने होते थे तो यही सीनियर नेता उनके फैसलों में आड़े आते थे। ऐसे में सोनिया गांधी के द्वारा 2017 में राहुल गांधी को अध्यक्ष बना दिया गया।

बावजूद इसके उन्होंने फैसले लेने की हिम्मत नहीं कि एक तरह से कहा जा सकता है कि सीनियर लीडर्स का गांधी के ऊपर काफी दबाव था और यह दबाव उनको कोई भी फैसले नहीं लेने दे रहा था।

2019 के चुनाव से पहले इन सभी सीनियर लीडर्स ने राहुल गांधी को यही फीडबैक दिया कि कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ रही है।

इसी का नतीजा था कि कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने का भी कोई खास प्रयास नहीं किया।

साथ ही पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और अन्य राज्यों में भी कांग्रेस पार्टी ने गठबंधन नहीं किया।

सीनियर लीडर्स के द्वारा राहुल गांधी को बार-बार यही कहा जाता रहा कि कांग्रेस सत्ता में आ रही है और नरेंद्र मोदी सत्ता से बेदखल हो रहे हैं।

यहां तक कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के सपने दिखा दिए गए और मंत्रिमंडल के गठन भी तय हो गए, लेकिन जब परिणाम आया तो राहुल गांधी के सारे सपने धराशाई हो गए बताया जाता है कि इससे राहुल गांधी को गहरा धक्का लगा।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया सीनियर लीडर्स के द्वारा उनको इस तरह से बरगलाना और उनके द्वारा विफलताओं के वक्त साथ नहीं देना राहुल गांधी को कांग्रेस की विचारधारा से ही में मुकर गया।

राजनीति के तौर पर अपने करियर को नई ऊंचाइयां देना चाहते हैं। साथ ही साथ गांधी परिवार का टैग जो कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर लगा हुआ है।

उसको हटाने के लिए भी उन्होंने साफ कह दिया है कि गांधी परिवार का कोई भी सदस्य पार्टी का अध्यक्ष नहीं बनेगा।