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लोग निकोटिन के लिए धूम्रपान करते हैं, लेकिन टार से मर जाते हैं। टार सिगरेट में तम्बाकू के दहन से बनता है, जबकि निकोटिन, जो समान रूप से हानिकारक है, व्यसन का कारण बनता है।

तम्बाकू सेवन से कैंसर जैसी भयानक बीमारी और उससे होने वाली मौतों की संख्या सर्वाधिक होना-ये जानकारी शायद सभी को है।

तंबाकू का उपयोग एक महामारी है और भारत तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और उत्पादक है। पूरी दुनिया में हर साल लगभग 60 लाख लोग तंबाकू के उपयोग के कारण मारे जाते हैं।

2030 तक सालाना लगभग 80 लाख लोगों की मृत्यु होने का अनुमान है, जो विकासशील देशों के कम और मध्यम आय वाले समूह में 80% है।

तंबाकू के उपयोग के कारण लगभग 10 लाख लोग तो भारत में मर जाते हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अब तक 10.6 करोड़ तंबाकू उपभोक्ता हैं।

तंबाकू की खपत बंद नहीं होने पर यह संख्या दुनिया भर में 2025 तक 100 करोड़ तक पहुंच सकती है।

तंबाकू की खपत से संबंधित बीमारियां न केवल दुनिया के मौत का प्रमुख कारण है, बल्कि यह विभिन्न तरीकों से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव भी डालती है।

ऐसी मौतों को रोकने और जनता के स्वास्थ्य के स्तर को बढ़ाने तथा धूम्रपान न करने वालों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए राज्य और केंद्र सरकार, दोनों के द्वारा कई उपाय किए गए हैं जो अभी तक नाकाफी साबित हुए हैं।

विक्रेता लाइसेंसिंग के माध्यम से तम्बाकू उत्पादों की बिक्री, शैक्षणिक संस्थानों के पास ऐसे उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध, सार्वजनिक स्थानों में धूम्रपान पर प्रतिबंध और तंबाकू उत्पादों के किसी भी प्रकार के ब्रांड प्रचार के ऊपर प्रतिबंध – कुछ ऐसे उपाय हैं जिन से तम्बाकू सेवन को कम किया जा सकता है।

उपर्युक्त प्रावधानों को शामिल करने वाला अधिनियम 2003 में बनाया गया था और इसे कोटपा, 2003 के नाम से भी जाना जाता है।

किसी भी कानून की सफलता इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है, हालांकि इस अधिनियम और उसके निष्पादन पर बहुत कुछ नहीं हुआ है।

संबंधित विभागों के अधिकारी स्वयं अधिनियम के प्रावधानों और उनमें निहित शक्तियों से अवगत नहीं हैं।

अधिनियम की एक महत्त्वपूर्ण धारा 5 किसी भी रूप में तम्बाकू उत्पादों के विज्ञापन को प्रतिबंधित करती है।

यह देखा गया है कि पीओएस (बिक्री का बिंदु या बिक्री स्थल पर विज्ञापन ) विज्ञापन कोटपा के लागू होने के बाद कुकुरमुत्तों की भांति लगने लगे।

तंबाकू उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए बिक्री स्थल पर विज्ञापन एक महत्वपूर्ण चैनल बन गया है।

चूंकि भारत ने तम्बाकू विज्ञापन के पारंपरिक तरीकों को प्रतिबंधित कर दिया है, इसलिए तंबाकू उद्योग ने बिक्री केंद्रों पर तम्बाकू उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए अपने ध्यान को तेजी से स्थानांतरित कर दिया है।

अपने संसाधनों को इस तरह पुन: आवंटित कर विपणन प्रतिबंधों का जवाब तलाश कर लिया है।

प्वाइंट ऑफ सेल विज्ञापन खुदरा विक्रय में तंबाकू उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियां होती है।

जिसमे मूल्य छूट, ब्रांडेड उत्पाद देने, तंबाकू विज्ञापन संकेत, बैक लिट् संकेत, सम्बंधित ब्रांडेड वस्तुओं और तम्बाकू उत्पादों का प्रदर्शन शामिल है।

लक्षित विपणन (यानी विभिन्न सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों में लक्षित उपभोक्ताओं को विक्रय के लिए विभिन्न उत्पादों को बढ़ावा देना) ग्राहकों को समूहों में विभाजित करके पीओएस विज्ञापन विक्रय की शक्ति को बढ़ाता है।

भारत में पीओएस विज्ञापन कम आय वाले समुदायों में, झोपड़- पट्टी और सामान क्षेत्रों में समान रूप से प्रचलित हैं।

कम ऊंचाई पर विज्ञापन लगाना और उत्पाद को बाल सुलभ सामान के बगल में रखना जहाँ बच्चों द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है ,जो तम्बाकू कंपनियों के लिए लक्षित उपभोक्ता हैं।

बिक्री और पीओएस विज्ञापनों में वृद्धि के बीच सकारात्मक संबंध है। यह देखा गया है कि पीओएस विज्ञापनों को लगाने के बाद बेचा जाने वाले तम्बाकू उत्पादों का अनुपात उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।

पीओएस विज्ञापन युवाओं को कम से कम एक बार ऐसे उत्पादों का उपयोग करने के लिए आकर्षित करते हैं क्योंकि वे उनकी पहुंच के स्थानों पर आसानी से उपलब्ध हैं।

साहसवाद की भावना (या कहें दुस्साहस) और बच्चों के ले कर देखते हैं” वाले रवैये; “काम करने वाले माता-पिता” के लिए समय की कमी और लापरवाही और सौ दिन में एक बार होने वाली पुलिस विभाग की कार्रवाई।

जैसे सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान के खिलाफ 28 फरवरी, 2018 को विशेष कार्यक्रम के तहत काटे गए 1,76,693 चालानों का रिकॉर्ड, (प्रत्येक महीने के अंतिम दिन को तम्बाकू निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है।

कम से कम कागज पर तो ऐसा ही है,) जैसे कई कारण है कि तम्बाकू उपभोग करने वाले लोगों की संख्या कम नहीं हो रही है।

यहीं से ही लगभग 40% किशोर 10 साल की उम्र से पहले तम्बाकू का सेवन शुरू करते हैं और जब तक वे 18 वर्ष की आयु प्राप्त करते हैं तब तक उन्हें नशे की लत लग जाती है।

वाग्धारा, (राजस्थान को तंबाकू मुक्त राज्य बनाने के अपने अंतिम उद्देश्य के साथ, राज्य सरकार सहित विभिन्न हितधारकों, जिसमे राज्य सरकार भी है, को शामिल कर तम्बाकू नियंत्रण नीतियों को सुदृढ़ बना कर राज्य में तम्बाकू उपयोग को कम करने का प्रयास करने वाला एक गैर-लाभकारी संगठन) ने आरटीआई के माध्यम से पुलिस विभाग द्वारा कोटपा की धारा 5 के कार्यान्वयन पर संबंधित अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई पर मासिक अपराध रिपोर्ट से कुछ आंकड़े एकत्र किये हैं।

जो बताते हैं कि सरकार इस मामले में ज़्यादा चिंतित नहीं है। पुलिस विभाग की एमसीआर (मासिक अपराध रिपोर्ट) से खुलासा हुआ है कि मार्च, 2017 से अगस्त 2018 तक केवल 74 चालान काटे गए थे।

अप्रैल 2018 में 73 और अगस्त, 2018 के महीने में केवल 1 चालान काटा गया था।

इन चालानों से कुल जुरमाना राशि 14700/- संग्रह की गयी, जो कि तम्बाकू से होने वाले नुक्सान के मुकाबले कुछ भी नहीं है।

डीआईजी-सीआईडी (सीबी) तथा राज्य लोक सूचना अधिकारी लक्ष्मण गौड़ ने कोटपा—2003 की धारा 5 के तहत तम्बाकू विक्रेताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई पर अपनी चिंता ज़ाहिर की।

उन्होंने वाग्धारा के प्रतिनिधियों को इस मामले में कार्रवाई करने का आश्वासन दिया और एक विशेष अभियान के तहत कानून तोड़ने वालों के खिलाफ दंडनीय कार्रवाई करने की बात भी कही।

उन्होंने कोटपा कार्यान्वयन के लिए एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति पर भी आश्वासन दिया।
वाग्धारा के सचिव जयेश जोशी का कहना है कि “ राज्य सरकार तंबाकू उत्पादों की बिक्री को बढ़ाने के लिए विक्रय स्थलों पर लगाए जाने वाले विज्ञापनों को रोकने तथा उससे सम्बंधित कोटपा की धारा 5 की कड़ाई से अनुपालना करवाने के लिए कठोर कदम उठाए।

इसके क्रियान्वयन पर ध्यान दे और और इसकी अनुपालना न करने वालों को कठोर सज़ा दे, जिससे आने वाली पीढ़ी इस आसानी से उपलब्ध हो रहे जहर का उपभोग करने से बच सके”।

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