कई अस्पतालों ने उठाए फर्जी क्लेम, कम्पनी व सरकार के बीच यही है विवाद

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-भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना के भुगतान रोकने के बाद कम्पनी खड़े किए हैं हाथ

जयपुर। वर्तमान सरकार की सबसे बेहतरीन योजनाओं में से एक, भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना पर ब्रेक लग गया है। करीब 2400 करोड़ रुपए का भुगतान कर मरीजों का उपचार करने के बावजूद सरकार व बीमा कम्पनी के बीच ठनी हुई है। कम्पनी ने 13 सितंबर के बाद एक भी पैमेंट करने से इनकार कर दिया है, वहीं सरकार इस बात के प्रयास में बताई जा रही है कि कम्पनी क्लेम जारी रखे, ताकि मरीजों का समय पर उपचार हो सके।

वैसे तो सरकार के द्वारा बीते दिनों इंशोरेंस कम्पनी की बीमा किस्त के 106 करोड़ रुपए के भुगतान रोका जाना प्रमुख कारण है, लेकिन इसकी तह तक जाने के बाद सामने आया है कि सरकार व कम्पनी के बीच लड़ाई का असली कारण बीमा के द्वारा बड़ी तादात में निजी अस्पतालों ने फर्जी क्लेम उठा लिया है। सूत्रों के अनुसार कम्पनी ने अपनी आॅडिट में इस बात के लिए सरकार को चेता दिया था, लेकिन उसपर कोई मॉनिटरिंग नहीं हो सकी, जिसके बाद विवाद बढ़ गया है। योजना में निजी अस्पतालों और बीमा कंपनी के बीच लंबे समय से इसी बात को लेकर विवाद चल रहा है।

कंपनी ने अपनी आॅडिट में यह पाया था कि कई अस्पताल गलत तरीके से अनियमितता व फर्जी बिल बनाकर भुगतान उठा रहे हैं। जांच में पाया गया कि अस्पतालों ने योजना में सूचीबद्ध होते समय जो सुविधाएं वहां बताई थी, वो वहां है ही नहीं। कंपनी यह भी आरोप लगा चुकी है कि इस योजना में ऐसे अस्पतालों पर उसके द्वारा कार्यवाही करते ही चिकित्सा विभाग की ओर से उनकी कार्यवाही को खारिज कर दिया जाता है।

ऐसे करते हैं फर्जीवाड़ा

अस्पतालों में सूत्रों का दावा है कि अधिकांश फर्जी क्लेम गांवों, कस्बों से आते हैं। जहां पर कई बड़े डॉक्टरों ने दूसरों के नाम से अस्पताल खोल दिए हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि इस योजना की गाइड लाइन को धत्ता बताकर कई अस्पतालों को सूचीबद्ध करने के मामले मिले हैं, जहां पर बिना वजह आॅपरेशन कर क्लेम उठा लिया गया। सर्वाधिक फर्जीवाड़े वाले क्लेम उन आॅपरेशन में किए गए हैं, जिनमें चीर-फाड़ नहीं होती है।

इसमें पैशाब के माध्यम से होने वाले पथरी, प्रोस्टेट व अन्य आॅपरेशन हैं। मरीजों की 5 एमएम की पथरी को 10 और 20 एमएम की बताकर दूरबीन से आॅपरेशन सामने आए हैं। इसी तरह से एक की जगह 2-2 कोड बताकर क्लेम उठाया गया है। गांव व कस्बों में जहां पर मॉनिटरिंग की व्यवस्था कम है, वहां पर बड़े पैमाने पर फर्जी क्लेम सामने आए हैं।