जाट समाज की लीडरशिप ही नहीं, प्रदेश का काफी कुछ है हनुमान बेनीवाल के निशाने पर

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जयपुर।

हनुमान बेनीवाल बीते 5 साल से राजस्थान की सियासत में एक जलजले की तरह उभर कर सामने आया हुआ नाम है। हालांकि, लगातार दूसरी बार अपने दम पर विधायक बनने में कामयाब रहे बेनीवाल के अपने पिछले कार्यकाल के दौरान ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से संबंध बिगड़ चुके थे।

तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ सियासी संबंधों में खटास आने के कारण हनुमान बेनीवाल ने पार्टी के खिलाफ बगावत का रास्ता अख्तियार कर लिया। अंततः बीजेपी ने उनको पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया था।

खींवसर विधानसभा से निर्दलीय विधायक बने बेनीवाल 2013 से लगातार राज्य सरकार की योजनाओं और विपक्षी पार्टी कांग्रेस के द्वारा विपक्ष का दायित्व नहीं निभाने को लेकर, दोनों की तीखी आलोचना करते रहे हैं।

सबसे पहले नागौर, फिर बाड़मेर, बीकानेर और आखिर में सीकर जिले में ऐतिहासिक रैलियां करके हनुमान बेनीवाल ने इन 5 साल के भीतर न केवल अपने कद का एहसास करवाया है, बल्कि अब 29 अक्टूबर को जयपुर में विशाल रैली का ऐलान कर कांग्रेस और भाजपा, दोनों के लिए मुश्किलें पैदा करने की संभावना जता दी है।

यह सर्वविदित है, और सरकारी एजेंसियों के आंकड़े हैं कि हनुमान बेनीवाल की नागौर, बाड़मेर, बीकानेर और सीकर में हुई रैलियां ऐसी रही, कि हाल ही के वर्षों में राजस्थान में किसी भी दूसरे नेता ने अपने दम पर उनके मुकाबले की कोई रैली नहीं की है।

राजनीतिक विश्लेषक वैसे तो विधायक हनुमान बेनीवाल को जाट समाज का लीडर मानते हैं, लेकिन बीते 1 साल के दौरान उनके साथ किसान वर्ग की तमाम कौम साथ होने के कारण अब वो धीरे-धीरे सर्वसमाज के नेता बनते नजर आ रहे हैं।

लंबे समय तक हनुमान बेनीवाल को कुख्यात ईनामी बदमाश आनंदपाल सिंह के कारण राजपूत समाज का विरोधी माना जाता रहा है, लेकिन आनंदपाल के एनकाउंटर के बाद हनुमान बेनीवाल ने राजपूत समाज को साथ लेकर चलने की बात कहकर राजनीतिक जानकारों को चौंका दिया है।

केवल बेनीवाल की रैलियों की बात करें, तो नागौर में उनका जबरदस्त सियासी वर्चस्व सामने आने के साथ ही बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, सीकर और झुंझुनूं उनकी राजनीतिक जकड़ में है, खासकर युवा और किसान वर्ग साथ होने के कारण उनके विरोधी कुछ सदमे में हैं।

उल्लेखनीय है कि पश्चिमी राजस्थान के, खासकर सीकर, झुंझुनू, चूरू, नागौर, बाड़मेर, अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, पाली समेत आधे राजस्थान में हनुमान बेनीवाल के समर्थकों में बीते 5 साल के दौरान बहुत तेजी से वृद्धि हुई है।

यह भी उल्लेखनीय है कि राजस्थान में इस दौरान जाट समाज की लीडरशिप लगभग मृत प्राय स्थिति में पहुंच चुकी है। विशेषकर परसराम मदेरणा और शीशराम ओला के निधन व परसराम मदेरणा के बेटे महिपाल मदेरणा के जेल जाने के बाद राज्य में जाट लीडरशिप खत्म होने के कगार पर थी। ऐसे में बेनीवाल ने इस खालीपन का भरपूर फायदा उठाया है।

सियासी जानकारों की माने तो आज की तारीख में राजस्थान में जाट समाज का हनुमान बेनीवाल न केवल सबसे बड़ा चेहरा है, बल्कि युवा और किसान वर्ग में जबरदस्त पकड़ होने के चलते बेनीवाल को आज भविष्य के बड़े नेता के रूप में देखा जा रहा है।

हनुमान बेनीवाल 29 अक्टूबर को अपनी राजनीतिक पार्टी का ऐलान करने के अलावा चुनाव को लेकर आगे की रणनीति का खुलासा करेंगे। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है, कि वह बीजेपी और कांग्रेस के तमाम विरोधियों को साथ लेकर सभी 200 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे।

यदि बेनीवाल का गठबंधन बसपा, भाजपा से बगावती हुए घनश्याम तिवाड़ी की भारत वाहिनी पार्टी और आप पार्टी के साथ हो जाता है, तो निश्चित तौर पर हनुमान बेनीवाल बीजेपी-कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती पेश कर सकते हैं।

सबकी नजरें अब बेनीवाल की 29 अक्टूबर 2018 को मानसरोवर में होने वाली रैली की सफलता या असफलता पर है। क्योंकि उसके बाद बीजेपी-कांग्रेस अपने टिकट तय करेगी, बल्कि इसके साथ ही बेनीवाल के साथ आने वाले लोगों का मूड भी तय हो जाएगा।